
बिहार के गयाजी में हर साल पितृपक्ष (Pitru Paksha) के दौरान पुरोहितों द्वारा पितरों की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान (Pind daan in Gaya Ji) किया जाता है। विशेषकर गया श्राद्ध के चौथे दिन बोधगया में धर्मारण्य, ब्रह्मा सरोवर, सरस्वती वेदी, मातंग वापी, काक बली और आम्र सिंचन जैसी प्रमुख वेदियों पर पिंडदान करने का विधान है।
धार्मिक मान्यता है कि इन वेदियों पर चावल, गुड़ और तिल के पिंड द्वारा श्राद्ध संस्कार करने से पूर्वजों के पितरों को बैकुंठ लोक की प्राप्ति होती है। वहीं ब्रह्म सरोवर में उड़द की दाल का पिंडदान करने की भी विशेष परंपरा है, जिससे पितृ दोष दूर होने, प्रेत बाधा से मुक्ति जैसी मान्यताएँ जुड़ी हैं। यहीं वजह है कि त्रैपाक्षिक श्राद्ध के लिए तीर्थयात्री इन वेदियों का चुनाव करते हैं।
यह भी पढ़ें : Pitru Paksha : पितृ पक्ष में भूलकर भी न करें ये काम
पौराणिक कथाओं के अनुसार, महाभारत काल में भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को यहां (Gaya) पिंडदान की विधि दिखाई थी। कहते हैं युधिष्ठिर स्वयं पिंडदान करने पहुंचे थे और इस दिन को पंच वेदी तीर्थ माना जाता है। यहीं कारण है कि धार्मिक व्यक्ति विशेष श्रद्धा से आते हैं और विधिपूर्वक पिंडदान करते हैं।
सूचना के अनुसार, गया (Gaya) में तीसरे दिन तक पिंडदान करने आए तीर्थयात्रियों की संख्या लगभग 6 लाख से अधिक थी, और चौथे दिन यह संख्या 9 लाख के करीब पहुंच सकती है। केवल एक दिन में लगभग 2 लाख 37 हजार लोग पिंडदान करने के लिए पहुंचे यानी प्रति दिन व्यापक संख्या में श्रद्धालु आते हैं।
यह भी पढ़ें : Pitru Paksha : कहां रहती है पितरों की आत्मा?
पिंडदान नाम मात्र नहीं, बल्कि गयाजी (Gaya) की ऐतिहासिक और पवित्र पहचान है। हिंदू मान्यताओं के अनुसार भगवान राम ने अपने पिता दशरथ की आत्मा की शांति के लिए यह पिंडदान गयाजी में किया था, और विष्णुपद मंदिर में भगवान विष्णु की चरणपादुका आज भी पूजनीय है। गयाजी का वाकई धार्मिक महत्व इसलिए भी है क्योंकि यह भारत के प्रमुख पिंडदान तीर्थ स्थलों में गिना जाता है।
गयाजी (Gaya) ने सिर्फ धार्मिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और पर्यटन दृष्टिकोण से भी पहचान बनाई है। इसे आधिकारिक रूप से ‘Gaya Ji’ के नाम से जाना जाता है और यहां पितृपक्ष मेले में लाखों लोग भाग लेते हैं – 2024 में करीब 23 लाख श्रद्धालुओं ने पिंडदान किया, जबकि महाबोधि मंदिर की विश्व धरोहर स्थली पर 40 लाख से अधिक पर्यटक पहुंचे।
कहां रहती है पितरों की आत्मा, क्या Pitru Paksha में उनसे मिल सकते हैं?



