
Palestinian Christians
यरूशलम (Jerusalem) की घड़ी जब ईस्टर (Easter) की सुबह का एलान करती है, तो आसमान में चर्च की घंटियों की आवाज फैल जाती है। इस आवाज में सिर्फ़ एक धर्म का भाव नहीं होता, बल्कि पूरी मानवता की गूंज होती है। यह वही शहर है जहां यीशु (Jesus) ने जन्म नहीं लिया, लेकिन अपना जीवन बलिदान कर दिया, और यहीं से उनके संदेश ने पूरी दुनिया को रोशन किया।
लेकिन आज, इसी रोशनी की जमीन पर एक अंधेरा उतर आया है – और वह अंधेरा है फिलिस्तीनी ईसाइयों (Palestinian Christians) के लिए।
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जहां से ईसाई धर्म ने सांस ली
बहुत लोग यह नहीं जानते कि दुनिया के सबसे पहले ईसाई, यरूशलम और उसके आस-पास के लोग ही थे – वही जो आज ‘फिलिस्तीनी ईसाई’ (Palestinian Christians) कहलाते हैं।
ये वे लोग थे, जिन्होंने पहली बार यीशु को अपने बीच देखा, उनके चमत्कारों के साक्षी बने, और उनके बलिदान के बाद उनकी शिक्षाओं को सहेजा और फैलाया। वे लोग, जिनके पुरखे पहले ईसाई थे – वे लोग जिन्होंने यीशु को चलते-फिरते देखा, उनकी बातें सुनीं और फिर पूरी दुनिया में उनकी सीख को फैलाया।
यीशु मसीह का जन्म (Jesus Christ Birth Place) बेथलेहम में हुआ। यह आज के वेस्ट बैंक में है।
उन्होंने यरूशलम, गलील और नासरत की गलियों में लोगों को माफी, प्रेम और करुणा का रास्ता दिखाया। उनके शिष्य, उनके अनुयायी – आज जिनका जिक्र हम बाइबल में पढ़ते हैं – यहीं के थे।
यह वो भूमि है जहां यीशु (Jesus Christ) ने प्रेम, करुणा और क्षमा का पाठ पढ़ाया। यह वो धरती है जहां से बाइबिल (Bible) की कहानी शुरू होती है, और आज भी उसकी आत्मा यहीं बसती है।
फिर सोचिए, जब इसी धरती के सबसे पुराने अनुयायी यानी Palestinian Christians, जो 2000 सालों से यहां टिके हुए हैं, अब वहां प्रार्थना करने को तरस रहे हों, तो क्या वह केवल धार्मिक उत्पीड़न है? या कुछ और गहराई है उसमें?
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1948 में जब इजराइल एक राष्ट्र के रूप में उभरा, तो लाखों फिलिस्तीनियों को उनके घरों से निकाला गया। इसे ‘नकबा’ कहा जाता है।
उस दौरान न केवल मुसलमान, बल्कि हजारों ईसाई परिवार भी विस्थापित हुए। उन्होंने अपनी जमीनें गंवाईं, अपने चर्च छोड़े और कई देशों में शरण लेनी पड़ी।
आज की तारीख में वेस्ट बैंक और गाजा (West Bank and Gaza) में मुश्किल से 50,000 फिलिस्तीनी ईसाई बचे हैं।
वे इस युद्ध में न तो कोई पक्ष हैं, न ही हथियार उठाते हैं – फिर भी वे हर उस दीवार के नीचे दबाए जा रहे हैं, जो धर्म, राजनीति और भूखंड के नाम पर खड़ी की गई है।
ईस्टर (Easter) की बुनियाद हिलती जा रही है
ईस्टर के मौके पर जब दुनिया भर से ईसाई श्रद्धालु यरूशलम (Jerusalem) आते हैं, तो उन्हें उस चर्च की दहलीज़ पर कदम रखने की छूट मिलती है, जिसे होली सेपल्कर (Church of the Holy Sepulchre) कहा जाता है। वही जगह, जहां माना जाता है कि यीशु को क्रूस पर चढ़ाया गया, दफनाया गया और फिर वहीं से वे पुनर्जीवित हुए।
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लेकिन फिलिस्तीनी ईसाइयों (Palestinian Christians) के लिए, जो इस धरती के बेटे-बेटियां हैं, यरूशलम (Jerusalem) पहुंचना अब एक पहाड़ चढ़ने जैसा है।
इजराइली सेना की अनुमति के बिना वे यरूशलम में दाखिल नहीं हो सकते। परमिट मिलना मुश्किल होता जा रहा है। और जो परमिट मिलते भी हैं, वे इतने सीमित और सशर्त होते हैं कि आस्था के उत्सव को एक प्रशासनिक यंत्रणा में बदल देते हैं।
इस साल ही केवल 4 हजार Palestinian Christians को परमिट दिया गया है। साथ में कड़ी शर्तें हैं – दिन के दिन ही लौटना होगा, रात में रुकने की इजाजत नहीं है।
कभी तायबे, बेथलेहम और रामल्ला जैसे वेस्ट बैंक के ईसाई गांवों से हजारों लोग यरूशलम आते थे। अब, सैकड़ों लोग चेकपॉइंट्स पर रोके जाते हैं, पुलिस के डंडे चलते हैं, पादरियों को सरेआम अपमानित किया जाता है। इस सबसे ऊपर, ईसाई समुदाय के मन में डर भर गया है।
पिछले कुछ सालों में यरूशलम और इजराइल में ईसाइयों पर हमले तेज हुए हैं। ये घटनाएं अकेली नहीं हैं। ये एक बड़ी तस्वीर का हिस्सा हैं – जहां एक समुदाय को धीरे-धीरे किनारे किया जा रहा है, उसकी आस्था को डराया जा रहा है।
दुनिया चुप क्यों?
एक और विरोधाभास देखिए – इजराइल दुनिया का एकमात्र यहूदी देश है, और उसका सबसे करीबी दोस्त कौन है? – अमेरिका, जो ईसाई-बहुल देश है।
लेकिन जब उसी इजराइल में ईसाइयों को चर्च तक जाने से रोका जाता है, उन्हें धार्मिक परंपराएं निभाने नहीं दी जातीं, या जब यरूशलम की गलियों में पादरियों पर थूका जाता है, तब अमेरिका की तरफ से न तो कोई निंदा होती है, और न ही कोई दबाव।
क्या यह चुप्पी केवल रणनीतिक है? या फिर यह बताती है कि राजनीति में धर्म का साथ केवल तब तक है, जब तक वह फायदेमंद हो?
ईसाइयों की जमीन को भी नहीं बख्शा गया
फिलिस्तीनी ईसाइयों (Palestinian Christians) को केवल पूजा से रोका नहीं जा रहा, उनकी जमीनें भी छीनी जा रही हैं। सेटलर ग्रुप्स – यानी कट्टर यहूदी बसाहटें – अब ईसाई संस्थाओं की संपत्ति पर कब्जा करने लगी हैं।
साल 2023 में रोमन कैथोलिक पैट्रिआर्क पीएर्बतिस्ता पिज़ाबाला ने खुलकर कहा था कि सरकार ने ऐसा माहौल बना दिया है जिसमें ईसाइयों पर हमले न केवल माफ किए जाते हैं, बल्कि उन्हें जायज ठहराया जाता है।
इन सबके बावजूद, यरूशलम की दीवारों के पीछे, चर्च की छतों पर, और चुपचाप बहती आस्था के उन धागों में, फिलिस्तीनी ईसाई (Palestinian Christians) हर साल ईस्टर मनाते हैं।
वे मानते हैं कि यीशु का संदेश – कि मृत्यु पर जीवन की जीत होती है – आज पहले से कहीं ज्यादा जरूरी है।



