
दुनिया के सबसे ताकतवर देशों के नेताओं के हाथों में जब परमाणु बटन (Nuclear weapons) होता है, तो उनसे उम्मीद की जाती है कि वे हर स्थिति में स्थिर दिमाग और बेहतर निर्णय क्षमता के साथ काम लें। लेकिन एक चौंकाने वाले शोध में सामने आया है कि कई बार ये नेता अपनी मानसिक या शारीरिक बीमारियों के चलते खुद ही वैश्विक संकट का कारण बन सकते हैं।
न्यूजीलैंड की यूनिवर्सिटी ऑफ ओटागो के प्रोफेसर निक विल्सन और उनकी टीम ने नौ परमाणु हथियार (Nuclear weapons) संपन्न देशों के 51 दिवंगत नेताओं के स्वास्थ्य रिकॉर्ड का विश्लेषण किया, और पाया कि उनमें से कई अपने कार्यकाल के दौरान गंभीर बीमारियों से जूझ रहे थे।
इस अध्ययन में यह साफ हुआ कि कुछ नेताओं की बीमारियां इतनी गंभीर थीं कि उनका असर उनके कामकाज और फैसलों पर साफ दिखाई देता है। कुछ को कार्यकाल के दौरान ही दिल का दौरा या ब्रेन स्ट्रोक हुआ, वहीं कई अन्य नेता डिमेंशिया, डिप्रेशन, नशे की लत या पर्सनैलिटी डिसऑर्डर जैसी मानसिक समस्याओं से पीड़ित थे।
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कुछ मामलों में तो स्थिति इतनी भयावह थी कि नेताओं को या तो मजबूरन पद छोड़ना पड़ा या उनका मानसिक नियंत्रण समाप्त हो गया। इजराइल के प्रधानमंत्री एरियल शेरोन को स्ट्रोक के बाद कोमा में जाना पड़ा, जबकि मेनाखेम बेगिन ने डिप्रेशन में अपना अंतिम कार्यकाल समाज से कटे हुए बिताया। अमेरिका में राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन जैसे नेता तक संकट की घड़ी में अत्यधिक शराब पीते पाए गए।
सबसे गंभीर बात यह रही कि इन बीमारियों को कई बार जनता और संसद से छुपाया गया। अमेरिका में राष्ट्रपति ड्वाइट आइजनहावर के दिल के दौरे को पाचन समस्या बताया गया, जॉन एफ. केनेडी की एडिसन डिजीज और पीठ दर्द की सच्चाई उनके सलाहकारों ने छिपाई, और रोनाल्ड रीगन के डिमेंशिया के लक्षणों को उनके आखिरी वर्षों तक दबाकर रखा गया।
ये सभी नेता उसी दौर में न्यूक्लियर हथियारों (Nuclear weapons) से जुड़े फैसले ले रहे थे, जब दुनिया शीत युद्ध और क्यूबा मिसाइल संकट जैसी घटनाओं से गुजर रही थी।
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कैंसर में भी पद नहीं छोड़ा
फ्रांस के राष्ट्रपति फ्रांस्वा मितरां ने तो कैंसर जैसी गंभीर बीमारी में भी कार्यकाल नहीं छोड़ा, जबकि उनके डॉक्टर मान चुके थे कि वे निर्णय लेने की स्थिति में नहीं रहे हैं। इस तरह की घटनाएं यह संकेत देती हैं कि सिर्फ बीमारी ही नहीं, बल्कि सत्ता में बने रहने की जिद भी वैश्विक सुरक्षा को खतरे में डाल सकती है।
पाकिस्तान (Pakistan), रूस और उत्तर कोरिया जैसे देशों में भी ऐसे उदाहरण मौजूद हैं, जहां नेताओं की स्वास्थ्य स्थितियों को लेकर पारदर्शिता नहीं रही।
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प्रोफेसर विल्सन मानते हैं कि इस तरह के जोखिमों को कम करने के लिए वैश्विक स्तर पर गंभीर नीतिगत बदलाव जरूरी हैं। सबसे पहले तो यह जरूरी है कि परमाणु हथियारों (Nuclear weapons) को ‘हाई अलर्ट’ मोड से हटाया जाए और ‘नो फर्स्ट यूज’ नीति को लागू किया जाए ताकि किसी भी देश द्वारा पहला हमला करने की गुंजाइश न बचे।
इसके अलावा, किसी एक व्यक्ति के पास न्यूक्लियर हथियारों (Nuclear weapons) के लॉन्च का एकाधिकार न रहे, बल्कि यह अधिकार एक सामूहिक प्रक्रिया के तहत हो। यही नहीं, नेताओं के लिए कार्यकाल की सीमाएं, मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य की नियमित जांच, और जनमत संग्रह के जरिए उन्हें हटाने की व्यवस्था जैसे लोकतांत्रिक उपायों को भी अपनाया जाना चाहिए।
Nuclear weapons पर पॉलिसी बदलने का समय
शोध में यह भी सामने आया कि राजनेताओं में आम जनता की तुलना में मानसिक तनाव और अवसाद के लक्षण कहीं ज्यादा देखे जाते हैं। ब्रिटेन के सांसदों पर हुए एक अध्ययन में पाया गया कि वे अन्य उच्च आय वर्ग के लोगों की तुलना में 34 प्रतिशत अधिक मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से जूझते हैं।
ऐसे में यह जरूरी हो जाता है कि हम न सिर्फ नेताओं के स्वास्थ्य को गंभीरता से लें, बल्कि राजनीति में ऐसी प्रणाली विकसित करें, जिससे उनके मानसिक दबाव को भी समय रहते पहचाना और कम किया जा सके।
अगर हम वाकई दुनिया को न्यूक्लियर संकट से बचाना चाहते हैं, तो हमें यह स्वीकार करना होगा कि इंसान, चाहे कितना भी ताकतवर क्यों न हो, बीमारी और मानसिक कमजोरी से अछूता नहीं होता। और जब ऐसे इंसानों के हाथों में न्यूक्लियर बटन होता है, तो ज़रा-सी चूक भी पूरे विश्व के लिए विनाश का कारण बन सकती है।
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