
Israel vs Palestine
इजराइल और फिलिस्तीन के बीच संघर्ष (Israel vs Palestine) कई दशकों से दुनिया के सामने एक खुला जख्म बना हुआ है। अब यह जख्म और गहरा हो गया है, क्योंकि 28 मई 2025 को इजराइल सरकार ने वेस्ट बैंक (West Bank) में 22 नई यहूदी बस्तियों (Jewish Settlements) को मंजूरी दे दी है।
इसके साथ ही कई और नई बस्तियों को बसाने की योजना भी बनाई गई है। यह सिर्फ घर बनाने या बसावट की बात नहीं है, बल्कि यह साफ संकेत है कि इजराइल अब फिलिस्तीन को एक अलग और स्वतंत्र देश मानने के रास्ते से पीछे हट रहा है।
प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की सरकार ने एक बंद दरवाजों के अंदर हुई बैठक में इस योजना को मंजूरी दी। इससे वेस्ट बैंक की पहले से जटिल राजनीतिक स्थिति और उलझ गई है। इनमें कई बस्तियां पहले बिना इजाजत के बनाई गई थीं, लेकिन अब उन्हें इजराइली सरकार ने ‘कानूनी’ मान लिया है।
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साथ ही कुछ नई बस्तियां ऐसे इलाकों में बसाई जाएंगी जिन्हें अब तक फिलिस्तीन के भविष्य के देश का हिस्सा माना जाता था।
इस फैसले के साथ इजराइल ने साफ कर दिया है कि अब वह टू-स्टेट सॉल्यूशन (Two-State Solution) – यानी इजराइल और फिलिस्तीन (Israel vs Palestine) को दो अलग-अलग, स्वतंत्र देशों के रूप में मान्यता देने की योजना को गंभीरता से नहीं ले रहा।
यह फिलिस्तीन के लिए सिर्फ एक कूटनीतिक झटका नहीं है, बल्कि उसके भूगोल, आबादी और राजनीतिक पहचान पर सीधा हमला है। क्योंकि वेस्ट बैंक, जिसे एक भविष्य के फिलिस्तीनी देश का मुख्य हिस्सा माना जाता है, अब इजराइली बस्तियों की वजह से टुकड़ों में बंटता जा रहा है।
इस योजना के पीछे वित्त मंत्री बेजालेल स्मोट्रिच का सबसे बड़ा हाथ माना जा रहा है। उन्होंने इसे यहूदी संप्रभुता का वर्ष बताया है। स्मोट्रिच पहले ही वेस्ट बैंक में कई प्रशासनिक अधिकार अपने मंत्रालय को दिलवा चुके हैं, जो पहले सेना के पास थे।
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अब यहूदी बस्तियों का निर्माण और उनका विस्तार सीधे नागरिक प्रशासन की मदद से किया जाएगा, जिससे यह प्रक्रिया पहले से कहीं ज्यादा तेज और आसान हो जाएगी। इसके साथ ही फिलिस्तीनियों के लिए जिंदगी और कठिन होती जाएगी।
इस कदम के पूरा होने के साथ ही फिलिस्तीन के साथ चली आ रही लंबी लड़ाई इजराइल (Israel vs Palestine) करीब-करीब जीत जाएगा।
इस योजना की दुनिया भर में आलोचना हुई है। अमेरिका समेत G7 देशों ने इसे वेस्ट बैंक में तनाव बढ़ाने वाला कदम बताया है, और संयुक्त राष्ट्र ने कहा है कि यह फैसला अंतरराष्ट्रीय कानूनों के खिलाफ है। लेकिन ये आलोचनाएं सिर्फ बयान तक ही सीमित रहीं। न तो इजराइल पर कोई आर्थिक दबाव डाला गया, न कोई पाबंदी लगाई गई और न ही किसी बड़े अंतरराष्ट्रीय मंच पर इसे रोकने की कोई ठोस कोशिश की गई।
इजराइल द्वारा वेस्ट बैंक में 22 नई यहूदी बस्तियों को मंजूरी देना सिर्फ एक और राजनीतिक फैसला नहीं है, बल्कि यह एक भू-राजनीतिक दिशा संकेत करता है – एक ऐसा रास्ता जिसमें इजराइल के साथ लड़ाई में फिलिस्तीन (Israel vs Palestine) की जमीन लगातार सिकुड़ती जा रही है और टू-स्टेट सॉल्यूशन (Two-State Solution) अब केवल दस्तावेजों और भाषणों तक सीमित रह गया है।
मुस्लिम देशों की चुप्पी इस पूरे मामले में और भी ज्यादा चौंकाने वाली है। सऊदी अरब, यूएई, मिस्र जैसे देश जो कभी फिलिस्तीन की आवाज बनते थे, अब पश्चिमी देशों से अपने आर्थिक और सामरिक रिश्तों के चलते खुलकर विरोध नहीं कर पा रहे।
कुछ बयानों से आगे कुछ नहीं होता। इसका मतलब साफ है – फिलिस्तीन अब अकेला पड़ता जा रहा है।



