
स्विट्जरलैंड के खूबसूरत शहर Vevey की एक लैब में वैज्ञानिक कुछ ऐसा कर रहे हैं, जो सुनने में साइंस फिक्शन जैसा लगता है। वहां इंसान के मस्तिष्क की कोशिकाओं से कंप्यूटर प्रोसेसर बनाए जा रहे हैं (Computers from the human brain)। ये मिनी ब्रेन कहलाते हैं और इन्हें जिंदा रखने के लिए एक खास तरह का तरल दिया जाता है। फर्क बस इतना है कि अगर ये ‘मिनी ब्रेन’ मर जाएं, तो इन्हें किसी लैपटॉप की तरह ‘रीस्टार्ट’ नहीं किया जा सकता।
क्या है बायोकंप्यूटिंग (Biocomputing)?
इस नई तकनीक को बायोकंप्यूटिंग (Biocomputing) या वेटवेयर (Wetware) कहा जाता है। इसका मतलब है, कंप्यूटर को इंसान के असली दिमाग की कोशिकाओं से चलाना (Computers from the human brain)।
अब तक जो कंप्यूटर चिप्स बनाए जाते थे, वे सिलिकॉन (Silicon Chips) से बनते थे, जो दिमाग की नकल करते थे। लेकिन अब वैज्ञानिक कह रहे हैं कि जब हमारे पास असली मस्तिष्क कोशिकाएं हैं, तो उनकी नकल क्यों करें?
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AI से ज्यादा समझदार और कम बिजली खर्च करने वाले
स्विट्जरलैंड की स्टार्टअप कंपनी FinalSpark इस रिसर्च में आगे है। कंपनी के सह-संस्थापक फ्रेड जॉर्डन (Fred Jordan) कहते हैं कि आने वाले समय में मानव मस्तिष्क से बने ये प्रोसेसर, आज के AI Chips की जगह ले सकते हैं। (Computers from the human brain)
उनके मुताबिक, जैविक न्यूरॉन (Biological Neurons) कृत्रिम न्यूरॉन से दस लाख गुना कम बिजली खर्च करते हैं।
आज की आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) तकनीक बहुत ज्यादा बिजली खाती है। कुछ कंपनियों को तो अपने सुपरकंप्यूटर चलाने के लिए न्यूक्लियर पावर (Nuclear Power) तक का इस्तेमाल करना पड़ रहा है। ऐसे में बायोकंप्यूटिंग एक सस्ता और पर्यावरण के अनुकूल विकल्प हो सकता है। (Computers from the human brain)
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कैसे बनते हैं ये जीवित प्रोसेसर?
FinalSpark सबसे पहले स्टेम सेल्स खरीदती है। ये कोशिकाएं इंसान की त्वचा से ली जाती हैं। फिर इन्हें लैब में बदलकर न्यूरॉन्स बनाया जाता है यानी वही कोशिकाएं जिनसे हमारा मस्तिष्क काम करता है।
इन न्यूरॉन्स को इकट्ठा करके छोटे-छोटे गोले बनाए जाते हैं जिन्हें ब्रेन ऑर्गेनॉइड्स (Brain Organoids) कहते हैं। इनका आकार सिर्फ कुछ मिलीमीटर होता है, यानी एक मक्खी के लार्वा के दिमाग जितना। (Computers from the human brain)
फिर वैज्ञानिक इन पर इलेक्ट्रोड्स (Electrodes) लगाते हैं, ताकि वे देख सकें कि ये मस्तिष्क कोशिकाएं आपस में कैसी बातचीत करती हैं। जब इन पर हल्की बिजली की तरंग भेजी जाती है, तो अगर वे प्रतिक्रिया देती हैं तो उसे 1 माना जाता है, और अगर नहीं देतीं तो 0 – जैसे कंप्यूटर का बाइनरी कोड (Binary Code)।
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जिंदा दिमाग से चला रोबोट
इंग्लैंड की ब्रिस्टल यूनिवर्सिटी के एक शोधकर्ता बेंजामिन वॉर्ड-चेरीयर (Benjamin Ward-Cherrier) ने इन ‘मिनी ब्रेन’ में से एक को एक छोटे रोबोट के दिमाग के रूप में इस्तेमाल किया। वह रोबोट Braille Letters को पहचानने में सफल रहा।
हालांकि, वॉर्ड-चेरीयर ने कहा कि यह काम बहुत कठिन है, क्योंकि यह समझना मुश्किल होता है कि ये जिंदा कोशिकाएं किसी जानकारी को कैसे समझती हैं और कैसी प्रतिक्रिया देती हैं। (Computers from the human brain)
अभी यह तकनीक शुरुआती दौर में है, लेकिन वैज्ञानिकों का मानना है कि आने वाले समय में बायोकंप्यूटिंग (Biocomputing) कंप्यूटर की दुनिया को पूरी तरह बदल सकती है।
अगर वैज्ञानिक इन जीवित दिमाग कोशिकाओं को स्थिर और लंबे समय तक चलने वाला बना पाए, तो एक दिन हमारे कंप्यूटरों में जीवित न्यूरॉन (Living Neurons) काम कर रहे होंगे – बिल्कुल हमारे अपने दिमाग की तरह। (Computers from the human brain)
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