

Javed Akhtar : कोलकाता में आयोजित होने वाला उर्दू अकादमी फेस्टिवल (Urdu Academy Festival Kolkata) शुरुआत के कुछ घंटों पहले ही अचानक स्थगित कर दिया गया। यह महोत्सव चार दिनों तक चलना था। इसमें उर्दू संस्कृति और हिंदी सिनेमा में उर्दू के योगदान (Urdu in Hindi Cinema) पर चर्चा होनी थी।
महोत्सव स्थगित होने का कारण था दो इस्लामी संगठनों की आपत्ति, जिन्होंने कवि-गीतकार जावेद अख्तर (Javed Akhtar) की उपस्थिति पर सवाल उठाए।
आयोजकों का बयान
West Bengal Urdu Academy ने अपनी आधिकारिक घोषणा में इसे अनिवार्य परिस्थितियों के कारण स्थगित बताया। अकादमी की सचिव नुजहत जैनब ने कहा कि चार दिवसीय कार्यक्रम, ‘Urdu in Hindi Cinema’, जो 31 अगस्त से 3 सितंबर तक चलने वाला था, अब स्थगित कर दिया गया है। कारण अनिवार्य परिस्थितियां हैं।
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हालांकि एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, राज्य सरकार ने चुनावों से पहले किसी भी तरह के विवाद या अशांति से बचने के लिए हस्तक्षेप किया। अधिकारियों को डर था कि जावेद अख्तर (Javed Akhtar) के विरोध में प्रदर्शन या उनके ऊपर स्याही फेंकने जैसी घटनाएं हो सकती हैं।
जावेद अख्तर (Javed Akhtar) की उपस्थिति का विरोध मुख्य रूप से दो इस्लामी समूहों ने किया- जमायत उलेमा-ए-हिंद (Jamiat Ulema-e-Hind) और Wahyahin Foundation। इन समूहों ने अकादमी को पत्र लिखकर जावेद अख्तर (Javed Akhtar) का निमंत्रण वापस लेने की मांग की।
जमायत ने अपने पत्र में चेतावनी दी कि अगर उनकी मांग नहीं मानी गई, तो वे लोकतांत्रिक तरीकों से कार्रवाई करेंगे। उन्होंने 2007 के उस विवाद का उदाहरण भी दिया, जब बांग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन को कट्टरपंथी समूहों के विरोध के कारण बंगाल छोड़ना पड़ा था।
वहीं Wahyahin Foundation ने कहा कि जावेद अख्तर को मुख्य अतिथि बनाना समारोह की भावना के खिलाफ है और उनकी उपस्थिति युवाओं पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकती है।
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Javed Akhtar की atheist पहचान
जावेद अख्तर (Javed Akhtar) ने हमेशा खुद को तर्कवादी और नास्तिक (Rationalist & Atheist) बताया है। 2019 में उन्होंने ट्वीट किया था कि वह सार्वजनिक रूप से atheist हैं और चाहते हैं कि लोग तर्कसंगत बनें।
उन्होंने धर्म की तुलना शराब से की है, कहा कि धार्मिक कट्टरता अक्सर लोगों में असहिष्णुता और संघर्ष पैदा करती है। हालांकि वह अपने सांस्कृतिक मुस्लिम (Cultural Muslim) पहचान को मानते हैं, लेकिन धार्मिक कट्टरता को स्वीकार नहीं करते।
इस घटना ने बंगाल में सांस्कृतिक स्वतंत्रता और रैशनलिस्ट आवाजों को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं। मानवाधिकार कार्यकर्ता शबनम हाशमी ने याद दिलाया कि भारत न तो हिंदू राष्ट्र है और न ही इस्लामिक देश; atheists को भी जीने और बोलने का अधिकार है।
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