
38 minute war : इतिहास में कई युद्ध वर्षों तक चले और उनके असर ने पूरी दुनिया की राजनीति और सीमाओं को बदल दिया। लेकिन एक युद्ध ऐसा भी हुआ, जो शुरू होने के कुछ ही मिनट बाद खत्म हो गया। इसे इतिहास का सबसे छोटा युद्ध माना जाता है।
यह था एंग्लो-जांजीबार युद्ध (Anglo-Zanzibar War), जो 27 अगस्त 1896 को ब्रिटिश साम्राज्य और जांजीबार सल्तनत के बीच लड़ा गया। युद्ध करीब 38 मिनट चला। कुछ स्रोत इसकी अवधि 45 मिनट तक बताते हैं, लेकिन 38 मिनट का आंकड़ा सबसे ज्यादा प्रचलित है (38 minute war)।
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जांजीबार इतना महत्वपूर्ण क्यों था?
आज का जांजीबार तंजानिया के तट के पास हिंद महासागर में स्थित द्वीपसमूह है। 19वीं सदी के अंत में यह इलाका व्यापार और समुद्री रास्तों के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण था।
1890 तक जांजीबार ब्रिटेन का Protectorate बन चुका था। यानी सुल्तान औपचारिक रूप से शासन करता था, लेकिन वास्तविक राजनीतिक और सैन्य प्रभाव ब्रिटेन का था।
जांजीबार की अहमियत सिर्फ व्यापार तक सीमित नहीं थी। यह हिंद महासागर के महत्वपूर्ण समुद्री रास्तों पर स्थित था और ब्रिटिश भारत तथा यूरोप के बीच आने-जाने वाले जहाजों के लिए रणनीतिक केंद्र था (38 minute war)।
इसके अलावा, पूर्वी अफ्रीका के गुलामों के व्यापार को खत्म करने की ब्रिटिश कोशिशों में भी जांजीबार महत्वपूर्ण स्थान रखता था। लंबे समय से यह क्षेत्र गुलामों की खरीद-फरोख्त के बड़े केंद्रों में शामिल था।
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युद्ध की शुरुआत कैसे हुई?
एंग्लो-जांजीबार युद्ध (38 minute war) की शुरुआत सीधे किसी बड़े सैन्य विवाद से नहीं हुई थी। इसके पीछे सत्ता परिवर्तन मुख्य वजह बना।
अगस्त 1896 में ब्रिटेन समर्थक सुल्तान हमद बिन थुवैनी की अचानक मौत हो गई। माना जाता है कि उन्हें उनके चचेरे भाई खालिद बिन बरगश ने जहर दिया था, हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई। हमद की मौत के बाद खालिद ने ब्रिटिश मंजूरी के बिना खुद को जांजीबार का नया सुल्तान घोषित कर दिया।
यही कदम ब्रिटेन को मंजूर नहीं था। ब्रिटिश सरकार एक ऐसे उम्मीदवार को सुल्तान बनाना चाहती थी, जो उसके हितों के अनुकूल हो। इसके लिए उसने हमूद बिन मोहम्मद का समर्थन किया। खालिद के सत्ता संभालने से ब्रिटेन को इसलिए भी चिंता हुई क्योंकि उसे जर्मनी के प्रति सहानुभूति रखने वाला माना जाता था। उस समय अफ्रीका में ब्रिटेन और जर्मनी सहित यूरोपीय शक्तियों के बीच प्रभाव बढ़ाने की होड़ चल रही थी (38 minute war)।
ब्रिटेन ने खालिद को अल्टीमेटम दिया, पर उसने सत्ता छोड़ने से इनकार कर दिया। उसने अपने महल को मजबूत किया और करीब 2,800 समर्थकों को वहां जमा कर लिया। उसके पास तोपें और मशीनगनें भी थीं।
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दूसरी ओर, ब्रिटिश नौसेना के युद्धपोत जांजीबार के तट पर पहुंचने लगे। ब्रिटेन ने खालिद को साफ चेतावनी दी कि वह 27 अगस्त की सुबह 9 बजे तक सत्ता छोड़ दे, वरना सैन्य कार्रवाई की जाएगी (38 minute war)। खालिद ने यह चेतावनी नहीं मानी। उसे लगा कि उसके पास ब्रिटिश सेना का सामना करने के लिए पर्याप्त ताकत है।
38 मिनट में कैसे खत्म हो गया युद्ध?
27 अगस्त 1896 की सुबह 9 बजे ब्रिटेन की दी हुई समय-सीमा खत्म हो गई। इसके करीब दो मिनट बाद, 9 बजकर 2 मिनट पर ब्रिटिश युद्धपोतों ने गोलाबारी शुरू कर दी।
ब्रिटिश नौसेना की गोलाबारी से सुल्तान का महल कुछ ही मिनटों में बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया। जांजीबार की शाही नौका भी डुबो दी गई। इसके बाद ब्रिटिश सैनिक और नौसैनिक महल की ओर बढ़े।
जांजीबार की सेनाएं ब्रिटिश सैन्य शक्ति के सामने ज्यादा देर टिक नहीं सकीं। लगभग 38 मिनट के भीतर युद्ध समाप्त हो गया। इसी वजह से एंग्लो-जांजीबार युद्ध को इतिहास का सबसे छोटा युद्ध माना जाता है (38 minute war)।
युद्ध बहुत छोटा था, लेकिन इसका नुकसान एकतरफा था। अनुमान के मुताबिक जांजीबार की तरफ से करीब 500 लोग मारे गए या घायल हुए। इसके मुकाबले ब्रिटिश सेना को सिर्फ एक सैनिक के घायल होने का नुकसान उठाना पड़ा।
खालिद युद्ध के दौरान भागकर जर्मन वाणिज्य दूतावास पहुंच गया और वहां शरण ली। बाद में वह निर्वासन में रहा।
युद्ध (38 minute war) के बाद क्या हुआ?
ब्रिटेन ने अपनी पसंद के उम्मीदवार हमूद बिन मोहम्मद को जांजीबार का सुल्तान बना दिया। इसके साथ ही जांजीबार पर ब्रिटिश प्रभाव और मजबूत हो गया।
इस युद्ध ने यह भी दिखाया कि उस दौर में यूरोपीय औपनिवेशिक शक्तियों के पास सैन्य तकनीक और हथियारों की कितनी बड़ी बढ़त थी। स्थानीय शासकों के लिए इन शक्तियों का मुकाबला करना बेहद मुश्किल था।
इसके बाद जांजीबार लंबे समय तक ब्रिटिश संरक्षण में रहा। आखिरकार 10 दिसंबर 1963 को ब्रिटिश Protectorate समाप्त हुआ। इसके बाद जांजीबार एक संप्रभु राज्य बना और राष्ट्रमंडल का सदस्य बना।
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