
कल्पना कीजिए, एक ऐसा देश जहां हर महीने की आखिरी शनिवार को पूरी दुनिया थम सी जाती है। बच्चे, बूढ़े, युवा – सब हाथों में झाड़ू, फावड़ा या कुदाल थामे निकल पड़ते हैं। कोई बहाना नहीं, कोई छुट्टी नहीं। यह कोई मजाक नहीं, बल्कि बुरुंडी का ‘उमुगांडा’ है, एक ऐसी सामुदायिक गतिविधि (Burundi Umuganda) जो न सिर्फ सड़कों को चमकाती है, बल्कि लोगों के दिलों को भी जोड़ती है। आइए जानते हैं कि यह बुरुंडी आखिर है कौन-सा जादुई कोना, जहां हर तरफ हरी-भरी पहाड़ियां हैं, लेकिन जिंदगी की जंग भी कड़ी।
बुरुंडी, पूर्वी अफ्रीका का एक लैंडलॉक्ड यानी चारों तरफ से जमीन से घिरा देश है। यह रवांडा, तंजानिया और कांगो के बीच सैंडविच की तरह फंसा हुआ है। क्षेत्रफल 27,000 वर्ग किलोमीटर से कम और आबादी करीब 1.3 करोड़। दुनिया के सबसे घनी आबादी वाले देशों में शुमार, जहां प्रति वर्ग किलोमीटर 500 से ज्यादा लोग ठूंस-ठूंस कर रहते हैं।
राजधानी ब्यूजुंबुरा झील तांगानिका के किनारे बसी है, जो अफ्रीका की दूसरी सबसे बड़ी मीठे पानी की झील है। लेकिन इस खूबसूरती के पीछे छिपी है एक कठिन जिंदगी की कहानी। (Burundi Umuganda)
बुरुंडी 1962 में बेल्जियम की कॉलोनी ‘रुआंडा-उरुंडी’ से आजाद हुआ। यहां हुटू (85%), टुटसी (14%) और त्वा (1%) जैसे समुदाय रहते हैं, जिनकी सदियों पुरानी जड़ें ग्रेट लेक्स रीजन में हैं। इतिहास में खून-खराबे की कहानियां हैं – 1993 का नरसंहार, जहां 3 लाख से ज्यादा लोग मारे गए, जब टुटसी सैनिकों ने हुटू राष्ट्रपति को मार डाला। फिर 2015 का संकट, जब तीसरी बार राष्ट्रपति चुने जाने पर विद्रोह भड़का। राष्ट्रपति एवरिस्टे नदिशिमीये 2020 से सत्ता में हैं और सुधार ला रहे हैं, लेकिन अतीत की छाया अब भी लंबी है।
कॉफी की खुशबू में छिपी कड़वाहट
अब बात पैसे की। बुरुंडी की अर्थव्यवस्था एक छोटे से किसान के खेत जैसी है – 85% आबादी खेती पर निर्भर, लेकिन सब्सिस्टेंस फार्मिंग यानी खुद के लिए उगाओ, बेचो मत। जीडीपी का 40% कृषि से आता है, जहां कॉफी और चाय मुख्य निर्यात हैं। ये विदेशी मुद्रा का आधा से ज्यादा हिस्सा देते हैं। (Burundi Umuganda)
2023 में जीडीपी ग्रोथ 2.8% रही, लेकिन प्रति व्यक्ति आय महज 200-300 डॉलर सालाना – दुनिया के सबसे गरीब देशों में नंबर वन! औद्योगिक हिस्सा सिर्फ 18%, सर्विसेज 42%। सरकार का विजन 2040 तक ‘उभरता देश’ बनना है। विदेशी निवेश जीडीपी का केवल 0.7% है। आईएमएफ और अफ्रीकी डेवलपमेंट बैंक मदद कर रहे हैं।
बुरुंडी की चुनौतियां ऐसी हैं कि लगता है जिंदगी एक लगातार संघर्ष है। यहां की 62% आबादी एक्सट्रीम पॉवर्टी लाइन से नीचे है। 2023 में महंगाई दर 27% तक पहुंच गई। विदेशी मुद्रा की भारी कमी है। बिजली सिर्फ 10% लोगों को मिलती है और इंटरनेट कनेक्टिविटी कमजोर है।
अब मिलिए बुरुंडी के हीरो से (Burundi Umuganda)
लेकिन इन परेशानियों के बीच भी बुरुंडी खड़ा होने की कोशिश कर रहा है। इस देश का समाज खुद आगे आया है देश को संभालने के लिए और यहीं से उमुगांडा (Burundi Umuganda) की कहानी शुरू होती है।
उमुगांडा (Umuganda) शब्द मूल रूप से पड़ोसी देश रवांडा (Rwanda) से आया है। रवांडा में 1994 के भयानक नरसंहार के बाद जब देश ने खुद को फिर से खड़ा करने का संकल्प लिया, तो सरकार ने लोगों में साझा श्रम और साझा जिम्मेदारी की भावना जगाने के लिए उमुगांडा डे की शुरुआत की।
हर महीने के आखिरी शनिवार को रवांडा में सभी नागरिक – सरकारी अधिकारी से लेकर आम किसान तक सुबह कुछ घंटों के लिए सफाई, पेड़ लगाना, सड़क मरम्मत या सार्वजनिक भवनों के रखरखाव में हिस्सा लेते हैं। यह कानून का हिस्सा बन चुका है और अब इसे रवांडा की साइलेंट रिवॉल्यूशन कहा जाता है।
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बुरुंडी ने इसी विचार से प्रेरणा लेकर धीरे-धीरे उमुगांडा मॉडल को अपनाना शुरू किया। 2010 के दशक में कुछ स्थानीय समुदायों ने रवांडा के अनुभवों को देखकर अपने गांवों में छोटे स्तर पर सामुदायिक कार्य आरंभ किए। पहले यह सिर्फ सफाई या कचरा हटाने तक सीमित था, लेकिन जल्द ही लोग स्कूलों की दीवारें पुतने, टूटी सड़कों को भरने और सार्वजनिक स्थानों की मरम्मत में जुटने लगे। कुछ जगहों पर तो किसानों ने मिलकर छोटे सिंचाई प्रोजेक्ट भी बनाए, जिससे उनकी फसलें बेहतर हुईं। (Burundi Umuganda)
उमुगांडा असल में किरुंडी भाषा का शब्द है। इसका मतलब है ‘सामूहिक फसल कटाई’ या ‘सहयोगी कार्य’। बुरुंडी में यह हर महीने की आखिरी शनिवार को होने वाला अनिवार्य सामुदायिक सेवा है, जो सुबह 8 से दोपहर 11 बजे तक चलता है।
बदलने लगा बुरुंडी
इस पहल से बुरुंडी में एक सामाजिक बदलाव आने लगा। पहले जहां गांवों में सरकारी सहयोग की कमी को लेकर नाराजगी रहती थी, वहीं अब लोगों में खुद कुछ करने की भावना बढ़ने लगी। इससे दो बातें हुईं – एक तो स्थानीय स्तर पर समस्याओं का हल तेजी से होने लगा और दूसरा, लोगों में एक-दूसरे के प्रति भरोसा बढ़ा। कई इलाकों में उमुगांडा ने जातीय विभाजन को भी कम किया, क्योंकि इसमें सब एक साथ काम करते हैं। (Burundi Umuganda)
हालांकि यह सफर आसान नहीं था। गरीबी, बेरोजगारी और राजनीतिक अस्थिरता जैसे मुद्दे आज भी बुरुंडी को पीछे खींचते हैं। लेकिन उमुगांडा जैसी गतिविधियों ने यह दिखाया है कि जब जनता में एकता और उद्देश्य होता है, तो सीमित संसाधनों में भी बड़ा बदलाव लाया जा सकता है।
आज बुरुंडी सरकार इस पहल को औपचारिक रूप देने पर विचार कर रही है, ताकि इसे राष्ट्रीय स्तर पर फैलाया जा सके। अगर ऐसा हुआ, तो यह न केवल सामाजिक एकता का प्रतीक बनेगा, बल्कि बुरुंडी के आर्थिक पुनर्निर्माण में भी मील का पत्थर साबित हो सकता है। (Burundi Umuganda)
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