
History of Cape Verde : अटलांटिक महासागर के बीचों-बीच बसा केप वर्डे आज अफ्रीका के सबसे शांत, स्थिर और लोकतांत्रिक देशों में गिना जाता है। लेकिन इस छोटे से द्वीपीय देश की कहानी संघर्ष, गुलामी, अकाल, उपनिवेशवाद और आजादी के लंबे सफर से होकर गुजरती है।
कभी यह द्वीप ट्रांस-अटलांटिक दास व्यापार का बड़ा केंद्र था। यहां राजनीतिक कैदियों को निर्वासित किया जाता था और धार्मिक उत्पीड़न से भागे लोगों को शरण भी मिलती थी।
इतिहासकारों के अनुसार 1456 में जब पुर्तगाली नाविक यहां पहुंचे तो उन्होंने इन द्वीपों को पूरी तरह निर्जन बताया। अब तक ऐसा कोई पुरातात्विक प्रमाण नहीं मिला है जिससे यह साबित हो सके कि यहां पहले कोई मानव बस्ती थी (History of Cape Verde)।
उस समय पुर्तगाल नई समुद्री व्यापारिक राहों की तलाश में था। यूरोप से भारत और पश्चिमी अफ्रीका तक पहुंचने के लिए उसे नया समुद्री मार्ग चाहिए था, क्योंकि मसालों, सोने और गुलामों के व्यापार पर उस समय तुर्क और इस्लामी व्यापारियों का नियंत्रण था।
पुर्तगाल ने कैसे खोजा केप वर्डे?
पुर्तगाल के प्रसिद्ध राजकुमार हेनरी द नेविगेटर (Henry the Navigator) ने अफ्रीका की समुद्री खोजों की शुरुआत की। उनके अभियान के दौरान 1456 में वेनिस के नाविक अल्वीसे कैडामोस्तो (Alvise Cadamosto) ने इन द्वीपों को देखा। हालांकि आधिकारिक खोज का श्रेय 1460 में जेनोआ के नाविक एंटोनियो दा नोली (António da Noli) को दिया गया (History of Cape Verde)।
इसके बाद पुर्तगाली नाविक डिएगो अफोंसो ने अलग-अलग द्वीपों का सर्वे किया और संतों के नाम पर उनके नाम रखे। 1461 में सैंटियागो (Santiago) द्वीप पर पहली यूरोपीय बस्ती बसाई गई। यह सहारा रेगिस्तान के दक्षिण में यूरोप की पहली स्थायी कॉलोनी बनी।
कैसे बना गुलाम व्यापार का सबसे बड़ा केंद्र?
सैंटियागो द्वीप पर बसने के कुछ वर्षों बाद पुर्तगाल ने यहां गुलाम रखने की अनुमति दे दी। धीरे-धीरे अफ्रीका से हजारों लोगों को पकड़कर यहां लाया जाने लगा (History of Cape Verde)।
1510 तक जहां केवल कुछ दर्जन गुलाम थे, वहीं 1580 तक यहां लगभग 14 हजार गुलाम और केवल 2 हजार स्वतंत्र लोग रह गए थे।
उस समय रिबेरा ग्रांडे (आज का Cidade Velha) ट्रांस-अटलांटिक दास व्यापार का सबसे महत्वपूर्ण बंदरगाह बन गया। यहां से गुलामों को अमेरिका और यूरोप भेजा जाता था। साथ ही गन्ना, रम, कपास, नमक और पशुधन का भी व्यापार होता था।
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टॉर्डेसिलास संधि ने बदल दी दुनिया का नक्शा
1492 में अमेरिका की खोज के बाद स्पेन और पुर्तगाल के बीच नए क्षेत्रों को लेकर विवाद बढ़ गया। 1494 में टॉर्डेसिलास संधि हुई, जिसके तहत केप वर्डे के पश्चिम से एक काल्पनिक रेखा खींची गई (History of Cape Verde)।
इस रेखा के पूर्व का क्षेत्र पुर्तगाल और पश्चिम का क्षेत्र स्पेन को दिया गया। इस समझौते ने आगे चलकर दुनिया के कई देशों के औपनिवेशिक इतिहास को प्रभावित किया।
समुद्री लुटेरे, सूखा और अकाल
16वीं और 17वीं शताब्दी में डच, फ्रांसीसी और ब्रिटिश समुद्री लुटेरों ने केप वर्डे पर लगातार हमले किए। व्यापार कमजोर पड़ने लगा और राजधानी को रिबेरा ग्रांडे से हटाकर प्राया (Praia) ले जाना पड़ा।
इसके बाद कई वर्षों तक पड़े भीषण सूखे ने हालात और खराब कर दिए। 1773 के अकाल में देश की लगभग आधी आबादी की मौत हो गई। आने वाले वर्षों में भी सूखा बार-बार इस देश की सबसे बड़ी समस्या बना रहा (History of Cape Verde)।
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गुलामी खत्म हुई, लेकिन गरीबी नहीं
19वीं शताब्दी में दुनिया भर में गुलामी के खिलाफ आंदोलन तेज होने लगे। 1878 में केप वर्डे में भी आधिकारिक रूप से दास प्रथा समाप्त कर दी गई।
हालांकि इससे लोगों की आर्थिक स्थिति में बहुत बड़ा बदलाव नहीं आया। पुर्तगाल ने यहां विकास में बहुत कम निवेश किया था। पानी की कमी, कमजोर कृषि, दूरस्थ भौगोलिक स्थिति और गिरते निर्यात ने देश को गरीबी में धकेले रखा (History of Cape Verde)।
20वीं शताब्दी के मध्य तक केप वर्डे में स्वतंत्रता की मांग तेज होने लगी। इस आंदोलन का नेतृत्व प्रसिद्ध क्रांतिकारी अमिलकार काब्राल (Amílcar Cabral) ने किया, जिन्होंने 1956 में PAIGC (African Party for the Independence of Guinea and Cape Verde) की स्थापना की।
उन्होंने गिनी-बिसाऊ और केप वर्डे, दोनों की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया। 1973 में उनकी हत्या कर दी गई, लेकिन उनका आंदोलन नहीं रुका (History of Cape Verde)।
1974 में पुर्तगाल में हुई कार्नेशन क्रांति (Carnation Revolution) ने तानाशाही शासन का अंत कर दिया। इसके बाद केप वर्डे में सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया शुरू हुई।
5 जुलाई 1975 को केप वर्डे ने आधिकारिक रूप से स्वतंत्र राष्ट्र बनने की घोषणा की। अरिस्तीदेस परेरा देश के पहले राष्ट्रपति बने, जबकि पेड्रो पायर्स पहले प्रधानमंत्री बने (History of Cape Verde)।
1980 में नया संविधान लागू किया गया और बाद में PAIGC का नाम बदलकर PAICV (African Party for the Independence of Cape Verde) कर दिया गया।
आज क्यों मिसाल माना जाता है केप वर्डे?
आजादी के समय देश के सामने भारी बेरोजगारी, सूखा, खाली सरकारी खजाना और कमजोर अर्थव्यवस्था जैसी गंभीर चुनौतियां थीं। लेकिन अंतरराष्ट्रीय सहयोग, शिक्षा, लोकतांत्रिक संस्थाओं की मजबूती और राजनीतिक स्थिरता के दम पर केप वर्डे ने धीरे-धीरे खुद को बदल लिया।
आज यह देश अफ्रीका के सबसे स्थिर लोकतंत्रों में गिना जाता है। यहां शांतिपूर्ण सत्ता परिवर्तन, स्वतंत्र चुनाव, मजबूत संविधान और सामाजिक सौहार्द इसकी सबसे बड़ी पहचान हैं (History of Cape Verde)।



