
Humans alien theory : तारों से भरा आसमान इंसानों को पसंद आता है, वह सुदूर अंतरिक्ष में उड़ना चाहता है, उसमें जानने की ललक है कि उसके यूनिवर्स के पार क्या है… और तो और उसने सहज ही यह विश्वास पैदा कर लिया है कि उसे बनाने वाला ईश्वर ऊपर कहीं रहता है।
जब कोई मरता है, तो बच्चों को बहलाने के लिए कहा जाता है कि वह तारा बन गया। लेकिन तारा ही क्यों, पेड़ क्यों नहीं? क्यों स्वर्ग और नर्क आसमान में हैं? क्यों फरिश्ते ऊपर से नीचे आते हैं और मौत के बाद आत्मा ऊपर?
ये सवाल ऐसे ही नहीं आए। रात के सन्नाटे में, जब आसमान दूधिया धुंध की तरह चमकता है, कभी-कभी दिल पूछता है, क्या हम सचमुच इसी मिट्टी के बने हैं? या हम किसी दूर के, ठंडे-नीले ग्रह की याद लिए हुए यहां आकर बस गए हैं? (Humans alien theory)
यही बेचैन सवाल अमेरिकी पर्यावरण वैज्ञानिक डॉ. एलिस सिल्वर अपनी किताब ‘Humans Are Not From Earth’ में उठाते हैं। यह ऐसी किताब है, जो विज्ञान और कल्पना की महीन हद पर चलती है और फिर भी पाठक को चकित कर देती है।
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धूप से परेशान, गुरुत्वाकर्षण से बंधे हुए
डॉ. सिल्वर का तर्क है कि इंसान का शरीर धरती से कभी मेल नहीं खाता। सोचिए – हमें धूप सहन नहीं होती, थोड़ी देर में ही जलन या स्किन प्रॉब्लम हो जाती है। हमारी रीढ़ की हड्डी लगातार गुरुत्वाकर्षण से जूझती है, इसलिए ज्यादातर लोग उम्र बढ़ने के साथ पीठ दर्द का शिकार हो जाते हैं। छोटे-छोटे बच्चों को देखें – जानवर पैदा होते ही चलने-फिरने लग जाते हैं, लेकिन इंसानी बच्चे बरसों तक मां-बाप पर निर्भर रहते हैं।
हमें लगातार पानी पीना पड़ता है, जबकि धरती के दूसरे जीवों को पानी की इतनी जरूरत नहीं पड़ती। इंसानों की बुद्धि बाकी प्राणियों से इतनी आगे क्यों है? अगर सब एक ही माहौल में विकसित हुए, तो समानता होनी चाहिए थी।
यही नहीं, इंसान हर छोटे मौसम बदलाव से परेशान हो जाता है। सर्दी-गर्मी, धूल-मिट्टी, मच्छर या एलर्जी – मानो धरती हमें लगातार अस्वीकार कर रही हो। डॉ. सिल्वर कहते हैं कि अगर हम सचमुच इसी ग्रह के थे, तो हमारा शरीर यहां की परिस्थितियों से पूरी तरह सामंजस्य बैठा चुका होता।
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डॉ. सिल्वर के मुताबिक, यह सब इस ओर इशारा करता है कि हमारा जैविक डिजाइन धरती के लिए नहीं बना (Humans alien theory)। इन चीजों को देखकर लगता है कि मानो हम किसी और दुनिया के अनुरूप ढले हुए प्राणी हों, जो यहां आकर धीरे-धीरे समझौता कर रहे हों।
अपनी किताब में डॉ. सिल्वर कहते हैं कि इंसानों को धरती से बाहर का प्राणी बताने वाले कुल 53 संकेत हैं। ये छोटे-छोटे सुराग मिलकर एक बड़ी कहानी बुनते हैं।
यहां से दिलचस्प बनती है कहानी…
डॉ. सिल्वर एक साहसी परिकल्पना रखते हैं – कहीं ऐसा तो नहीं कि बहुत पहले किसी उन्नत सभ्यता ने हमें यहां उतारा यानी प्लांट किया हो – किसी बीज की तरह? हो सकता है कि इंसान किसी प्रयोग का हिस्सा हों या यह भी संभव है कि किसी सजा के तहत हमें धरती पर भेजा गया! (Humans alien theory)
इस बेहिसाब असहजता की दलीलों में डॉ. सिल्वर हमारी जैविक घड़ी का जिक्र भी करते हैं – वह लय जो नींद, भूख, तापमान, मूड सब संभालती है। एक समय पर अनुसंधानों में यह धारणा चलती रही कि मनुष्य की आंतरिक घड़ी लगभग 25 घंटे की तरफ भटकती है यानी हर सुबह हमें रोशनी से उसे एक घंटा पीछे खींचना पड़ता है। अगर यह सच है, सिल्वर पूछते हैं, तो हमारी घड़ी पृथ्वी के 24 घंटे से इतनी असंगत क्यों? (Humans alien theory)
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लेकिन यहीं मुख्यधारा का विज्ञान अपनी बात रखता है। नई स्टडी में पाया गया है कि हमारी आंतरिक सर्केडियन अवधि 24 घंटे के ही बहुत करीब है, 25 नहीं। मतलब जैविक घड़ी उतनी भी अजीब नहीं है, जितना डॉ. सिल्वर ने बताया है।
विज्ञान यह भी समझाता है कि धूप के प्रति संवेदनशीलता, प्रसव की कठिनाई, पीठ-दर्द – ये सब हमारे सीधे खड़े होकर चलने, बड़े दिमाग और आधुनिक जीवनशैली की कीमत है। इंसान का विकास क्रम (Evolution) धीरे-धीरे हुआ है, और हमारे शरीर की कमियां भी इसी प्रक्रिया का हिस्सा हैं।



