
Karl Marx
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन (MK Stalin) ने हाल ही में विधानसभा में घोषणा की कि राज्य सरकार जर्मन दार्शनिक और क्रांतिकारी समाजवादी कार्ल मार्क्स (Karl Marx) की एक प्रतिमा चेन्नै में स्थापित करेगी। इसके साथ ही, ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक के प्रमुख नेता पी.के. मूकैया थेवर (Mookiah Thevar) की स्मृति में मदुरै के उसिलामपट्टी में एक स्मारक बनाया जाएगा।
श्रमिक आंदोलन को सम्मान
मुख्यमंत्री स्टालिन ने कहा कि चेन्नै, जहां सौ साल पहले श्रमिक आंदोलन की नींव रखी गई थी, वहां कार्ल मार्क्स (Karl Marx) की प्रतिमा स्थापित करना उपयुक्त होगा। उन्होंने मार्क्स (Karl Marx) को एक वैश्विक क्रांतिकारी व्यक्तित्व बताते हुए कहा, ‘कार्ल मार्क्स ने हमें ‘विश्व के मजदूरों, एक हो’ का नारा दिया।’
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मूकैया थेवर सामाजिक न्याय के योद्धा
पी.के. मूकैया थेवर का जन्म 4 अप्रैल 1923 को मदुरै जिले के पप्पपट्टी गांव में हुआ था। उन्होंने छात्र नेता के रूप में सामाजिक गतिविधियों में भाग लिया और बाद में कल्लर एजुकेशनल ट्रस्ट की स्थापना की, जिसका उद्देश्य दक्षिणी तमिलनाडु में पिछड़े वर्गों के उत्थान के लिए काम करना था।
थेवर ने ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक में शामिल होकर राजनीति में कदम रखा और पेरियाकुलम विधानसभा क्षेत्र से 1952 में विधायक चुने गए। इसके बाद, उन्होंने उसिलामपट्टी से चार बार विधायक के रूप में सेवा की।
1971 में, थेवर ने एक साथ विधानसभा और लोकसभा चुनाव जीते, जो उनकी लोकप्रियता को दर्शाता है। उन्होंने रामनाथपुरम लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया और 1971 से 1977 तक सांसद रहे।
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मुख्यमंत्री स्टालिन ने थेवर की उपलब्धियों को याद करते हुए कहा कि उन्होंने कच्चाथीवु द्वीप को श्रीलंका को सौंपने का विरोध किया था और पूर्व मुख्यमंत्री सी.एन. अन्नादुरई से थेवर समुदाय के लिए शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना का अनुरोध किया था।
सोशल मीडिया पर कार्ल मार्क्स (Karl Marx) पर बहस
X पर @420GHz हैंडल से लिखा गया है, कार्ल मार्क्स (Karl Marx) उदारवादी नहीं थे। दरअसल, वे उदारवाद के कट्टर आलोचक थे। उनके अनुसार, उदारवाद एक ऐसी विचारधारा थी जो पूंजीपति वर्ग (बुर्जुआ वर्ग) के हितों की सेवा करती थी। मार्क्स का मानना था कि उदारवाद व्यक्तिगत अधिकारों और स्वतंत्रता की बात करता है, लेकिन यह असल में शोषण को छिपाने का एक तरीका है। उनके अनुसार, उदारवाद पूंजीवादी व्यवस्था को वैध ठहराने का माध्यम था, जो मेहनतकश वर्ग (श्रमिकों) का शोषण करती है और उसे स्वतंत्रता के नाम पर ढक देती है।
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