
मणिपुर (Manipur news) में 3 मई 2023 को हिंसा भड़की थी। तारीखों के हिसाब से दो साल से ज्यादा का वक्त हो गया और सूबे में अब भी जिंदगी सामान्य नहीं हो पायी है। किसी ने नहीं सोचा था कि मैतई समुदाय को एसटी सूची में शामिल किए जाने का मसला ऐसा गंभीर मोड़ ले लेगा।
आज मणिपुर से लेकर दिल्ली तक, तनाव की आंच साफ महसूस की जा सकती है। पीएम नरेंद मोदी हिंसा भड़कने के बाद पहले बार मणिपुर जा रहे हैं (PM Narendra Modi in Manipur)। पहले इस दौरे की मुख्य बातें जान लेते हैं :
- पीएम मोदी का दौरा मिजोरम की राजधानी आइजोल से शुरू होगा। यहां वे 9,000 करोड़ रुपये से अधिक की परियोजनाओं का उद्घाटन और शिलान्यास करेंगे।
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प्रमुख परियोजनाएं
- बैराबी-सैरांग रेलवे लाइन।
- 45 किमी लंबी आइजोल बाईपास रोड।
- थेनजोल-सियालसुक और खानकावन-रोंगुरा सड़कें।
- मुआलखांग में एलपीजी बॉटलिंग प्लांट।
- पीएम मोदी छिमटुईपुई नदी पुल और खेलो इंडिया मल्टीपर्पज इंडोर हॉल की आधारशिला रखेंगे।
- आजोल को दिल्ली, गुवाहाटी और कोलकाता से जोड़ने वाली नई रेल सेवाओं का उद्घाटन भी करेंगे।
- पीएम मोदी मणिपुर के चुराचांदपुर भी जाएंगे। (PM’s visit to Manipura)
- यह इलाका कुकी समुदाय बहुल है और नस्लीय हिंसा के दौरान सबसे ज्यादा प्रभावित रहा।
- इस हिंसा में करीब 260 लोगों की जान गई थी।
- 1988 में राजीव गांधी के बाद पीएम मोदी चुराचांदपुर जाने वाले पहले प्रधानमंत्री होंगे।
- शनिवार दोपहर 2:30 बजे पीएम मोदी मणिपुर की राजधानी इंफाल पहुंचेंगे।
- यहां वे 1,200 करोड़ रुपये से अधिक की परियोजनाओं का शिलान्यास और उद्घाटन करेंगे। साथ ही एक जनसभा को संबोधित करेंगे।
इंफाल में उद्घाटन होने वाली परियोजनाएं
- 101 करोड़ रुपये की लागत से बने नए मणिपुर पुलिस मुख्यालय।
- 538 करोड़ रुपये की लागत से निर्मित नया सिविल सचिवालय।
- 3,647 करोड़ रुपये की जल निकासी और परिसंपत्ति प्रबंधन सुधार प्रणाली।
- 550 करोड़ रुपये की मणिपुर इन्फोटेक डेवलपमेंट (MIND) परियोजना।
मणिपुर में कुकी बनाम मैतेई बंटवारा (Manipur Meitei vs Kuki conflict)
मणिपुर हिंसा ने इस पूरे सूबे को दो हिस्सों में बांटकर रख दिया है। एक और कुकी हैं और दूसरी ओर मैतई। एक तरफ पहाड़ है और दूसरी तरफ मैदान। हिंसा से पीड़ित आम जनता है और सामने वे लोग, जो आग में घी डालने का काम कर रहे।
लेकिन, आखिर यह आग भड़की कैसे? पहली चिंगारी उठी कैसे? (Reason for violence in Manipur)
इसका जवाब ना तीन मई की घटना में है और ना उसके पहले हुए छिटपुट विवादों में। मणिपुर अगर आज बंटा दिख रहा है, तो उसकी वजह है अंग्रेजों की नीति। मणिपुर में आज जो कुछ भी हो रहा है, उसके लिए मूल रूप से जिम्मेदार है ब्रितानी हुकूमत और उसकी नीतियां। (Manipur History)
मणिपुर की सीमा बर्मा यानी आज के म्यांमार से लगती है और अंग्रेजों ने पूर्वोत्तर के इस राज्य को इसी नजर से देखा। एक सीमांत राज्य, जो बफर जोन का काम कर सकता है। ब्रिटिश पॉलिटिकल एजेंट कर्नल विलियम मैकुलोच ने 8 जुलाई 1861 को गवर्नर जनरल को मणिपुर पर एक नोट लिखा।
इसमें उन्होंने जानकारी दी थी कि वह घाटी के चारों ओर पहाड़ियों पर और पश्चिम में बराक और मकरू तक कुकी लोगों पर नजर रखते हैं। उन्हें यह काम मणिपुर के राजा नूर नारा सिंह ने दिया था, जनजातियों की देखरेख का। दरअसल, 1830-40 में मैतई राजा ने अंग्रेजों को एक तरह से पूरा अधिकार दे दिया कि वे जनजातियों से खुद डील करें।
मैकुलोच के बाद आए दूसरे पॉलिटिकल एजेंट मेजर जनरल जेम्स जॉनस्टोन ने लिखा है कि मैकुलोच ने सीमांत इलाकों में कुकी लोगों (Manipur Kuki Tribe) को बसाया, ताकि सीमाओं की सुरक्षा हो सके।
अंग्रेजों को सबसे ज्यादा डर था बर्मा की ओर से। सन 1824 से 1826 के बीच बर्मा के साथ उनका युद्ध भी हो चुका था। वजह थी, बर्मा की सीमाओं का विस्तार। ऐसे में बर्मा से लगते इलाकों में कुकी लोगों को बसाया गया, ताकि उधर से कोई खतरा ना रहे। इसी तरह, अंग्रेजों ने शुरू से ही राज्य को मैदान और पहाड़ों में बांटकर रखा।
जेम्स जॉनस्टोन के मुताबिक, यह रणनीति इतनी सफल रही थी कि बंगाल सरकार ने भी इसे अपना लिया। उत्तरी कछार में उसने कुकी लोगों की कॉलोनियां बसाईं ताकि वे एक बैरियर का काम कर सकें।
कुकी लोगों का इस्तेमाल इस तरह से किया गया कि इतिहास का यह छोटा-सा हिस्सा हमेशा के लिए उनके जेहन में बस गया। वे भी अपना महत्व एक बफर जोन के रूप में देखने लगे। इसकी एक बानगी 1891 में हुए एंग्लो-मणिपुर युद्ध (Anglo-Manipur War) से मिलती है।
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ब्रिटिश संसद में उठा था Manipur का मुद्दा
1857 की क्रांति के बाद पूरे देश में स्वतंत्रता आंदोलन की लहर तेज होती गई थी। लेकिन, मणिपुर (Manipur) में चिंता यह थी कि ब्रिटिश साम्राज्य अब उन्हें पहले जैसी रणनीतिक अहमियत नहीं दे रहा। इतिहासकारों के मुताबिक, बर्मा के साथ हुए तीसरे युद्ध में अंग्रेजों को जीत मिली थी। बर्मा का एक हिस्सा कब्जे में आ गया था अंग्रेजों के। ऐसे में मणिपुर पर से उनका ध्यान हट गया। उनके लिए इस इलाके की पहले जैसी अहमियत भी नहीं रही थी।
इससे उपजे असंतोष ने जन्म दिया विद्रोह को। उस लड़ाई में कुछ अंग्रेज ऑफिसर मारे गए थे। यह मुद्दा ब्रिटेन की संसद में भी उठा। उस समय भी राज्य को सीधे शासन में लाने का फैसला नहीं हुआ। बफर जोन वाली रणनीति ही जारी रखी गई।
जाहिर है कि मैतई और कुकी लोगों के बीच आज जो बंटवारा (Manipur Meitei vs Kuki conflict) दिख रहा है, उसके बीज अंग्रेजों ने बोए। उनकी अपनी सामरिक और रणनीति मजबूरी थी, लेकिन उसे उन्होंने मणिपुर की जनता पर लाद दिया।
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आजादी के बाद Manipur को लेकर रणनीतिक भूल
इसका असर आजादी के बाद भी देखने को मिला। जम्मू-कश्मीर, हैदराबाद और जूनागढ़ समेत जो कुछ मुट्ठीभर रियासतें थीं, जिन्होंने देश की आजादी के बाद विलय पर हस्ताक्षर किए, उनमें एक नाम मणिपुर का भी था। 15 अक्टूबर 1949 को राज्य अभिन्न अंग बना हिंदुस्तान का। 1972 में जाकर इसे पूर्ण राज्य का दर्जा मिल गया। लोकतंत्र आने के बाद राजा-रजवाड़ा वाला मामला तो नहीं रहा, लेकिन सुरक्षा को लेकर जो नजरिया अंग्रेजों ने बनाया था, वह कायम रह गया।
एक्सपर्ट्स का मानना है कि मणिपुर के कुकी बहुल इलाकों को बफर जोन के रूप में इस्तेमाल करने की रणनीति सबसे बड़ी भूल थी। यह सोचना ही गलत था कि बर्मा में हो रही घटनाओं से खुद को बचाने के लिए मणिपुर का इस्तेमाल एक कवच के रूप में किया जाए।
नतीजा यह निकला कि विकास की उम्मीद में आबादी ने या तो इंफाल घाटी का रुख किया या फिर उग्रवाद और नशे की खेती का दामन थाम लिया।
मणिपुर में पोस्ता की खेती पर प्रतिबंध (Poppy cultivation in Manipur) है। बावजूद इसके राज्य के पहाड़ी इलाकों और यहां तक कि इंफाल घाटी के कुछ हिस्सों में भी इसकी खेती धड़ल्ले से हो रही।
एक रिपोर्ट बताती है कि कई समुदाय शामिल हैं नशे के इस कारोबार में। इसमें बाहर से फंडिंग होती है। पड़ोसी देशों की ड्रग कार्टेल्स ने मणिपुर के किसानों को पोस्ता की खेती के साथ-साथ हेरोइन और ब्राउन शुगर के उत्पादन के लिए भी प्रेरित किया है।
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