
राहुल गांधी का आरोप है कि दिल्ली में संसद चलो मार्च के दौरान पुलिस ने पैलेट गन का इस्तेमाल किया। वह एक छात्र को अपने साथ मीडिया के सामने ले आए।
Rahul Gandhi Pellet Gun Allegation : लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने दिल्ली में छात्र प्रदर्शन के दौरान पैलेट गन के इस्तेमाल का आरोप लगाकर केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में 19 वर्षीय छात्र साहिल को मीडिया के सामने पेश किया और दावा किया कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन के दौरान चली पैलेट गन से उसके चेहरे पर गंभीर चोट लगी है। राहुल गांधी के मुताबिक, साहिल की एक आंख की रोशनी स्थायी रूप से जाने का खतरा है।
वहीं, सोशल मीडिया पर भी कई प्रदर्शनकारियों ने दावा किया कि पुलिस ने पैलेट गन का इस्तेमाल किया, जिससे वे घायल हुए।
हालांकि, दिल्ली पुलिस ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया। पुलिस ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर जारी फैक्ट-चेक में कहा कि उसके पास न तो पैलेट गन है और न ही उसने प्रदर्शन के दौरान इसका इस्तेमाल किया (Rahul Gandhi Pellet Gun Allegation)।
इन आरोपों और जवाबों के बीच एक बार फिर सवाल उठने लगे हैं कि आखिर पैलेट गन क्या होती है, इसका इतिहास क्या है और दुनिया में पहली बार इसका इस्तेमाल कहां हुआ था?
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क्या होती है पैलेट गन?
पैलेट गन एक शॉटगन आधारित कम घातक हथियार है, जिसे भीड़ नियंत्रण के लिए विकसित किया गया था। इसके कारतूस में दर्जनों या सैकड़ों छोटे-छोटे धातु के छर्रे (Pellets) भरे होते हैं (Rahul Gandhi Pellet Gun Allegation)।
ट्रिगर दबाते ही ये छर्रे तेज गति से बाहर निकलते हैं और फैलकर बड़े क्षेत्र में पहुंच जाते हैं। यही कारण है कि एक निश्चित दूरी के बाद यह तय करना मुश्किल हो जाता है कि कौन-सा छर्रा किस व्यक्ति को लगेगा।
विशेषज्ञों के अनुसार यही इसकी सबसे बड़ी समस्या है। इसे कम घातक हथियार माना जाता है, लेकिन यह आंख, चेहरा और शरीर के संवेदनशील हिस्सों में गंभीर और कई बार स्थायी चोट पहुंचा सकती है (Rahul Gandhi Pellet Gun Allegation)।
पैलेट गन का इतिहास
पैलेट गन की जड़ें 19वीं और 20वीं सदी की शॉटगन तकनीक से जुड़ी हैं। हालांकि, आधुनिक अर्थों में भीड़ नियंत्रण के लिए पैलेट गन का विकास 1960 और 1970 के दशक में ब्रिटेन और अमेरिका में हुआ।
आधुनिक पैलेट गन या रबर और पैलेट आधारित कम घातक हथियारों का सबसे चर्चित इस्तेमाल उत्तरी आयरलैंड में हुआ।
1969 में शुरू हुए ‘द ट्रबल्स’ के दौरान ब्रिटिश सेना और पुलिस ने प्रदर्शनकारियों और दंगाइयों को नियंत्रित करने के लिए पहले रबर बुलेट और बाद में प्लास्टिक बुलेट का इस्तेमाल शुरू किया। इसके बाद विभिन्न देशों ने भीड़ नियंत्रण के लिए पैलेट और अन्य कम घातक हथियार विकसित किए।
इसी दौर में इजराइल, बेल्जियम, अमेरिका और ब्रिटेन ने ऐसे हथियारों पर व्यापक शोध किया।
भारत में पैलेट गन कब आई?
भारत में पैलेट गन का इस्तेमाल 1990 के दशक में शुरू हुआ (Rahul Gandhi Pellet Gun Allegation)।
1992 में रैपिड एक्शन फोर्स के गठन के बाद भीड़ नियंत्रण के लिए इज़राइल और बेल्जियम से पैलेट गन खरीदी गईं। उस समय एक पैलेट गन की कीमत लगभग 3 लाख रुपये बताई जाती है।
बाद में DRDO की मदद से इनका स्वदेशी संस्करण विकसित किया गया। शुरुआत में यह सिंगल-बैरल लॉन्चर था, जिसे बाद में बढ़ाकर छह बैरल वाला लॉन्चर बनाया गया।
भारत में पहली बार बड़े स्तर पर कब इस्तेमाल हुई?
भारत में पैलेट गन सबसे ज्यादा चर्चा में 2010 और विशेष रूप से 2016 में जम्मू-कश्मीर के दौरान आई (Rahul Gandhi Pellet Gun Allegation)।
जुलाई 2016 में हिजबुल मुजाहिदीन कमांडर बुरहान वानी की मौत के बाद घाटी में बड़े पैमाने पर हिंसक प्रदर्शन हुए। भीड़ को नियंत्रित करने के लिए सुरक्षा बलों ने व्यापक स्तर पर पैलेट गन का इस्तेमाल किया।
इस दौरान हजारों लोग घायल हुए और बड़ी संख्या में लोगों की आंखों में गंभीर चोटें आईं। कई मामलों में स्थायी रूप से दृष्टि चली गई। इसके बाद पैलेट गन के इस्तेमाल को लेकर भारत और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मानवाधिकार संगठनों ने गंभीर सवाल उठाए (Rahul Gandhi Pellet Gun Allegation)।
एक बार में कितने छर्रे निकलते हैं?
मल्टी-बैरल लॉन्चर में छह से आठ शेल लगाए जा सकते हैं। एक शेल से लगभग 30 छर्रे निकलते हैं। छह शेल दागने पर 180 से अधिक छर्रे कुछ सेकंड में निकल सकते हैं। आरएएफ की एक बटालियन में लगभग 100 पैलेट गन होती हैं।
पैलेट गन को कम घातक हथियार माना जाता है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि इसके छर्रों की दिशा पूरी तरह नियंत्रित नहीं की जा सकती (Rahul Gandhi Pellet Gun Allegation)।
इससे कई गंभीर समस्याएं सामने आती हैं, जैसे- आंखों की रोशनी जाने का खतरा, चेहरे पर स्थायी चोट, शरीर में गहरे घाव, बच्चों और राहगीरों के घायल होने का जोखिम।
मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि भीड़ नियंत्रण के लिए इसका इस्तेमाल अंतिम विकल्प होना चाहिए।
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सरकार ने क्या कदम उठाए?
2016 में केंद्र सरकार ने एक विशेषज्ञ समिति गठित की, जिसने पैलेट गन के विकल्प तलाशने की सिफारिश की।
इसके बाद सुरक्षा बलों को प्राथमिकता के आधार पर इन साधनों के इस्तेमाल का निर्देश दिया गया – PAVA (चिली) शेल, टियर स्मोक शेल, STUN-LAC शेल और ग्रेनेड, वाटर कैनन
रबर और प्लास्टिक बुलेट।
सरकार का कहना है कि पैलेट गन का इस्तेमाल केवल अत्यंत गंभीर परिस्थितियों में और तय स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) के अनुसार ही किया जाना चाहिए।
सीधे पैलेट गन नहीं चलाई जा सकती। सरकार के अनुसार बल प्रयोग की एक निर्धारित प्रक्रिया होती है। पहले समझाने, चेतावनी देने और कम घातक विकल्पों का इस्तेमाल किया जाता है। पैलेट गन का प्रयोग केवल तब किया जाना चाहिए जब अन्य सभी उपाय विफल हो जाएं और सार्वजनिक सुरक्षा पर गंभीर खतरा हो (Rahul Gandhi Pellet Gun Allegation)।
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