

जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ जिले के पद्दर (Padder) क्षेत्र में स्थित मचैल माता मंदिर (Machail Mata Temple) भक्तों के लिए आस्था और भक्ति का एक अद्वितीय केंद्र है। यह क्षेत्र न केवल अपने धार्मिक महत्व के लिए प्रसिद्ध है बल्कि यहां की प्राकृतिक सुंदरता, नीलम खदानें, देवदार से ढके पहाड़ और हरे-भरे घास के मैदान इसे और भी खास बनाते हैं।
मचैल माता मंदिर (Machail Mata Temple) का महत्व
मचैल गांव समुद्र तल से लगभग 13,500 फीट की ऊंचाई पर स्थित है, जहां माता चंडी (Mata Chandi) का पवित्र धाम है। मान्यता है कि माता चंडी यहां प्राचीन स्थल मिंडल बट्टास (हिमाचल प्रदेश) से आईं और पद्दर के भोले-भाले लोगों को आशीर्वाद दिया। मंदिर में माता चंडी का रूप शिला (पिंडी) के रूप में विराजमान है।
मंदिर के गर्भगृह में मां चंडी की पिंडी के साथ-साथ मां महाकाली की चांदी की मूर्ति भी स्थापित है। मंदिर लकड़ी से बना है। इसके बाहर पौराणिक देवी-देवताओं की मूर्तियां लकड़ी की पटीकाओं पर अंकित हैं। माना जाता है कि मां चंडी ने इस क्षेत्र में भक्तों की रक्षा और दुष्ट शक्तियों का नाश करने के लिए यह स्थान चुना था।
मचैल माता यात्रा (Machail Mata Yatra) की सबसे खास बात यहां का शिव-पहाड़ (Shiv Pahad) है, जहां एक प्राकृतिक शिवलिंग दिनभर में अपना रंग बदलता है। इसे शिव और शक्ति का अनोखा संगम माना जाता है, जो पूरे भारत में केवल यहीं देखने को मिलता है।
43 दिनों का आध्यात्मिक अनुभव
मचैल माता यात्रा (Machail Mata Yatra) जम्मू-कश्मीर के प्रमुख धार्मिक आयोजनों में से एक है, जो हर साल जुलाई-अगस्त के पावन महीनों में आयोजित होती है और कुल 43 दिनों तक चलती है। वर्ष 2025 में यह पवित्र यात्रा 25 जुलाई से आरंभ होकर 5 सितंबर तक जारी रहेगी। इस दौरान लाखों श्रद्धालु माता के दर्शन के लिए यहां पहुंचते हैं।
यात्रा का सबसे प्रमुख आकर्षण पवित्र छड़ी यात्रा है, जो जम्मू से प्रारंभ होकर 22 अगस्त को मचैल माता के दरबार में पहुंचती है, जहां विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है।
पहले मंदिर तक पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को लगभग 30 किलोमीटर का कठिन पैदल सफर तय करना पड़ता था, लेकिन हाल के वर्षों में सड़क निर्माण और छोसोटी (Chishoti) गांव में पुल बनने से यह दूरी घटकर मात्र 7 किलोमीटर रह गई है। अनुमान है कि पुल का पूरा निर्माण होने के बाद यह दूरी केवल 3 किलोमीटर रह जाएगी, जिससे यात्रा और अधिक सुगम हो जाएगी।
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यात्रा के दौरान जिला प्रशासन द्वारा सुरक्षा, स्वास्थ्य और अन्य सुविधाओं की पूरी व्यवस्था की जाती है। प्रतिदिन कुल 8,000 श्रद्धालुओं को दर्शन की अनुमति दी जाती है, जिसमें 6,000 ऑनलाइन पंजीकरण और 2,000 ऑफलाइन पंजीकरण शामिल होते हैं।
यात्रा का प्रारंभ चिनोट, भद्रवाह (Chinote Bhaderwah) से होता है और लगभग 200 किमी की दूरी तय कर गुलाबगढ़ (Gulabgarh) पहुंचा जाता है।
धाम (Machail Mata Temple) के रास्ते में गुफाएं, झरने, कल-कल बहते झरने, बर्फ से ढकी चोटियां और तीखे पहाड़ों के बीच हरे-भरे नजारे भक्तों का मन मोह लेते हैं। मार्ग में जगह-जगह भंडारे, धार्मिक आयोजन और भजन-कीर्तन होते हैं।
मचैल माता यात्रा का आयोजन सर्व शक्ति सेवक संस्था (Sarv Shakti Sevak Sanstha) करती है, जिसकी स्थापना ठाकुर कुलबीर सिंह जामवाल ने की थी। जिला प्रशासन, पुलिस, सेना, NDRF और SDRF भी यात्रा को सुरक्षित और सुगम बनाने में अहम भूमिका निभाते हैं।
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स्थानीय लोग श्रद्धालुओं का दिल से स्वागत करते हैं, उन्हें अपने घरों में ठहराते हैं और मुफ्त में भोजन एवं अन्य सुविधाएं उपलब्ध कराते हैं। रास्ते में स्थित प्रसिद्ध ततापानी (Tatapani Hot Spring) का पानी स्नान के लिए खास माना जाता है, जो जोड़ों और त्वचा संबंधी रोगों में लाभकारी है।


