
Jimutavahana Jitiya Vrat Katha : बहुत समय पहले की बात है। स्वर्गलोक के गंधर्वराज के आंगन में एक पुत्र का जन्म हुआ – जीमूतवाहन (Jimutavahana)। वह बचपन से ही करुणा और दया से भरा हुआ था। जैसे-जैसे वह बड़ा हुआ, उसकी छवि एक अद्भुत राजकुमार के रूप में फैल गई। परंतु वैभव और सत्ता से उसे कभी मोह नहीं हुआ।
जब उसके पिता ने राजपाट त्यागकर वनवास का जीवन चुना, तो जीमूतवाहन ने भी राजसिंहासन को पीछे छोड़ दिया और अपने पिता संग वन में जा बसा। वहां उसने मलयवती नामक कन्या से विवाह किया और साधारण किन्तु संतोषपूर्ण जीवन बिताने लगा।
एक दिन वन में विचरण करते हुए जीमूतवाहन (Jimutavahana Jitiya Vrat Katha) ने देखा कि एक वृद्धा वृक्ष के नीचे सिर पकड़कर रो रही है। उसका विलाप सुनकर वे पास पहुंचे और पूछने लगे, ‘माता, तुम्हारे दुख का कारण क्या है?’
वृद्धा ने सिर उठाया, आंखों से आंसू पोंछे और बोली, ‘मैं नागवंश की माता हूं। गरुड़ प्रतिदिन हम नागों में से एक को आहार बनाता है। आज मेरे इकलौते पुत्र शंखचूड़ की बारी है। कल सुबह होते ही उसे गरुड़ के पंजों में जाना होगा। पुत्र-वियोग का यह क्षण मुझे असहनीय है।’
उस मां का दुख सुनते ही जीमूतवाहन का हृदय पिघल गया। वह कुछ देर मौन खड़े रहे और फिर बोले, ‘माता, तुम चिंता मत करो। तुम्हारा पुत्र जीवित रहेगा। उसके स्थान पर मैं स्वयं गरुड़ का भोजन बनूंगा।’ (Jimutavahana Jitiya Vrat Katha)
वृद्धा ने विस्मित होकर उन्हें देखा, ‘पुत्र, यह कैसी बात करते हो? तुम गंधर्वकुल के राजकुमार हो, तुम्हारा जीवन कितना मूल्यवान है!’ लेकिन जीमूतवाहन ने शांत स्वर में उत्तर दिया, ‘एक पुत्र की रक्षा करना ही मेरा धर्म है। किसी मां की गोद सूनी हो, यह मैं सहन नहीं कर सकता।’
अगली सुबह जीमूतवाहन लाल वस्त्र धारण कर उस स्थान पर लेट गए, जहां बलि के लिए नागपुत्र को रखा जाना था। थोड़ी देर में आकाश गूंज उठा, गरुड़ अपने विशाल पंख फैलाए उतर रहे थे। उन्होंने बिना कुछ देखे, जीमूतवाहन को अपने पंजों में दबाया और आकाश की ओर उड़ चले। जीमूतवाहन शांत और स्थिर बने रहे।
कुछ दूरी उड़ने के बाद गरुड़ ने देखा कि उनका शिकार रो नहीं रहा, छटपटा नहीं रहा। आश्चर्यचकित होकर उन्होंने पूछा, ‘हे नागपुत्र! मृत्यु सामने है, फिर भी तुम इतने निडर कैसे हो?’ तब जीमूतवाहन ने अपना परिचय दिया और पूरी घटना कह सुनाई – कैसे उन्होंने एक मां के दुख को अपना मानकर उसके पुत्र के स्थान पर बलि स्वीकार की। (Jimutavahana Jitiya Vrat Katha)
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यह सुनकर गरुड़ स्तब्ध रह गए। उनके हृदय में एक अद्भुत भाव जगा – त्याग और परोपकार के लिए इतनी बड़ी बलि! उन्होंने तुरंत जीमूतवाहन को मुक्त किया और बोले, ‘हे महान आत्मा! तुम्हारा यह त्याग असाधारण है। मैं तुम पर प्रसन्न हूं। आज से मैं प्रतिज्ञा करता हूं कि किसी नाग को कभी अपना भोजन नहीं बनाऊंगा।’ इतना कहकर उन्होंने जीमूतवाहन को जीवनदान दिया और नागवंश को सदा-सर्वदा के लिए सुरक्षित कर दिया।
यही वह क्षण था जिसने इतिहास रच दिया। एक राजकुमार के त्याग ने न केवल एक पुत्र की जान बचाई, बल्कि पूरे नागवंश की संतानों को मृत्यु से मुक्त कर दिया। और इसी घटना की स्मृति में आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को माताएँ अपने बच्चों की दीर्घायु और सुरक्षा की कामना से जीवित्पुत्रिका व्रत (Jivitputrika Vrat) करती हैं। वे जीमूतवाहन की पूजा कर उनसे आशीर्वाद मांगती हैं, क्योंकि वे ही संतानों की रक्षा के प्रतीक बन गए।
जीमूतवाहन की यह कथा (Jimutavahana Jitiya Vrat Katha) सिर्फ धर्मकथा नहीं है, बल्कि एक संदेश भी है – कि करुणा और परोपकार का मूल्य राजपाट और वैभव से कहीं अधिक है। एक मां की आंखों के आंसू पोंछने के लिए जिसने अपना जीवन दांव पर लगा दिया, वही आज भी मातृत्व और संतान की रक्षा के इस पावन व्रत का आधार है।
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