

डॉ. सौरभ मिश्र
नालंदा (Nalanda) को आज के अर्थों में भले ‘यूनिवर्सिटी’ न कहा जाए, लेकिन यह अपने समय का ऐसा अनोखा शिक्षा-केंद्र था, जिसकी प्रतिष्ठा के सामने कोई समकालीन संस्थान टिक नहीं पाता। तक्षशिला (Taxila University) जैसे पुराने केंद्र मौजूद थे, पर वैश्विक प्रभाव की बात आए तो नालंदा महाविहार ने जिस तरह सोच, शोध और शिक्षण की दिशा बदली, उसका असर आज भी दिखता है। नालंदा में तैयार हुआ ज्ञान – वाद, तर्क, दर्शन और विज्ञान – एशिया से होते हुए दूर-दूर तक पहुँचा और आधुनिक दुनिया की समझ को आकार दिया।
‘आधुनिक भावना की जड़ें प्राचीन परिसर में
राजनयिक अभय कुमार की पुस्तक Nalanda: How It Changed the World बताती है कि ‘आधुनिक विश्वविद्यालय’ जैसा विचार हवा में नहीं आया, इसकी जड़ें नालंदा जैसे केंद्रों में थीं – जहां व्यवस्थित परिसर, आवासीय व्यवस्था, पाठ्यक्रम, रिसर्च और ग्रंथालय एक साथ चलते थे। पुस्तक ‘वर्तमानवाद’ (Presentism) से बचते हुए दिखाती है कि आधुनिकता के कई बीज प्राचीन नालंदा (Nalanda) के प्रांगण में बोए गए थे – ज्ञान की खोज, प्रमाण-आधारित बहस, और विभिन्न विषयों के बीच पुल बनाना।
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सत्ता और ज्ञान का सहजीवी रिश्ता
नालंदा (Nalanda) का उभार संयोग नहीं था। राजगृह/राजगीर (Rajgir) पहले से ही ज्ञान और शक्ति का बड़ा केंद्र था। यहां बुद्ध, महावीर और अन्य दार्शनिक परंपराएं – लोकायत/चार्वाक, आजीवक आदि अपनी बात रखते थे। सार्वजनिक शास्त्रार्थ विद्वता की कसौटी था। बढ़ती राजनीतिक शक्ति, व्यापारिक संपर्क और सांस्कृतिक आदान-प्रदान ने पास के नालंदा ग्राम को एक संगठित, संरक्षित और विकसित शिक्षण-स्थल में बदला, जहां देश-विदेश के प्रतिभाशाली विद्यार्थी और आचार्य अकादमिक माहौल में फलते-फूलते।
उद्गम, विकास और बहुलता की परंपरा
यद्यपि नालंदा (Nalanda) का विधिवत विस्तार गुप्त काल (Gupta Period) में हुआ, इसकी शुरुआत मौर्य सम्राट अशोक (Ashoka) के समय बौद्ध विहार से मानी जाती है। पर बौद्ध होना यहां संकीर्णता का पर्याय नहीं था – नालंदा का स्वभाव बहुवादी था। वैदिक, बौद्ध, जैन और लोकायतिक बहसें साथ-साथ चलतीं। यही कारण है कि नालंदा केवल एक मत का मकान नहीं था, बल्कि विभिन्न विचारों की प्रयोगशाला था, जहां असहमति भी सम्मान के साथ सुनी जाती थी।
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नालंदा (Nalanda) में प्रमाण चलते थे, प्रपंच नहीं
नालंदा की शास्त्रार्थ परंपरा को समझने की कुंजी है प्रमाण। विचार को ‘कौन कह रहा है’ से नहीं, ‘किस आधार पर कह रहा है’ से परखा जाता था। बहस का क्लासिक ढांचा – पूर्वपक्ष, सिद्धांत और खंडन-मंडन – विचार को बार-बार कसौटी पर रखता था। यही पद्धति बाद में ‘पीयर रिव्यू’ जैसी आधुनिक अकादमिक प्रक्रिया की आत्मा बन गई।
यहां तर्क सिर्फ वाकपटुता नहीं था, बल्कि एक अनुशासन था। बौद्ध तर्कशास्त्र की परंपरा, नैयायिक दृष्टि (Nyāya), माध्यमक (Madhyamaka—Nāgārjuna) और योगाचार (Yogācāra) – इन सबका सघन संवाद परिसर की रोज़मर्रा थी। इस सघन संवाद ने एक ‘मानसिक मांसपेशी’ तैयार की – सवाल करना, प्रमाण मांगना, और अपने निष्कर्ष को सुधारते रहना।
पुनरावर्ती तर्क और बहुविषयक नजर
नालंदा (Nalanda) में पुनरावर्ती/पुनरावर्तन-आधारित तर्क और क्रमवार जांच का खूब उपयोग होता था – आज जिसे आप गणित, तर्कशास्त्र और कंप्यूटर विज्ञान की बुनियादी आदत कहेंगे। सरल भाषा में समझें तो किसी नियम को छोटे-छोटे और दोहराए जा सकने वाले कदमों में परखना – यही रेकर्सन/इटरेशन की आत्मा है। इसी तरह विषयों के बीच पुल बनाना नालंदा की खास पहचान थी। एक आचार्य की प्रतिष्ठा उसकी एक विषय में गहराई के साथ-साथ अनेक विषयों पर पकड़ से भी आंकी जाती।
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ग्रंथालय, अनुवाद और नेटवर्क
नालंदा (Nalanda) की ग्रंथालय-संस्कृति अपने समय में अद्वितीय थी – हजारों पांडुलिपियां, कैटलॉगिंग-परंपरा, और निरंतर नकल/संरक्षण का काम। विदेशी यात्रियों – ह्वेनसांग और यीचिंग ने जिस तरह यहां के अध्ययन-अनुशासन, विषय-विविधता और बहस-संस्कृति का वर्णन किया, उससे पता चलता है कि नालंदा (Nalanda) सिर्फ ज्ञान-संग्रह नहीं, ज्ञान-वितरण भी था। चीन, तिब्बत, दक्षिण-पूर्व एशिया तक अनुवाद-आंदोलन चला, जिससे विचारों का नेटवर्क इफेक्ट बना – गुरु-शिष्य परंपरा और संस्थागत साझेदारी दोनों के स्तर पर।
विज्ञान और गणित में योगदान
- भारतीय गणित परंपरा : जिसे नालंदा (Nalanda) जैसे केंद्रों ने पोषित किया – ने ‘शून्य’ (Zero) और दशमलव स्थान-मान पद्धति (Place Value System) को औपचारिक रूप दिया। आज का बीजगणित (Algebra), कलन (Calculus) और कम्प्यूटिंग (Computing) इसी पर टिके हैं।
- चंद्रमा का प्रकाश : नालंदा-परंपरा के खगोलज्ञान (Astronomy) ने स्पष्ट बताया कि चंद्रमा खुद नहीं चमकता, वह सूर्य का प्रकाश परावर्तित करता है।
- दिन-रात का रहस्य : पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है, इसलिए दिन-रात बनते हैं। आसमान नहीं घूम रहा, हम घूम रहे हैं।
- गणना की विधियां : समतल और गोलाकार ज्यामिति की कई उपयोगी तकनीक विकसित हुईं। यात्रा, नक्शानवीसी और पंचांग-निर्माण में उनकी भूमिका थी।
इन बातों को नालंदा में ‘सिद्धांत + प्रेक्षण’ (Theory + Observation) की संयुक्त दृष्टि से पढ़ाया जाता, यानी किताब और आकाश दोनों साथ-साथ। सरल शब्दों में, ‘देखो, सोचो, जांचो’ – यही वैज्ञानिक नजर थी।
बहस, असहमति पर हिंसा नहीं
पुस्तक Nalanda: How It Changed the World का एक अहम निष्कर्ष यह है कि इतने तीखे वाद-विवाद के बावजूद परिसर में हिंसा का प्रमाण नहीं मिलता। असहमति को विरोधी नहीं, विचार-सहचर की तरह देखा जाता। आज की शीर्ष यूनिवर्सिटीज भी इसी तरह का खुला, सुरक्षित और सभ्य संवाद-परिसर बनाने की आकांक्षा रखती हैं।
संरक्षण, पतन और इतिहास का सबक
समय के साथ-साथ राजकीय संरक्षण कमजसेर हुआ, रीति-रिवाजों का हिस्सा बढ़ा, और तांत्रिक वज्रयान (Vajrayana) का असर बढ़ते हुए ‘खोज की शुरुआती धार’ को ढंकने लगा, यानी संशयात्मक खोज (Critical Inquiry) केंद्र से किनारे जाने लगी।
दूसरी तरफ, आक्रमणकारियों की नजर भी नालंदा (Nalanda) पर थी, क्योंकि यह ज्ञान-केंद्र सत्ता-केंद्र का प्रतीक भी था। अंततः बख्तियार खिलजी (Bakhtiyar Khilji) के आक्रमण ने निर्णायक चोट पहुंचाई। उसके बाद सदियां बीतीं, नालंदा (Nalanda) का नाम और मानो अस्तित्व ऐतिहासिक धुंध में खो गया, जब तक कि उन्नीसवीं सदी में इसकी पुनः खोज न हुई।
यह कहानी हमें दो बड़ी बातें सिखाती है। पहली, किसी भी ज्ञान-केंद्र की जान उसकी खोजी प्रवृत्ति में होती है, जब वह घटती है, संस्थान बाहर से मजबूत दिखते हुए भी अंदर से हल्के हो जाते हैं। दूसरी, पुस्तकालय और पांडुलिपियां (Libraries & Manuscripts) सभ्यता की स्मृति हैं। इनका संरक्षण राष्ट्रीय सुरक्षा जितना ही अहम सांस्कृतिक कार्य है।
वैश्विक छाप और नाम का सफर
आज अमेरिका, फ्रांस, बेल्जियम, ब्राज़ील, सिंगापुर जैसे देशों में कई संस्थानों के नाम में Nalanda मिलता है। यह किसी ब्रांडिंग का खेल नहीं, बल्कि उस वैचारिक प्रेरणा का संकेत है जो नालंदा (Nalanda) ने दी – विविधता, तर्क, खुलापन और ज्ञान का मुक्त प्रवाह।
आज के विश्वविद्यालय नालंदा (Nalanda) से क्या सीखें?
- स्पष्ट उद्देश्य : शोध का ध्येय समाज और मानवता के हित से जुड़ा रहे, सिर्फ औपचारिकता न बचे।
- बहुविषयकता : जटिल समस्याएं एक विषय से नहीं सुलझतीं। डॉक्टर, डेटा-वैज्ञानिक, दार्शनिक और नीति-विशेषज्ञ साथ बैठें।
- वाद-संस्कृति : असहमति को जगह दें, सभ्य और साक्ष्य-आधारित बहस को प्रोत्साहन मिले।
- अनुवाद और पहुंच : ज्ञान का अनुवाद और मुक्त प्रसार ताकि विचार सीमाओं में कैद न हों।
- ग्रंथालय-पहचान : डिजिटल और भौतिक, दोनों तरह के पुस्तकालयों का दीर्घकालिक संरक्षण संस्थान की पहली जिम्मेदारी हो।
नालंदा (Nalanda) एक विचार है
नालंदा सिर्फ इमारत या इतिहास का अध्याय नहीं, एक विचार है – मानवीय मेधा, Critical Inquiry, और शास्त्रार्थ का विचार। इसका उत्कर्ष और पतन हमें याद दिलाता है कि विश्वविद्यालय तभी जीवित रहते हैं जब प्रश्न पूछने की आग बुझने न दी जाए, जब विविध मतों को सुनना कमजोरी नहीं, ताकत माना जाए, और जब पुस्तकालय, शोध और अनुवाद को खर्च नहीं, निवेश समझा जाए।
Nalanda: How It Changed the World इसी स्मृति को जगाती है और बताती है कि प्राचीन भारत की तर्क-संस्कृति आज भी हमारी आधुनिकता को अर्थ और दिशा देती है।
(लेखक परिचय : डॉ. सौरभ मिश्र मनोहर पर्रिकर रक्षा अध्ययन एवं विश्लेषण संस्थान, नई दिल्ली में Research Fellow के रूप में कार्यरत हैं)



