
भारत और पाकिस्तान के बीच क्रिकेट सिर्फ खेल नहीं रहा, बल्कि कई बार यह कूटनीति का मंच भी बना है। इसे ही क्रिकेट डिप्लोमेसी (India Pakistan Cricket Diplomacy) कहा गया। जब भी दोनों देशों के राजनीतिक रिश्ते बिगड़े, क्रिकेट का सहारा लेकर बातचीत के दरवाजे खोले गए। लेकिन यह कहानी हमेशा उम्मीद और निराशा के बीच झूलती रही है। इस एशिया कप (Asia Cup) ने भी दिखा दिया कि पाकिस्तान को क्रिकेट खेलकर नहीं सुधारा जा सकता।
जिया-उल-हक की दिल्ली यात्रा
1987 भारत-पाकिस्तान संबंधों का वह साल था, जब दोनों देश युद्ध की कगार पर पहुंच गए थे। भारत ने नवंबर 1986 से जनवरी 1987 तक राजस्थान में ऑपरेशन ब्रासस्टैक्स (Operation Brasstacks) नामक अपनी सबसे बड़ी सैन्य अभ्यास चलाया। यह अभ्यास परमाणु रणनीति का परीक्षण करने के लिए था, जिसमें भारतीय सेना ने पाकिस्तानी सीमा पर भारी संख्या में सैनिक तैनात कर दिए। पाकिस्तान ने भी जवाब में अपनी सेना की तैनाती बढ़ा दी, और जनवरी 1987 तक दोनों देशों की सेनाएं गोलीबारी की रेंज में आ गईं।
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ऐसे तनावपूर्ण माहौल में 21 फरवरी 1987 को पाकिस्तानी वायुसेना का एक विमान दिल्ली एयरपोर्ट पर उतरा। यात्री थे पाकिस्तान के तानाशाह राष्ट्रपति जनरल जिया उल-हक। जिया का बहाना था भारत-पाकिस्तान टेस्ट मैच देखना, जो जयपुर में खेला जा रहा था। यह क्रिकेट डिप्लोमेसी (India Pakistan Cricket Diplomacy) का पहला बड़ा उदाहरण था।
भारतीय प्रधानमंत्री राजीव गांधी को हवाई अड्डे पर जिया का स्वागत करने के लिए मजबूर होना पड़ा, हालांकि वह तैयार नहीं थे। जिया के साथ 68 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल था, जिसमें अधिकारी, खिलाड़ी और परिवार शामिल थे।
इस यात्रा ने तनाव कम करने में भूमिका निभाई। दोनों नेताओं ने डिनर पर एक घंटे की बातचीत की, और कुछ ही दिनों बाद दोनों देशों ने सीमा से सैनिक हटाने पर सहमति जताई। मार्च 1987 तक कश्मीर क्षेत्र से 1,50,000 सैनिक और रेगिस्तानी इलाके से और सैनिक पीछे हटाए गए। जिया ने इसे क्रिकेट फॉर पीस का मिशन बताया, जो शांति का प्रतीक बन गया (India Pakistan Cricket Diplomacy)।
और फिर धमकी
खबरें बताती हैं कि मैच के दौरान जिया ने राजीव गांधी को परमाणु बम का डर दिखाया। जिया ने कहा – अगर आप पाकिस्तान पर हमला करना चाहते हैं, तो कर लीजिए। लेकिन याद रखिए, दुनिया हलाकू खान और चंगेज खान को भूल जाएगी, लेकिन जिया उल-हक और राजीव गांधी को याद रखेगी। क्योंकि यह पारंपरिक युद्ध नहीं, बल्कि परमाणु युद्ध होगा।
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जिया ने साफ कहा कि पाकिस्तान के पास परमाणु बम है, और अगर स्थिति बिगड़ी तो वह इसका इस्तेमाल करेंगे। यह पाकिस्तान की परमाणु क्षमता का पहला अनौपचारिक खुलासा था। जिया के इस बयान ने क्रिकेट डिप्लोमेसी (India Pakistan Cricket Diplomacy) को वहीं दफ्न कर दिया।
वाजेपयी की उम्मीद और बदले में मिला कारिगल
अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल (1998-2004) में क्रिकेट को कूटनीति (India Pakistan Cricket Diplomacy) का नया सहारा बनाया गया। फरवरी 1999 में वाजपेयी ने लाहौर बस यात्रा की, जो शांति का प्रतीक बनी। उसी साल दोनों देशों ने लाहौर घोषणा पर हस्ताक्षर किए, जिसमें परमाणु और पारंपरिक हथियारों पर विश्वास-निर्माण उपायों पर सहमति हुई। लेकिन क्रिकेट सीरीज के बावजूद पाकिस्तान से जुड़े आतंकी हमले रुके नहीं।
कारगिल युद्ध (मई-जुलाई 1999) : लाहौर यात्रा के ठीक दो महीने बाद पाकिस्तानी सेना और आतंकियों ने कारगिल की चोटियों पर घुसपैठ की। इससे युद्ध छिड़ गया, जिसमें भारत ने पाकिस्तान को खदेड़ा। वाजपेयी ने इसे बेवकूफी भरा कदम बताया।
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2001 संसद हमला (13 दिसंबर 2001) : जैश-ए-मोहम्मद के पांच आतंकियों ने भारतीय संसद पर हमला किया। इसमें 9 लोग मारे गए। हमलावरों को पाकिस्तान की आईएसआई से निर्देश मिले थे। इससे 2001-2002 का भारत-पाकिस्तान स्टैंडऑफ हुआ, जहां लाखों सैनिक सीमा पर तैनात रहे।
इन हमलों के बावजूद, वाजपेयी ने शांति प्रयास जारी रखे। 2004 में उन्होंने पाकिस्तानी टीम को भारत आने की अनुमति दी, और ‘खेलो दिल से’ कहकर सीरीज (India Pakistan Cricket Diplomacy) शुरू की।
मनमोहन को मिला मुंबई हमलों का दर्द
मनमोहन सिंह (2004-2014) के कार्यकाल में भी क्रिकेट डिप्लोमेसी (India Pakistan Cricket Diplomacy) खूब इस्तेमाल हुई। 2003-2008 के बीच दो टेस्ट सीरीज पाकिस्तान में और दो भारत में हुईं।
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पाकिस्तानी राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ और मनमोहन सिंह के बीच की गर्मजोशी मैदान पर भी दिखी। 2011 वर्ल्ड कप सेमीफाइनल में मोहाली में भारत-पाकिस्तान की टीमें आमने-सामने थीं। दोनों देशों के प्रधानमंत्री ने दोनों टीमों से मुलाकात की।
हालांकि, इन सबके बावजूद पाकिस्तान कभी अपनी हरकतों से बाज नहीं आया। नवंबर 2008 में पाकिस्तान के भेजे आतंकियों ने मुंबई में कत्लेआम मचाया।
इसी साल इंडियन प्रीमियर लीग शुरू हुई थी और इसके पहले एडिशन में पाकिस्तान के खिलाड़ी खेले भी थे, पर मुंबई अटैक के बाद उनको कभी IPL में नहीं लिया गया।
2011 विश्व कप में रिश्तों को सुधारने की कोशिश हुई और बाद में पाकिस्तान की टीम ने भारत का दौरा भी किया था, लेकिन क्रिकेट डिप्लोमेसी का भूत तब तक उतरने लगा था।
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