
Swami Prasad Maurya Rahul Gandhi : उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनाव से पहले विपक्षी इंडिया गठबंधन ने अपना कुनबा बढ़ाने की तैयारी शुरू कर दी है। पूर्व मंत्री और अपनी जनता पार्टी (राष्ट्रीय) के अध्यक्ष स्वामी प्रसाद मौर्य ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी से मुलाकात के बाद इंडिया गठबंधन के साथ चुनाव लड़ने का ऐलान किया है। मौर्य के मुताबिक गठबंधन की औपचारिक घोषणा नवरात्र में होगी। सीटों और चुनावी रणनीति पर आगे बातचीत की जाएगी।
मौर्य ने कहा कि उनकी पार्टी अपने चुनाव चिह्न पर चुनाव लड़ेगी, लेकिन गठबंधन के साथ मिलकर साझा उम्मीदवार भी मैदान में उतारे जाएंगे। उन्होंने कांग्रेस को राष्ट्रीय स्तर पर देश के सामने एकमात्र विकल्प बताते हुए कहा कि विपक्ष का लक्ष्य बीजेपी को हटाना, देश और संविधान को बचाना है (Swami Prasad Maurya Rahul Gandhi)।
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मौर्य को साथ लाने के पीछे क्या है रणनीति?
स्वामी प्रसाद मौर्य को उत्तर प्रदेश की पिछड़ी जातियों की राजनीति में प्रभाव रखने वाला नेता माना जाता है। खासकर मौर्य, कुशवाहा, शाक्य और सैनी जैसे समुदायों के बीच उनकी राजनीतिक पकड़ का हवाला दिया जाता रहा है। यही वजह है कि कांग्रेस और इंडिया गठबंधन के लिए उन्हें साथ लाना पिछड़े वर्ग के वोटों को मजबूत करने की कोशिश के तौर पर देखा जा सकता है (Swami Prasad Maurya Rahul Gandhi)।
मौर्य का राजनीतिक सफर भी कई दलों से होकर गुजरा है। वह बहुजन समाज पार्टी में रहे, फिर बीजेपी में शामिल हुए और योगी आदित्यनाथ सरकार में मंत्री बने। 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले उन्होंने बीजेपी छोड़कर समाजवादी पार्टी का दामन थामा। बाद में सपा से भी अलग हुए और 2024 में अपनी नई पार्टी बनाई (Swami Prasad Maurya Rahul Gandhi)।
अब उनका कांग्रेस के साथ आना विपक्षी गठबंधन के लिए सामाजिक समीकरण साधने की कोशिश है। लेकिन यह कदम कांग्रेस के लिए पूरी तरह फायदे का सौदा होगा, ऐसा मानना जल्दबाजी होगी।
रामचरितमानस पर टिप्पणी से बड़ा विवाद
स्वामी प्रसाद मौर्य का नाम पिछले कुछ वर्षों में कई विवादों में रहा है। 2023 में रामचरितमानस की कुछ चौपाइयों को लेकर उनकी टिप्पणी पर बड़ा विवाद हुआ था। उन्होंने आरोप लगाया था कि कुछ अंश दलितों, आदिवासियों और पिछड़े वर्गों के खिलाफ हैं और उन्हें हटाने की मांग की थी। इसके बाद लखनऊ के हजरतगंज थाने में उनके खिलाफ धार्मिक भावनाएं आहत करने समेत कई धाराओं में एफआईआर दर्ज हुई थी (Swami Prasad Maurya Rahul Gandhi)।
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इसी विवाद के दौरान उनके बयानों को लेकर हिंदू संगठनों और साधु-संतों की ओर से भी तीखी प्रतिक्रिया आई थी। मौर्य ने हालांकि अपने बयान का बचाव करते हुए कहा था कि उनकी आपत्ति राम या किसी धर्म से नहीं, बल्कि कुछ विशेष अंशों से है।
उनके बयानों का यह रिकॉर्ड कांग्रेस के लिए राजनीतिक चुनौती बन सकता है। बीजेपी और उसके सहयोगी दल चुनाव के दौरान मौर्य के पुराने बयानों को मुद्दा बनाकर इंडिया गठबंधन को घेर सकते हैं (Swami Prasad Maurya Rahul Gandhi)।
कांग्रेस के लिए फायदे के साथ जोखिम भी
मौर्य को साथ लेने से कांग्रेस को पिछड़े वर्गों में अपनी पहुंच बढ़ाने का मौका मिल सकता है। खासकर उन सीटों पर जहां गैर-यादव ओबीसी वोट चुनावी नतीजों को प्रभावित करते हैं, मौर्य की भूमिका पर नजर रहेगी।
लेकिन सवाल यह भी है कि क्या उनका प्रभाव उतना व्यापक है, जितना उनके समर्थक दावा करते हैं। किसी नेता की जातीय पहचान और उसके समुदाय का पूरा वोट बैंक एक ही दिशा में चला जाए, यह जरूरी नहीं है। मौर्य की अपनी पार्टी और संगठन की जमीनी ताकत भी चुनाव में परखी जाएगी (Swami Prasad Maurya Rahul Gandhi)।
दूसरी चुनौती उनके विवादित बयानों की है। कांग्रेस अगर एक तरफ धार्मिक ध्रुवीकरण के खिलाफ अपनी राजनीति को आगे बढ़ाना चाहती है और दूसरी तरफ ऐसे नेता को साथ लाती है, जिनके बयानों को लेकर पहले बड़े विवाद हो चुके हैं, तो बीजेपी को हमला करने का आसान मौका मिल सकता है।
स्वामी प्रसाद मौर्य के साथ गठबंधन कांग्रेस और इंडिया ब्लॉक को कुछ सामाजिक समूहों तक पहुंच बनाने में मदद कर सकता है। लेकिन इसका लाभ तभी मिलेगा, जब गठबंधन मौर्य की राजनीतिक उपयोगिता और उनके विवादों के बीच संतुलन बना पाए (Swami Prasad Maurya Rahul Gandhi)।



