
हर साल माघ माह की पंचमी तिथि को बसंत पंचमी (Basant Panchami) का पावन पर्व मनाया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन विद्या और कला की देवी मां सरस्वती का प्राकट्य हुआ था। इसलिए बसंत पंचमी को सरस्वती जन्मोत्सव, श्री पंचमी और सरस्वती पूजा के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन मां सरस्वती की विधिपूर्वक पूजा करने से बुद्धि, ज्ञान और विद्या में वृद्धि होती है।
इस बार बसंत पंचमी (Basant Panchami) का पर्व 23 जनवरी, शुक्रवार को मनाया जाएगा। इस दिन ग्रहों की स्थिति के कारण कई शुभ और दुर्लभ योग बन रहे हैं, जो इस पर्व को और भी खास बना रहे हैं।
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बसंत पंचमी (Basant Panchami) 2026 पर बनने वाले शुभ योग
बसंत पंचमी के दिन चंद्रमा मीन राशि में प्रवेश करेंगे। चंद्रमा से चतुर्थ भाव में गुरु के स्थित होने के कारण इस दिन गजकेसरी योग का निर्माण हो रहा है। गजकेसरी योग को ज्योतिष में अत्यंत शुभ माना जाता है। इस योग में मां सरस्वती की पूजा करने से छात्रों को शिक्षा में सफलता, एकाग्रता और बुद्धि की विशेष प्राप्ति होती है।
इसके अलावा 23 जनवरी 2026 को बुधादित्य योग भी बन रहा है। सूर्य और बुध की युति से बनने वाला यह योग करियर, व्यापार और शिक्षा के क्षेत्र में उन्नति देने वाला माना जाता है। जिन लोगों का कार्य लेखन, पढ़ाई, प्रतियोगी परीक्षा या व्यापार से जुड़ा है, उनके लिए यह योग विशेष लाभकारी रहेगा।
बसंत पंचमी (Basant Panchami) के दिन सर्वार्थ सिद्धि योग का संयोग भी बन रहा है। इस योग में किए गए कार्यों में सफलता मिलने की मान्यता है। ऐसे में नई शुरुआत, पढ़ाई की शुरुआत या किसी शुभ कार्य का आरंभ करना अत्यंत फलदायी माना जाता है।
बसंत पंचमी 2026 शुभ मुहूर्त (Basant Panchami Muhurat)
पंचांग के अनुसार, माघ माह की पंचमी तिथि का आरंभ 23 जनवरी 2026 को सुबह 02:28 बजे होगा। पंचमी तिथि का समापन 24 जनवरी को 01:46 बजे होगा।
सरस्वती पूजा (Saraswati Puja) के लिए शुभ मुहूर्त सुबह 07:15 बजे से दोपहर 12:50 बजे तक रहेगा। इस समय में पूजा करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है।
बसंत पंचमी (Basant Panchami) पर सरस्वती माता को लगाएं ये भोग
बसंत पंचमी के दिन पीले रंग के भोग को विशेष महत्व दिया जाता है। मां सरस्वती को बूंदी या बूंदी के लड्डू, खीर, केसर भात, मीठे चावल और पीली मिठाई अर्पित की जाती है। इसके साथ ही बेर, केला, संतरा, अनार और सेब जैसे फल भी भोग में शामिल किए जा सकते हैं।
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बसंत पंचमी पर सरस्वती वंदना का पाठ
बसंत पंचमी (Basant Panchami) के दिन सरस्वती वंदना का पाठ करने से बुद्धि और ज्ञान का विकास होता है। इस दिन नीचे दी गई सरस्वती वंदना का पाठ विशेष फलदायी माना गया है :
या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता। या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना॥ या ब्रह्माच्युत शंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता। सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा॥१॥
शुक्लां ब्रह्मविचार सार परमामाद्यां जगद्व्यापिनीं। वीणा-पुस्तक-धारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहाम्॥ हस्ते स्फटिकमालिकां विदधतीं पद्मासने संस्थिताम्। वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम्॥२॥
बसंत पंचमी (Basant Panchami) का धार्मिक महत्व
हिंदू धर्म में बसंत पंचमी का विशेष महत्व है। मान्यता है कि इसी दिन मां सरस्वती का प्राकट्य हुआ था। इस दिन पूजा करने से विद्या, बुद्धि और विवेक की प्राप्ति होती है। खासतौर पर बच्चों और विद्यार्थियों के लिए यह दिन अत्यंत शुभ माना जाता है। इस बार ग्रहों के शुभ संयोग के कारण बसंत पंचमी का महत्व और भी बढ़ गया है।
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बसंत पंचमी पूजा सामग्री (Basant Panchami Puja Samagri)
सरस्वती पूजा के लिए हल्दी, कुमकुम, रोली, अक्षत, धूपबत्ती, इत्र, सिंदूर, आम के पत्ते, पीले फूल, फूलों की माला, लकड़ी की चौकी, पीला वस्त्र, कलश, नारियल, केले की फली, दूध से बनी मिठाई, मालपुआ, तिल के लड्डू, गुलाल और पीले रंग की चुनरी या साड़ी की आवश्यकता होती है।
बसंत पंचमी सरस्वती पूजा विधि (Basant Panchami Puja Vidhi)
बसंत पंचमी (Basant Panchami) के दिन प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा स्थान पर लकड़ी की चौकी रखकर उस पर पीला वस्त्र बिछाएं और मां सरस्वती की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। चारों ओर गंगाजल का छिड़काव करें और माता का विधिवत आचमन व स्नान कराएं।
इसके बाद फूल, माला, अक्षत, सिंदूर और श्रृंगार का सामान अर्पित करें। माता के चरणों में गुलाल अवश्य अर्पित करें। फिर पकवान, मिठाई और फल का भोग लगाएं। इस दिन पुस्तकों, कॉपियों और पढ़ाई से जुड़ी वस्तुओं की भी पूजा करनी चाहिए। अंत में प्रसाद वितरण करें और शाम के समय पुनः संध्या पूजा करें।
बसंत पंचमी पर कलश पूजन विधि (Basant Panchami Kalash Pujan)
सरस्वती पूजा के दिन कलश पर मोली बांधें और उसके ऊपर आम के पत्ते रखें। कलश में अक्षत, सुपारी, दूर्वा और मुद्रा डालें। नारियल को कलश पर स्थापित कर वरुण देवता का आवाहन करें और विधि-विधान से पूजन करें। इसके बाद कलश की स्थापना कर मां सरस्वती की पूजा करें।
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