
डॉ. बृजेश सती
Shankaracharya candidates in Bihar elections : भारतीय राजनीति हमेशा से अप्रत्याशित घटनाओं और अनोखे प्रयोगों से भरी रही है। कभी सामाजिक आंदोलन राजनीतिक दल बने तो कभी धार्मिक-सांस्कृतिक अभियानों ने सियासत की दिशा मोड़ दी। अब बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में एक नया प्रयोग देखने को मिल रहा है।
ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने घोषणा की है कि वे बिहार की सभी 243 विधानसभा सीटों पर प्रत्याशी उतारेंगे (Shankaracharya candidates in Bihar elections)। इन उम्मीदवारों का मुख्य एजेंडा है गौ माता को राष्ट्रमाता का दर्जा दिलाना। यह सवाल अब चर्चा का विषय है कि क्या यह आंदोलन सिर्फ चुनावी शोर बनकर रह जाएगा या वाकई भारतीय राजनीति में कोई नया मोड़ लाएगा।
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गौ मतदाता संकल्प बिहार यात्रा
अपनी मुहिम को जनता तक पहुंचाने के लिए शंकराचार्य ने 12 सितंबर से ‘गौ मतदाता संकल्प बिहार यात्रा’ शुरू की है। यह यात्रा चालीस दिनों तक चलेगी और राज्य के विभिन्न जिलों में जाएगी। अब तक सीतामढ़ी, मधुबनी, सुपौल और अहरिया जिलों में सभाएँ हो चुकी हैं।
इस दौरान मतदाताओं से अपील की जा रही है कि वे केवल गौ रक्षा समर्थक उम्मीदवारों (Shankaracharya candidates in Bihar elections) को ही वोट दें। यह कोशिश है समाज में एक नए धार्मिक-सांस्कृतिक वोट बैंक को तैयार करने की।
बदलते चुनावी समीकरण
बिहार चुनाव की तस्वीर अब तक साफ थी – एक ओर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA), दूसरी ओर इंडिया एलायंस, और तीसरे विकल्प के रूप में प्रशांत किशोर की स्वराज पार्टी। लेकिन शंकराचार्य के प्रत्याशियों के मैदान में उतरने से समीकरण जटिल हो सकते हैं (Shankaracharya candidates in Bihar elections)।
विश्लेषकों का मानना है कि गौ माता समर्थक उम्मीदवार भले ही बड़े स्तर पर जीत न पाएं, लेकिन वे वोट बैंक में सेंध लगा सकते हैं (Shankaracharya candidates in Bihar elections)। धार्मिक मुद्दों पर वोटों का ध्रुवीकरण होगा तो बड़े दलों को नुकसान झेलना पड़ सकता है।
ग्रामीण और पारंपरिक वोटरों पर असर पड़ने से छोटे दलों की संभावनाएं भी घट सकती हैं।
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राजनीति में धर्म का पुराना प्रयोग
धार्मिक नेतृत्व का सीधा हस्तक्षेप राजनीति में नया नहीं है। स्वतंत्रता के बाद करपात्री जी महाराज ने राम राज्य परिषद बनाई थी। हाल के वर्षों में भी लोकसभा चुनावों में गौ माता को राष्ट्रमाता घोषित कराने की मांग पर प्रत्याशी उतारे गए थे। अब शंकराचार्य का यह कदम (Shankaracharya candidates in Bihar elections) उसी परंपरा को आगे बढ़ाता दिख रहा है।
जातीय समीकरण बनाम धार्मिक एजेंडा
बिहार की राजनीति में हमेशा से जातीय समीकरण हावी रहे हैं। ऐसे में धार्मिक आधार पर राजनीति कितनी सफल होगी, यह कहना जल्दबाजी होगी।
अगर शंकराचार्य समर्थक (Shankaracharya candidates in Bihar elections) प्रभावी वोट प्रतिशत ले आते हैं तो सत्ता का गणित बदल सकता है। लेकिन अगर यह केवल प्रतीकात्मक उपस्थिति रही, तो असर सिर्फ चुनावी विमर्श और जनचर्चा तक सीमित रह जाएगा।
महाराष्ट्र और राष्ट्रमाता का दर्जा
महाराष्ट्र देश का पहला राज्य है जिसने देसी गाय को राज्य माता घोषित किया। एकनाथ शिंदे सरकार ने यह फैसला सितंबर 2023 में लिया। नोटिफिकेशन में कहा गया कि वैदिक काल से ही देसी गाय भारतीय संस्कृति में महत्वपूर्ण रही है – चाहे वह आयुर्वेद चिकित्सा हो, पंचगव्य उपचार या जैविक खेती।
इसके पहले उत्तराखंड विधानसभा ने 2018 में गाय को राष्ट्रमाता घोषित करने का प्रस्ताव पास कर केंद्र को भेजा था।
शंकराचार्य क्यों उतार रहे उम्मीदवार? (Shankaracharya candidates in Bihar elections)
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का कहना है कि उन्होंने सभी प्रमुख राजनीतिक दलों से अपील की थी कि गौ माता को राष्ट्रमाता घोषित करने की दिशा में कदम उठाएं। लेकिन किसी भी दल ने सकारात्मक जवाब नहीं दिया। इसी वजह से उन्होंने जनता की अदालत में जाने का फैसला किया और सभी 243 सीटों पर उम्मीदवार उतारने की घोषणा की।
आजादी के बाद से उठती रही मांग
गाय को राष्ट्रीय दर्जा देने की मांग नई नहीं है। आजादी के बाद से अलग-अलग दलों के सांसदों ने बार-बार यह मुद्दा संसद में उठाया।
1990 के दशक में गौ हत्या रोकने और गाय को राष्ट्रीय पशु बनाने की मांग तेज हुई। 17वीं लोकसभा में भी इस पर सवाल उठाए गए।
हालांकि सरकार का आधिकारिक जवाब हमेशा यही रहा कि संविधान में या कानूनन गौ माता को राष्ट्रमाता घोषित करने का कोई प्रावधान नहीं है और वर्तमान में यह प्रस्ताव विचाराधीन भी नहीं है।
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