
Mahatma Gandhi on Israel Palestine : इजरायल और फिलिस्तीन के बीच संघर्ष आज भी पश्चिम एशिया की सबसे जटिल समस्याओं में से एक है। इस विवाद की जड़ें करीब एक सदी पुरानी हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस संघर्ष और यहूदियों के उत्पीड़न पर महात्मा गांधी ने भी अपने विचार रखे थे?
गांधी जी ने यहूदियों के साथ हुए सदियों पुराने भेदभाव और जर्मनी में उनके उत्पीड़न पर गहरी चिंता जताई थी, लेकिन फिलिस्तीन में यहूदियों के लिए अलग राष्ट्र बनाने के विचार का समर्थन नहीं किया था।
नवंबर 1938 में गांधी का एक लेख साप्ताहिक पत्रिका ‘हरिजन’ में प्रकाशित हुआ था। इसमें उन्होंने जर्मनी में यहूदियों पर हो रहे अत्याचार, फिलिस्तीन में अरबों और यहूदियों के बीच विवाद और इस समस्या के समाधान में अहिंसा की भूमिका पर विस्तार से बात की थी (Mahatma Gandhi on Israel Palestine)।
यह भी पढ़ें : क्या महात्मा गांधी भगत सिंह को बचा सकते थे?
यहूदियों के दर्द को समझते थे गांधी
गांधी ने साफ कहा था कि उन्हें यहूदियों के प्रति पूरी सहानुभूति है। दक्षिण अफ्रीका में रहते हुए उनका कई यहूदी लोगों से करीबी संपर्क रहा था। इनमें से कुछ उनके जीवनभर के मित्र भी बने।
गांधी ने यहूदियों पर सदियों से चले आ रहे उत्पीड़न की तुलना भारत में दलितों के साथ हुए भेदभाव से की थी। उनका कहना था कि जिस तरह हिंदू समाज में अछूतों के साथ भेदभाव किया गया, उसी तरह ईसाई समाज में यहूदियों को लंबे समय तक अलग और वंचित रखा गया (Mahatma Gandhi on Israel Palestine)।
जर्मनी में नाजी शासन के दौरान यहूदियों पर हो रहे अत्याचार को लेकर गांधी बेहद चिंतित थे। उनका मानना था कि यहूदियों को अपनी स्थिति और अपने अधिकारों के लिए अहिंसा का रास्ता अपनाना चाहिए।
फिलिस्तीन को लेकर गांधी की सोच क्या थी?
यहां गांधी का रुख कुछ अलग था। यहूदियों के प्रति सहानुभूति रखने के बावजूद वह फिलिस्तीन में अरबों को हटाकर यहूदियों के लिए अलग देश बनाने के विचार के खिलाफ थे (Mahatma Gandhi on Israel Palestine)।
गांधी का तर्क था कि जिस तरह इंग्लैंड अंग्रेजों का और फ्रांस फ्रांसीसियों का है, उसी तरह फिलिस्तीन अरबों की भूमि है। उनका मानना था कि केवल किसी धार्मिक या ऐतिहासिक दावे के आधार पर वहां रहने वाले अरबों को हटाना उचित नहीं हो सकता।
उन्होंने लिखा था कि फिलिस्तीन को आंशिक या पूरी तरह यहूदियों का घर बनाने के लिए अरबों को वहां से हटाना मानवता के खिलाफ होगा। ब्रिटिश हथियारों के सहारे फिलिस्तीन में यहूदियों का प्रवेश भी उन्हें गलत लगता था (Mahatma Gandhi on Israel Palestine)।
गांधी के मुताबिक धार्मिक उद्देश्य को हथियारों के सहारे हासिल नहीं किया जा सकता। अगर यहूदी फिलिस्तीन में रहना चाहते हैं तो उन्हें अरबों की सहमति और सद्भावना हासिल करने का प्रयास करना चाहिए।
‘फिलिस्तीन दिल में है’
गांधी ने यहूदी धार्मिक भावना और फिलिस्तीन के बीच संबंध को भी समझने की कोशिश की थी। उनका मानना था कि धार्मिक ग्रंथों में जिस फिलिस्तीन की कल्पना की गई है, वह केवल किसी नक्शे पर मौजूद जमीन नहीं है, बल्कि लोगों के विश्वास और भावनाओं में भी मौजूद है (Mahatma Gandhi on Israel Palestine)।
लेकिन अगर यहूदी फिलिस्तीन को भौगोलिक रूप से अपना घर मानते हैं, तो गांधी का सवाल था कि क्या वहां रहने वाले अरबों को हटाकर यह दावा किया जा सकता है? उनके अनुसार किसी भूमि पर अधिकार प्रेम, संवाद और सेवा के जरिए हासिल किया जाना चाहिए, हथियारों के बल पर नहीं।
गांधी का अहिंसा का संदेश
गांधी ने अरबों की हर कार्रवाई का बचाव भी नहीं किया। उन्होंने यह जरूर कहा कि अरबों को भी अपने विरोध के लिए अहिंसा का रास्ता चुनना चाहिए था (Mahatma Gandhi on Israel Palestine)।
उनका मानना था कि यहूदी और अरब दोनों एक-दूसरे की इंसानियत और धार्मिक भावनाओं को समझें। गांधी के लिए समाधान का रास्ता हिंसा से नहीं, बल्कि आपसी सद्भाव और संवाद से होकर जाता था।
उनका विचार था कि यहूदी दुनिया में जहां रहते हैं, वहां प्रेमपूर्ण सेवा और सहयोग के जरिए अपनी जगह बना सकते हैं। फिलिस्तीन में भी यही रास्ता अपनाया जाना चाहिए।
महात्मा गांधी के ये विचार उस समय सामने आए थे जब इजरायल नाम का कोई स्वतंत्र देश अस्तित्व में नहीं था। करीब एक दशक बाद, 14 मई 1948 को इजरायल की स्थापना हुई। यूरोप में यहूदियों पर हुए अत्याचार और द्वितीय विश्व युद्ध के बाद उनके लिए एक सुरक्षित मातृभूमि की मांग तेज हुई थी (Mahatma Gandhi on Israel Palestine)।
इजरायल की स्थापना को फिलिस्तीनियों ने ‘नकबा’ यानी तबाही के रूप में देखा। फिलिस्तीनी पक्ष का कहना है कि इस दौरान बड़ी संख्या में लोगों को अपने घर और जमीन छोड़नी पड़ी। दूसरी ओर, इजरायल इस बात से इनकार करता है कि उसने योजनाबद्ध तरीके से फिलिस्तीनियों को उनके घरों से निकाला।
इजरायल की स्थापना के अगले दिन पांच अरब देशों ने उस पर हमला किया। 1949 में युद्धविराम हुआ, लेकिन स्थायी शांति नहीं हो सकी। जो अरब फिलिस्तीनी उस दौरान इजरायल में रह गए, वे आज वहां की अरब-इजरायली आबादी का हिस्सा हैं, जिसकी संख्या देश की कुल आबादी का करीब पांचवां हिस्सा बताई जाती है।
यह भी पढ़ें : जब इजराइल नहीं था, तब क्या था?
1967 का युद्ध और बदला नक्शा
इजरायल और अरब देशों के बीच अगला बड़ा युद्ध 1967 में हुआ। छह दिवसीय युद्ध में इजरायल ने मिस्र, सीरिया और जॉर्डन से लड़ाई की। इस युद्ध के बाद इजरायल ने वेस्ट बैंक, पूर्वी यरुशलम और गोलान हाइट्स पर नियंत्रण हासिल किया (Mahatma Gandhi on Israel Palestine)।
1967 के युद्ध ने इजरायल-फिलिस्तीन विवाद को और जटिल बना दिया। खासकर वेस्ट बैंक और पूर्वी यरुशलम का सवाल आगे होने वाली हर शांति वार्ता में महत्वपूर्ण बना रहा।
1973 में मिस्र और सीरिया ने इजरायल पर हमला किया। इस युद्ध को योम किप्पुर युद्ध कहा जाता है। शुरुआती हमलों के बाद इजरायल ने जवाबी कार्रवाई की और कुछ ही हफ्तों में दोनों देशों की सेनाओं को पीछे धकेल दिया। इस युद्ध के बाद भी क्षेत्र में तनाव बना रहा, लेकिन इसके साथ ही कूटनीतिक रास्ते भी खुलने लगे।
1982 में इजरायल ने लेबनान में सैन्य कार्रवाई शुरू की। बेरूत की लंबी घेराबंदी के बाद यासिर अराफात के नेतृत्व वाले हजारों फिलिस्तीनी लड़ाकों को लेबनान से बाहर निकाला गया (Mahatma Gandhi on Israel Palestine)।
2006 में इजरायल और लेबनान के हिजबुल्लाह के बीच फिर बड़ा युद्ध हुआ। हिजबुल्लाह द्वारा दो इजरायली सैनिकों को पकड़े जाने के बाद संघर्ष तेज हुआ और इजरायल ने लेबनान में व्यापक सैन्य कार्रवाई की। इजरायल ने 2005 में गाजा से अपने सैनिकों और बस्तियों को हटा लिया। इसके बावजूद गाजा और इजरायल के बीच तनाव खत्म नहीं हुआ।
2006 के बाद गाजा में कई बार बड़े पैमाने पर संघर्ष हुआ। 2008, 2012, 2014 और 2021 में भी इजरायली हवाई हमले और फिलिस्तीनी रॉकेट हमले हुए। कई मौकों पर सीमा पर भी हिंसक झड़पें हुईं। इस दौरान हमास और इजरायल के बीच टकराव लगातार इस संघर्ष का एक प्रमुख हिस्सा बना रहा (Mahatma Gandhi on Israel Palestine)।
दो इंतिफादा ने बदला संघर्ष का स्वरूप
इजरायल-फिलिस्तीन संघर्ष में दो बड़े फिलिस्तीनी विद्रोह यानी इंतिफादा भी हुए। पहला इंतिफादा 1987 से 1993 तक चला, जबकि दूसरा 2000 से 2005 के बीच हुआ।
दूसरे इंतिफादा के दौरान इजरायल में कई आत्मघाती हमले हुए। हमास समेत कई फिलिस्तीनी संगठनों की हिंसक गतिविधियों के जवाब में इजरायल ने भी व्यापक सैन्य कार्रवाई की।
युद्ध के बीच शांति की कोशिशें
इजरायल और अरब देशों के बीच संघर्ष के साथ-साथ शांति की कोशिशें भी चलती रहीं।
1979 में मिस्र और इजरायल ने शांति समझौते पर हस्ताक्षर किए। इसके साथ दोनों देशों के बीच करीब तीन दशक से चली आ रही दुश्मनी का औपचारिक अंत हुआ।
इसके बाद 1993 में ओस्लो समझौते ने इजरायल और फिलिस्तीन के बीच बातचीत को नई दिशा दी। इजरायली प्रधानमंत्री यित्ज़ाक राबिन और फिलिस्तीनी नेता यासिर अराफात के बीच समझौते के तहत सीमित फिलिस्तीनी स्वायत्तता की व्यवस्था की गई (Mahatma Gandhi on Israel Palestine)।
2002 में अरब शांति पहल के तहत भी एक व्यापक प्रस्ताव सामने आया। इसमें 1967 के युद्ध के बाद कब्जे में आए क्षेत्रों से इजरायल की वापसी, फिलिस्तीनी राज्य की स्थापना और फिलिस्तीनी शरणार्थियों के लिए समाधान के बदले अरब देशों की ओर से इजरायल के साथ सामान्य संबंधों का प्रस्ताव रखा गया था।
हालांकि 2014 में वॉशिंगटन में हुई बातचीत के विफल होने के बाद इजरायल और फिलिस्तीन के बीच औपचारिक शांति प्रक्रिया लंबे समय तक आगे नहीं बढ़ सकी (Mahatma Gandhi on Israel Palestine)। इस समय भी दोनों पक्ष आमने-सामने हैं।
Vande Mataram : वंदे मातरम् पर विरोध! कहीं हम जिन्ना की चाल में तो नहीं फंस गए



