
US Iran Talks Failed : अमेरिका और ईरान के बीच कई दशकों में सबसे उच्च स्तर की बातचीत भी किसी समझौते तक नहीं पहुंच सकी। इस्लामाबाद में करीब 21 घंटे चली मैराथन वार्ता बिना किसी डील के खत्म हो गई। दोनों देशों ने संकेत दिए हैं कि बातचीत आगे भी जारी रह सकती है, लेकिन फिलहाल परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंधों में राहत, समुद्री नियंत्रण और क्षेत्रीय मुद्दों पर गहरे मतभेद बने हुए हैं।
आइए जानते हैं बातचीत विफल रहने के कारण (US Iran Talks Failed)
ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर सबसे बड़ा टकराव
वार्ता की सबसे बड़ी रुकावट ईरान का परमाणु कार्यक्रम बना। अमेरिका चाहता था कि ईरान स्पष्ट और मजबूत गारंटी दे कि वह कभी परमाणु हथियार क्षमता विकसित नहीं करेगा। वॉशिंगटन की मांग थी कि यूरेनियम संवर्धन और उससे जुड़ी तकनीकों पर सख्त नियंत्रण लगाया जाए।
दूसरी ओर ईरान ने इसे अपनी संप्रभुता और राष्ट्रीय अधिकारों पर दबाव बताया। तेहरान का कहना है कि शांतिपूर्ण परमाणु कार्यक्रम उसका अधिकार है। यही वह मुद्दा था, जहां दोनों पक्ष अपनी-अपनी लाल रेखाओं से पीछे हटने को तैयार नहीं दिखे (US Iran Talks Failed)।
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प्रतिबंधों में राहत और फंसी संपत्तियों पर विवाद
ईरान लंबे समय से आर्थिक प्रतिबंधों से जूझ रहा है। ऐसे में उसने वार्ता के दौरान विदेशों में जमी अपनी संपत्तियों को रिलीज करने की मांग रखी। इसमें कतर और अन्य देशों में फंसे फंड भी शामिल बताए गए।
लेकिन अमेरिकी अधिकारियों ने साफ किया कि ऐसी किसी शर्त पर सहमति नहीं बनी है। इससे साफ हो गया कि आर्थिक राहत को लेकर दोनों पक्षों की उम्मीदें अलग-अलग थीं।
ईरान चाहता था कि पहले राहत मिले, जबकि अमेरिका चाहता था कि पहले ठोस कदम उठाए जाएं। यही अंतर बातचीत को आगे बढ़ने से रोकता रहा (US Iran Talks Failed)।
Strait of Hormuz पर नियंत्रण
दुनिया की ऊर्जा सप्लाई के लिए बेहद अहम Strait of Hormuz भी विवाद का बड़ा कारण बना। यह समुद्री मार्ग वैश्विक तेल आपूर्ति का लगभग 20% हिस्सा संभालता है। ईरान इस क्षेत्र में अधिक अधिकार चाहता था, जिसमें ट्रांजिट फीस लेने जैसी बातें भी शामिल थीं। दूसरी तरफ अमेरिका ने कहा कि इस रास्ते से वैश्विक शिपिंग बिना बाधा जारी रहनी चाहिए (US Iran Talks Failed)।
अगर इस मार्ग पर तनाव बढ़ता है तो तेल की कीमतों से लेकर वैश्विक व्यापार तक असर पड़ सकता है। इसलिए यह मुद्दा बेहद संवेदनशील रहा।
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ईरान की व्यापक मांगें, अमेरिका का सीमित एजेंडा
बातचीत के दौरान ईरान ने सिर्फ परमाणु मुद्दा नहीं उठाया। उसने युद्ध क्षतिपूर्ति, क्षेत्रीय युद्धविराम और लेबनान समेत पूरे इलाके में संघर्ष रोकने जैसे बड़े मुद्दे भी शामिल कर दिए।
लेकिन अमेरिका का फोकस सीमित था। वह मुख्य रूप से परमाणु प्रतिबंधों और समुद्री सुरक्षा पर केंद्रित रहा। यहीं प्राथमिकताओं का टकराव सामने आया। जब एक पक्ष व्यापक राजनीतिक समझौता चाहता हो और दूसरा सीमित तकनीकी डील, तब सहमति बनाना मुश्किल हो जाता है (US Iran Talks Failed)।
भरोसे की कमी और तनावपूर्ण माहौल
किसी भी बड़ी वार्ता में भरोसा सबसे अहम होता है। यहां वही सबसे कमजोर कड़ी साबित हुआ। दोनों देशों के बीच वर्षों की दुश्मनी, पुराने आरोप और ताजा तनाव लगातार माहौल को प्रभावित करते रहे।
लेकिन राहत की बात है कि वार्ता अभी खत्म नहीं हुई है। ईरान ने कहा है कि कुछ मतभेदों के बावजूद बातचीत जारी रहेगी। यानी कूटनीति का दरवाजा अभी बंद नहीं हुआ है।
हालांकि, दोनों देशों के रुख अभी भी काफी दूर हैं। ऐसे में अगली वार्ता यह तय करेगी कि क्षेत्र में तनाव कम होगा या फिर टकराव और बढ़ेगा।
ट्रंप ने फिर दी धमकी
अमेरिका और ईरान के बीच इस्लामाबाद में हुई वार्ता बिना किसी समझौते के खत्म (US Iran Talks Failed) होने के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Truth Social पर एक लेख साझा किया, जिसमें संकेत दिया गया कि अगर ईरान अमेरिकी शर्तें नहीं मानता है तो उसके खिलाफ नौसैनिक नाकाबंदी लगाई जा सकती है।
लेख में दावा किया गया कि ऐसी नाकाबंदी से ईरान की अर्थव्यवस्था पर गंभीर असर पड़ सकता है। साथ ही चीन और भारत जैसे उन देशों पर भी दबाव बढ़ेगा, जो ईरानी तेल निर्यात पर निर्भर हैं। इसमें यह भी कहा गया कि यह रणनीति पहले वेनेजुएला के खिलाफ अपनाए गए अमेरिकी आर्थिक दबाव मॉडल जैसी हो सकती है, जहां प्रतिबंधों और समुद्री दबाव के जरिए सरकार पर असर डालने की कोशिश की गई थी।
दूसरी ओर, ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि बातचीत अविश्वास के माहौल में हुई और यह उम्मीद करना अवास्तविक था कि सिर्फ एक दौर की वार्ता में अंतिम समझौता हो जाएगा। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच भरोसे की कमी और मुद्दों की जटिलता को देखते हुए यह स्वाभाविक था कि पहली बैठक में कोई डील नहीं हो सकी (US Iran Talks Failed)।



