
Ali Larijani : अमेरिका और इजरायल ने जब से ईरान (US Israel Iran war) पर हमला शुरू किया है, तब से सबसे बड़ी खबरी थी सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत। हालांकि तब ईरान ने इसे स्वीकार करने में बिल्कुल भी देर नहीं लगाई। तुरंत ही बता दिया गया कि खामेनेई अब नहीं हैं।
लेकिन जब ईरान को अली लारिजानी (Ali Larijani) के रूप में दूसरा बड़ा झटका लगा है, तो उसने इस खबर को छिपाने की भरपूर कोशिश की। जब ईरान पहले से ही अंदरूनी और बाहरी दबावों से जूझ रहा है, लारिजानी का जाना सिर्फ एक राजनीतिक नुकसान नहीं, बल्कि रणनीतिक खालीपन भी पैदा करता है।
लारिजानी (Ali Larijani) की मौत की खबर जैसे ही बाहर आई, तेहरान की ओर से इसे गलत और भ्रामक बताया गया। सरकारी सूत्रों ने कहा कि वह पूरी तरह सुरक्षित हैं। लेकिन कुछ ही समय बाद अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स और खुफिया सूचनाओं ने तस्वीर बदलनी शुरू कर दी।
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धीरे-धीरे यह साफ होता गया कि मामला उतना सीधा नहीं है जितना शुरुआत में बताया गया था। यही वजह है कि ईरान के शुरुआती इनकार को अब एक रणनीतिक प्रतिक्रिया के तौर पर देखा जा रहा है। शायद वह अमेरिका-इजरायल को उलझा कर रखना चाहता था।
अली लारिजानी (Ali Larijani) की मौत को छिपाने की वजह यह भी थी कि खामेनेई के बाद सत्ता को संभालने के लिए कई काबिल लोग मौजूद थे। उनमें एक नाम खुद लारिजानी का था। लेकिन अभी सुप्रीम लीडरशिप नई है और युद्ध बहुत कठिन मोड़ पर है। ऐसे में लारिजानी की मौत से सेना के मनोबल पर असर पड़ सकता था।
ईरान ने लारिजानी (Ali Larijani) की मौत की खबर को तब तक छुपाए रखा, जब तक संभव था। चूंकि कयासबाजी तेज हो गई थी, इसलिए आखिरकार ईरान को चुप्पी तोड़नी पड़ी।
कौन थे अली लारिजानी (Ali Larijani)?
अली लारिजानी उन नेताओं में थे जो सुर्खियों से दूर रहकर भी सत्ता के केंद्र में मजबूत पकड़ रखते थे। इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स से अपने करियर की शुरुआत करने वाले लारिजानी (Ali Larijani) बाद में ईरान की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के प्रमुख बने और परमाणु वार्ताओं में अहम भूमिका निभाई।
उनकी छवि एक ऐसे नेता की थी जो टकराव के बजाय बातचीत में विश्वास रखते थे। यही वजह थी कि वह कई बार महमूद अहमदीनेजाद की आक्रामक नीतियों से असहज भी दिखे।
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पहले ही दी थी चेतावनी
करीब 20 साल पहले, जब ईरान का परमाणु विवाद अपने चरम पर था, लारिजानी (Ali Larijani) ने एक इंटरव्यू में कहा था कि पश्चिमी देशों का असली मकसद सिर्फ परमाणु कार्यक्रम नहीं, बल्कि ईरान की व्यवस्था पर दबाव बनाना है।
आज जब उनकी मौत को उसी टकराव की कड़ी के रूप में देखा जा रहा है, तो उनकी यह सोच और भी प्रासंगिक लगती है।
ईरान के लिए क्यों बड़ा नुकसान?
लारिजानी (Ali Larijani) सिर्फ एक नेता नहीं थे, बल्कि वह सत्ता के भीतर संतुलन बनाने वाले चेहरे थे। अयातुल्लाह अली खामेनेई के करीबी होने के बावजूद, वह कई मुद्दों पर अलग राय रखते थे। चाहे वह सीरिया में बशर अल-असद को समर्थन देने की नीति हो या पश्चिम के साथ बातचीत का तरीका।
उनकी मौजूदगी एक तरह से सिस्टम के भीतर मध्यमार्ग की जगह बनाए रखती थी। अब उनके जाने के बाद यह संतुलन कमजोर पड़ सकता है।
आगे क्या?
अली लारिजानी (Ali Larijani) की मौत ऐसे वक्त हुई है जब मध्य पूर्व पहले ही तनाव के दौर से गुजर रहा है। ऐसे में यह घटना आने वाले दिनों में क्षेत्रीय राजनीति और ईरान-पश्चिम संबंधों को और जटिल बना सकती है।
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