
Pakistan trying to form Islamic NATO : पश्चिम एशिया में तेजी से बदलते सुरक्षा समीकरणों के बीच एक नया रक्षा गठजोड़ आकार लेता दिख रहा है। तुर्किये, सऊदी अरब और पाकिस्तान शुक्रवार को सऊदी अरब में एक संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर कर सकते हैं। हालांकि, समझौते की पूरी शर्तें अभी सामने नहीं आई हैं।
अगर यह समझौता होता है तो तीनों देशों के बीच सैन्य सहयोग का दायरा बढ़ सकता है। इसके साथ ही कुछ समय से चल रही ‘इस्लामिक NATO’ की चर्चा भी तेज हो सकती है (Pakistan trying to form Islamic NATO)।
हालांकि पाकिस्तान लगातार यह कहता रहा है कि ऐसी किसी सुरक्षा व्यवस्था का मकसद किसी देश को निशाना बनाना नहीं है। उसका तर्क है कि क्षेत्रीय देशों को अपनी सुरक्षा के लिए एक-दूसरे के साथ सहयोग बढ़ाना चाहिए और बाहरी ताकतों पर निर्भरता कम करनी चाहिए (Pakistan trying to form Islamic NATO)।
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कैसे शुरू हुई ‘इस्लामिक NATO’ की चर्चा?
इस विचार को लेकर मई में पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने संकेत दिए थे। उन्होंने कहा था कि पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच पहले से मौजूद रक्षा सहयोग को आगे बढ़ाया जा सकता है। इसमें तुर्किये और कतर जैसे देशों को भी शामिल करने की संभावना पर बातचीत हो सकती है।
अगर तुर्किये और कतर जैसे देश इसमें शामिल होते हैं तो यह सिर्फ सैन्य सहयोग तक सीमित नहीं रह सकता। इससे पश्चिम एशिया और दक्षिण एशिया के कुछ अहम देशों के बीच एक बड़ा आर्थिक और रणनीतिक मंच भी बन सकता है (Pakistan trying to form Islamic NATO)।
यही वजह है कि इसे कई जगहों पर ‘इस्लामिक NATO’ कहा जा रहा है। हालांकि अभी इसे NATO जैसा औपचारिक सैन्य गठबंधन मानना जल्दबाजी होगी।
पाकिस्तान कर रहा ‘शांति’ की बात
पाकिस्तान इस संभावित गठजोड़ को किसी खास देश के खिलाफ खड़ा किया जाने वाला सैन्य संगठन नहीं बता रहा है।
इस्लामाबाद का कहना है कि इसका मकसद क्षेत्र में शांति और सुरक्षा को मजबूत करना है। साथ ही वह चाहता है कि मुस्लिम देशों को अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिका या किसी दूसरी बाहरी ताकत पर पूरी तरह निर्भर न रहना पड़े (Pakistan trying to form Islamic NATO)।
लेकिन पश्चिम एशिया की मौजूदा स्थिति को देखते हुए इस दावे के बावजूद इसके रणनीतिक असर को नजरअंदाज करना मुश्किल है। खासकर तब, जब क्षेत्र में अमेरिका, ईरान, इजरायल, तुर्किये और खाड़ी देशों के बीच रिश्ते तेजी से बदल रहे हैं।
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तुर्किये के जुड़ने से पहले ही पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच रक्षा संबंधों को एक नया आधार मिल चुका है।
सितंबर 2025 में दोनों देशों ने Strategic Mutual Defence Agreement पर हस्ताक्षर किए थे। समझौते का उद्देश्य दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग बढ़ाना और किसी संभावित हमले के खिलाफ साझा प्रतिरोध को मजबूत करना था। भारत ने उस समय कहा था कि वह इस समझौते का अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता पर असर देखेगा।
लेकिन पाकिस्तान इस गठबंधन का खर्च कैसे उठाएगा? (Pakistan trying to form Islamic NATO)
यहीं इस संभावित गठजोड़ की सबसे बड़ी चुनौती सामने आती है। पाकिस्तान लंबे समय से आर्थिक संकट से जूझ रहा है और उसे अपनी अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए IMF कार्यक्रम का सहारा लेना पड़ा है। मई 2026 में IMF ने पाकिस्तान के लिए करीब 1.1 अरब डॉलर की एक और किस्त को मंजूरी दी थी। IMF के मुताबिक दोनों मौजूदा कार्यक्रमों के तहत पाकिस्तान को अब तक करीब 4.8 अरब डॉलर की राशि मिल चुकी थी।
पाकिस्तान का सरकारी कर्ज भी उसकी अर्थव्यवस्था पर भारी दबाव डाल रहा है। IMF के अनुमान के मुताबिक 2026 में उसका general government debt GDP का करीब 67.5 फीसदी रह सकता है (Pakistan trying to form Islamic NATO)।
इसके बावजूद पाकिस्तान ने 2026-27 के बजट में रक्षा खर्च बढ़ाया है। प्रस्तावित बजट में रक्षा पर करीब 3 ट्रिलियन पाकिस्तानी रुपये खर्च करने का प्रावधान है, जो पिछले साल की तुलना में लगभग 18 फीसदी ज्यादा है। दूसरी तरफ विकास खर्च को सीमित रखा गया है।
इससे सवाल उठता है कि अगर तीन देशों के बीच रक्षा सहयोग और बढ़ता है तो पाकिस्तान इसका अतिरिक्त बोझ कैसे उठाएगा? क्या सऊदी अरब पाकिस्तान का आर्थिक सहारा बन सकता है? संभव है कि इस गठजोड़ (Pakistan trying to form Islamic NATO) में तीनों देशों की भूमिका बराबर न हो।
सऊदी अरब के पास तेल से होने वाली बड़ी आमदनी और विशाल वित्तीय संसाधन हैं। तुर्किये के पास बड़ा सैन्य ढांचा, रक्षा उद्योग और NATO का लंबा अनुभव है। पाकिस्तान के पास बड़ी सेना, परमाणु क्षमता और सैन्य अनुभव है।
इसलिए पाकिस्तान इस व्यवस्था में पैसे से ज्यादा अपनी सैन्य क्षमता के जरिए योगदान दे सकता है। दूसरी तरफ सऊदी अरब आर्थिक और सैन्य संसाधनों के जरिए बड़ी भूमिका निभा सकता है। अगर रक्षा सहयोग के साथ आर्थिक मदद, हथियारों की खरीद या रक्षा उद्योग में निवेश बढ़ता है तो पाकिस्तान को इसका सीधा फायदा मिल सकता है (Pakistan trying to form Islamic NATO)।
लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है। पाकिस्तान अगर अपनी सैन्य प्रतिबद्धताएं बढ़ाता है तो उसे अतिरिक्त खर्च करना होगा। IMF पहले ही उससे राजकोषीय अनुशासन और आर्थिक सुधारों की मांग कर रहा है। ऐसे में लंबे समय तक बढ़ती सैन्य जरूरतों और आर्थिक सुधारों के बीच संतुलन बनाना आसान नहीं होगा।
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क्या यह सच में NATO जैसा गठबंधन बन पाएगा?
अभी यह कहना जल्दबाजी होगी। NATO सिर्फ एक रक्षा समझौता नहीं है। उसके पास साझा सैन्य कमान, लंबे समय से विकसित संस्थागत ढांचा, संयुक्त अभ्यास, खुफिया सहयोग और सदस्य देशों की स्पष्ट सामूहिक रक्षा व्यवस्था है।
तुर्किये, सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच संभावित समझौता (Pakistan trying to form Islamic NATO) अभी उस स्तर पर नहीं है। तीनों देशों के अपने-अपने रणनीतिक हित हैं और कई क्षेत्रीय मुद्दों पर उनकी प्राथमिकताएं भी अलग हैं।
इसलिए इसे फिलहाल एक उभरते हुए रक्षा और सुरक्षा सहयोग के तौर पर देखना ज्यादा सही होगा।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह गठजोड़?
भारत के लिए इस घटनाक्रम का महत्व इसलिए है क्योंकि इसमें पाकिस्तान और तुर्किये दोनों शामिल हैं। दोनों देशों के भारत के साथ रिश्ते पिछले कुछ वर्षों में कई मुद्दों पर तनावपूर्ण रहे हैं (Pakistan trying to form Islamic NATO)।
वहीं सऊदी अरब भारत का एक महत्वपूर्ण आर्थिक और रणनीतिक साझेदार है। ऐसे में नई दिल्ली के लिए यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सऊदी अरब और पाकिस्तान के बढ़ते रक्षा संबंध भारत-सऊदी रिश्तों को किस तरह प्रभावित करते हैं।



