
Dhurandhar Rehman Dakait : फिल्म धुरंधर (Dhurandhar) की रिलीज ने कराची के उस दौर की यादें फिर से ताजा कर दी हैं, जब लियारी की गलियों में डर बोलता था और अंडरवर्ल्ड के फैसले बंद कमरों में नहीं, सड़कों पर होते थे। यह कहानी उसी समय की है, जब ताकत, बदले और खून के बीच कराची का अपराध जगत सांस ले रहा था।
इसी अंधेरे दौर से जुड़ा है एक नाम – नूर उल हक (Noor ul Haq), भगोड़े डॉन दाऊद इब्राहिम (Dawood Ibrahim) का छोटा भाई। उसकी मौत को लेकर आज भी सवाल उठते हैं। भारतीय खुफिया एजेंसियों का दावा रहा है कि यह एक सामान्य मौत नहीं थी, बल्कि कराची के सबसे खौफनाक गैंगस्टर रहमान डकैत (Rehman Dakait) की साजिश थी।
मौत की कहानी, जो कभी साफ नहीं हुई
जब नूर उल हक की मौत हुई, तो दाऊद इब्राहिम के परिवार की ओर से कहा गया कि उन्हें दिल का दौरा पड़ा था। मामला वहीं दबा दिया गया। लेकिन इस कहानी को बहुत से लोगों ने मानने से इनकार कर दिया।
उनके मुताबिक, नूर उल हक का अपहरण किया गया, उसे बेरहमी से पीटा गया और फिर बेहद करीब से गोलियां मारकर उसकी हत्या कर दी गई। आरोप यह भी है कि शव को जानबूझकर दाऊद इब्राहिम के घर के पास फेंका गया। यह सिर्फ हत्या नहीं, सीधी चुनौती थी – धुरंधर रहमान की चुनौती (Dhurandhar Rehman Dakait)।
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धुरंधर का किरदार और असल जिंदगी का खौफ
धुरंधर में अक्षय खन्ना का किरदार रहमान बालोच (Rehman Baloch) दर्शकों को ठंडे खून वाले अपराधी की झलक देता है। कहा जाता है कि यह किरदार असल जिंदगी के रहमान डकैत (Dhurandhar Rehman Dakait) से प्रेरित है।
रहमान डकैत का जन्म 1975 में हुआ था। लियारी में पला-बढ़ा रहमान बहुत छोटी उम्र में अपराध की राह पर चल पड़ा। पहले छोटे-मोटे अपराध, फिर नशे का धंधा और उसके बाद धीरे-धीरे कराची के अंडरवर्ल्ड में उसकी पहचान बनने लगी।
डर का नाम था रहमान डकैत
2000 के दशक की शुरुआत तक रहमान डकैत (Dhurandhar Rehman Dakait) ने उस गैंग पर कब्जा कर लिया, जिसे कभी हाजी लल्लू चलाया करता था। इसके बाद उगाही, सुपारी किलिंग और ड्रग तस्करी उसके गैंग का रोजमर्रा का काम बन गया।
उसके साथ जुड़े लोग, जैसे उजैर बलोच (Uzair Baloch) और बाबा लाडला (Baba Ladla) भी अपनी बेरहमी के लिए बदनाम थे। कहा जाता है कि रहमान हिंसा का इस्तेमाल डर फैलाने के लिए करता था, ताकि कोई उसके खिलाफ खड़ा होने की हिम्मत न कर सके।
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दाऊद के परिवार पर वार
अंडरवर्ल्ड में एक अनकहा नियम होता है – परिवार को नहीं छूना। माना जाता है कि नूर-उल-हक की हत्या ने इसी नियम को तोड़ा।
जानकारों का कहना है कि यह हमला सिर्फ दाऊद से निजी दुश्मनी नहीं था, बल्कि कराची के अंडरवर्ल्ड में ताकत दिखाने की कोशिश थी। दाऊद इब्राहिम जैसे बड़े नाम को खुली चुनौती देना हर किसी के बस की बात नहीं थी।
रहमान डकैत का अंत, लेकिन लियारी शांत नहीं हुआ
अगस्त 2009 में कराची में पुलिस ऑपरेशन के दौरान रहमान डकैत (Dhurandhar Rehman Dakait) मारा गया। तब उसकी उम्र सिर्फ 34 साल थी। उसके बाद उसके चचेरे भाई उजैर बलोच ने गैंग की कमान संभाली, लेकिन लियारी में हिंसा और बदले का दौर चलता रहा।
आज जब धुरंधर (Dhurandhar) एक बार फिर कराची के उस खौफनाक अतीत को सामने लाती है, तो नूर-उल-हक की मौत को लेकर पुराने सवाल भी लौट आते हैं। सच क्या था, यह आज भी रहस्य है।
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