
Pahalgam
जम्मू कश्मीर के पहलगाल (Pahalgam) में जो हुआ, वह सिर्फ एक आतंकी हमला नहीं था, वह एक सुनियोजित चुनौती थी – भारत की सहनशक्ति को, उसके धैर्य को, उसकी चुप्पी को। और इस बार जवाब सिर्फ बुलेट या कूटनीति से देने से नहीं चलेगा। इस बार जरूरत है एक ऐसी नीति की जो पाकिस्तान की जड़ों को हिला दे।
पाकिस्तान (Pakistan) का खेल नया नहीं है। वही पुराना नक्शा, वही पुराने मोहरे – बस हर बार ताश की गड्डी नयी दिखती है। इस बार पाकिस्तानी आर्मी चीफ असीम मुनीर (Asim Munir) ने 16 अप्रैल को जो भाषण दिया, वह बस भाषण नहीं, एक इशारा था। और ठीक उसी इशारे के कुछ दिन बाद पहलगाम (Pahalgam) में खून बहा। पूरी दुनिया जान रही है कि जम्मू कश्मीर में आतंकवाद के पीछे पाकिस्तान (#PakistanBehindPahalgam) है।
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अब सवाल यह नहीं है कि Pahalgam attack क्यों हुआ। सवाल यह है कि हम कब तक अमेरिका, चीन और सऊदी अरब जैसे देशों को पाकिस्तानी चालों का मूक दर्शक बनकर देखते रहेंगे?
अब भारत को अपनी चुप्पी से ज्यादा असरदार अपने बाजार को बनाना होगा।
भारत ने हमेशा अपनी साख को हथियार नहीं बनाया, लेकिन अब समय है कि नई दिल्ली अपने बाजार की ताकत को एक रणनीतिक उपकरण के रूप में देखे।
दुनिया की दोनों बड़ी महाशक्तियों – अमेरिका और चीन को आज भारत की जरूरत है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) भारत को ज्यादा से ज्यादा सामान बेचना चाहते हैं। यही हालत चीन की भी है।
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ट्रंप ने पूरी दुनिया को मोहलत दे दी है, लेकिन चीन पर टैरिफ कायम रखा है। चीन पर इसका आर्थिक असर जरूर पड़ेगा और इससे निपटने के लिए उसे भारत जैसा साथी चाहिए। अमेरिका से होने वाली भरपाई केवल हिंदुस्तान ही कर सकता है। लेकिन हिंदुस्तान को यह साफ शब्दों में बताना होगा कि दुनिया को उसके और पाकिस्तान के बीच में से किसी एक को चुनना होगा।
बंद करनी होगी पाकिस्तान (Pakistan) की ऑक्सीजन सप्लाई
रावलपिंडी की असली ताकत उसके हथियार नहीं हैं – वो डॉलर हैं जो चीन, अमेरिका, सऊदी अरब और UAE जैसे देश उसके खातों में डालते हैं। और मजे की बात यह है कि इन देशों को यह भी पता होता है कि ये पैसे किस काम के लिए हैं। फिर भी खाते खुलते हैं, ट्रांजैक्शन होते हैं, और बम बनते हैं।
भारत चाहे तो इन देशों से चुपचाप बातचीत कर सकता है। समझा सकता है कि कर्ज के दम पर चल रहे एक देश को आतंक का खूनी खेल खेलने की इजाजत नहीं दी जा सकती। ।
पाकिस्तान को हाल ही में $5.51 बिलियन की मदद मिली है – ये पैसे बमों से नहीं, बातों से छीने गए हैं। तो भारत को भी अब बातों का इस्तेमाल करना होगा, लेकिन ऐसे कि शब्दों की धार तलवार से तेज हो।
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दवाओं की सप्लाई रोकी जाए
Indus Waters Treaty को रोकने की भारत की पहल अहम है, लेकिन यह दीर्घकालिक लड़ाई है। पानी तभी रोका जा सकता है, जब डैम बनें।
लेकिन जो काम आज हो सकता है, वह है दवाओं की सप्लाई पर लगाम लगाना। पाकिस्तान को भारत से मिलने वाली दवाएं उसके हेल्थकेयर की रीढ़ हैं। भारत से उसे सस्ती दवाएं मिलती हैं। वहां के लोग यहां इलाज कराने आते हैं। चीन या कोई भी दूसरा देश इस मामले में भारत की जगह नहीं ले सकता।
चीन को भी अब आईना दिखाने का वक्त है
पाकिस्तान (Pakistan) के 81% हथियार चीन से आते हैं। मिसाइल, ड्रोन, फाइटर जेट्स – सब कुछ। लेकिन भारत-चीन व्यापार के सामने पाकिस्तान-चीन व्यापार चिल्लर की तरह है।
भारत को बीजिंग से पूछना चाहिए कि उसे हिंदुस्तान के साथ तिजारत करनी है या पाकिस्तान को मदद देनी है? अगर पाकिस्तान को लेकर चीन अपनी हमदर्दी कम नहीं करता, तो भारत को भी व्यापार के बारे में सोचना होगा।
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चीन इस समय अमेरिका की टैरिफ नीति से परेशान है। अगर भारत बस इतना कह दे कि हम भी चीनी सामान कम खरीदेंगे तो चीन के होश उड़ जाएंगे। उसे भी पता है कि पाकिस्तान को उससे मदद चाहिए, उसमें इतनी हैसियत नहीं कि वह कुछ खरीद सके।
भारत के पास अब कूटनीति, बाजार और संस्कृति – तीनों की ताकत है। पश्चिम एशिया और अमेरिका में सैकड़ों भारतीय मूल के CEO और मैनेजर्स हैं। उनके जरिए आवाज वहां तक पहुंचाई जा सकती है, जहां हथियार नहीं, तर्क काम करते हैं।
पहलगाम (Pahalgam) का जवाब अब बुलेट से नहीं, बजट से आएगा। पाकिस्तान (Pakistan) को छांव दे रहे देशों को यह अहसास कराना होगा कि आतंक का समर्थन पॉलिसी नहीं, अपराध है। और इस अपराध की सजा मिलनी चाहिए – ब्याज समेत।
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