
Golden Era of Indian Football : जब भी फुटबॉल विश्व कप शुरू होता है, तो भारत में यह सवाल उठने लगता है कि हमारी टीम क्यों नहीं? कब तक अर्जेंटीना या ब्राजील में भारतीय अपनी टीम और पसंदीदा खिलाड़ी चुनते रहेंगे? हालांकि एक वक्त देश फुटबॉल की बड़ी उभरती ताकत था। बहुत कम लोग जानते हैं कि तब भारतीय फुटबॉल टीम को एशिया की सबसे मजबूत टीमों में गिना जाता था। भारत को एशियाई फुटबॉल का ब्राजील तक कहा जाने लगा था।
आज यह सुनकर हैरानी हो सकती है कि भारत ने 1951 और 1962 के एशियाई खेलों में फुटबॉल का स्वर्ण पदक जीता था। 1951 में दिल्ली में भारत ने फाइनल में ईरान को हराया, जबकि 1962 के जकार्ता एशियाई खेलों में दक्षिण कोरिया को मात देकर दूसरा गोल्ड अपने नाम किया (Golden Era of Indian Football)।
1962 के टूर्नामेंट में भारत ने जापान जैसी मजबूत टीम को भी हराया था। आज यही जापान, दक्षिण कोरिया और ईरान लगातार फीफा विश्व कप में जगह बनाते हैं।
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राष्ट्रवाद से जुड़ी थी भारतीय फुटबॉल की पहचान
आजादी से पहले और उसके बाद के शुरुआती वर्षों में फुटबॉल केवल खेल नहीं था, बल्कि राष्ट्रीय स्वाभिमान का प्रतीक भी बन गया था (Golden Era of Indian Football)।
1911 में मोहन बागान ने आईएफए शील्ड के फाइनल में ब्रिटिश सेना की ईस्ट यॉर्कशायर रेजीमेंट को हराकर इतिहास रच दिया। इस जीत ने अंग्रेजों की नस्लीय श्रेष्ठता के मिथक को चुनौती दी।
इसी तरह डूरंड कप में भारतीय क्लब अक्सर ब्रिटिश सैन्य टीमों को चुनौती देते थे। 1940 में मोहम्मडन स्पोर्टिंग डूरंड कप जीतने वाला पहला भारतीय क्लब बना (Golden Era of Indian Football)।
1951 एशियाई खेलों के दौरान भारतीय टीम के स्टार स्ट्राइकर श्यो मेवालाल निजी कारणों से घर लौटना चाहते थे। उस समय के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू स्वयं उनके प्रशंसक थे। उन्होंने मेवालाल से देश के लिए फाइनल खेलने का आग्रह किया।
मेवालाल ने मैदान पर उतरकर ईरान के खिलाफ विजयी गोल दागा और भारत को पहला एशियाई स्वर्ण दिलाया। पदक समारोह के तुरंत बाद उन्हें विशेष वायुसेना विमान से कोलकाता भेजा गया (Golden Era of Indian Football)।
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नंगे पैर खेलकर भी दुनिया को चौंकाया
1948 के लंदन ओलंपिक में भारतीय खिलाड़ी बिना फुटबॉल बूट के मैदान पर उतरे थे। टीम की कप्तानी तालीमेरन एओ कर रहे थे, जो नगालैंड के मेडिकल छात्र थे।
भारत ने फ्रांस को आखिरी मिनट तक कड़ी टक्कर दी। मैच 2-1 से हारने के बावजूद भारतीय खिलाड़ियों के खेल की पूरी दुनिया में चर्चा हुई। यदि भारत अपनी दो पेनाल्टी का फायदा उठा लेता, तो नतीजा अलग हो सकता था।
जब एक ब्रिटिश पत्रकार ने एओ से पूछा कि भारतीय खिलाड़ी जूते क्यों नहीं पहनते, तो उनका ऐतिहासिक जवाब था, ‘यह फुटबॉल है, बूटबॉल नहीं।’
लंदन दौरे के दौरान भारतीय टीम ने कई इंग्लिश क्लबों को हराया और बाद में नीदरलैंड में प्रसिद्ध क्लब अजाक्स को भी 5-1 से मात दी (Golden Era of Indian Football)।
मेलबर्न ओलंपिक में भारत का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन
1956 के मेलबर्न ओलंपिक में भारत ने फुटबॉल में चौथा स्थान हासिल किया, जो आज भी देश का सर्वश्रेष्ठ ओलंपिक प्रदर्शन है।
क्वार्टर फाइनल में भारत ने मेजबान ऑस्ट्रेलिया को 4-2 से हराकर सनसनी फैला दी। इस जीत के नायक पी.के. बनर्जी, नेविल डिसूजा और गोलकीपर पीटर थंगराज थे। उस दौर में जापान और थाईलैंड जैसी एशियाई टीमें भारत से काफी पीछे थीं (Golden Era of Indian Football)।
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जब घर तक गिरवी रखना पड़ा
मेलबर्न ओलंपिक में भारतीय टीम की भागीदारी भी आसान नहीं थी। आर्थिक संकट के कारण ऑल इंडिया फुटबॉल फेडरेशन और भारतीय ओलिंपिक संघ के बीच विवाद हो गया।
पैसे जुटाने के लिए कई लोगों ने मदद की। अभिनेता दिलीप कुमार ने आर्थिक सहयोग दिया, जबकि भारतीय फुटबॉल संघ के अध्यक्ष पंकज गुप्ता ने अपना घर तक गिरवी रख दिया, ताकि टीम ओलंपिक में हिस्सा ले सके।
फ्रांस को ड्रॉ पर रोका
इसके बाद रोम में हुए अगले ओलंपिक में भी भारतीय टीम ने अच्छा खेल दिखाया। फ्रांस के साथ ड्रॉ खेला और हंगरी को कड़ी टक्कर दी। इटली के प्रेस ने भारतीयों की तारीफ करते हुए उसे उभरती हुई फुटबॉल शक्ति कहा था (Golden Era of Indian Football)।
लेकिन, अंतरराष्ट्रीय फलक पर सबसे चमकदार पल आना तो अभी बाकी था। वह मौका आया 1962 में जकार्ता में हुए एशियन गेम्स में। भारत ने वहां दक्षिण कोरिया को हराकर गोल्ड मेडल जीता। इस समय तक दो और बेहतरीन खिलाड़ी भारतीय फॉरवर्ड लाइन में शामिल हो चुके थे, तुलसीदास बलराम और चुन्नी गोस्वामी।
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इस गोल्ड तक पहुंचने का सफर भी गजब रहा। टीम की शुरुआत हार से हुई थी। पहले लीग मैच में ही उसे दक्षिण कोरिया से मात मिली। स्थिति तब और बिगड़ गई, जब इंडोनेशिया के दर्शक भारतीय खिलाड़ियों के खिलाफ हो गए। दरअसल, एक वरिष्ठ भारतीय अधिकारी ने इजरायल और ताइवान को खेलों से बाहर रखने के इंडोनेशिया के फैसले की आलोचना की थी। इन दो मुश्किलों के बाद एक तीसरी आफत भी आई। स्टार डिफेंडर जरनैल सिंह थाईलैंड के खिलाफ मैच के दौरान चोटिल हो गए। उनके सिर में चोट लगी थी।
हालांकि, ऐसे वक्त में हैदराबाद के कोच सैयद अब्दुल रहीम पूरी टीम के लिए प्रेरणादायक साबित हुए। उन्होंने चतुराई दिखाते हुए फॉरवर्ड लाइन में जरनैल सिंह को भी रखा। सिर पर टांके लगे होने के बावजूद जरनैल मैदान पर उतरे, तो विपक्षी टीम पर उसका अलग ही दबाव बना (Golden Era of Indian Football)।
फाइनल में भारत के लिए पहला गोल किया पीके बनर्जी ने और दूसरा आया जरनैल के पैरों से। दक्षिण कोरिया ने एक गोल दागा जरूर, लेकिन इससे केवल हार का अंतर कम हुआ। अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल में भारत के उस शानदार पल को बीते 64 साल हो चुके हैं। अब फुटबॉल को फिर से 1983 के क्रिकेट वर्ल्ड वाला मोमेंट चाहिए (Golden Era of Indian Football)।



