
Parshuram Dwadashi : भारतीय संस्कृति में हर त्योहार सिर्फ एक तिथि नहीं होता, बल्कि वह जीवन जीने का एक तरीका सिखाता है। ऐसा ही एक विशेष पर्व है परशुराम द्वादशी, जो भगवान विष्णु के छठे अवतार भगवान परशुराम को समर्पित है। यह दिन हमें धर्म, न्याय और संयम का महत्व समझाता है।
परशुराम द्वादशी (Parshuram Dwadashi) केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमें सिखाती है कि शक्ति का उपयोग कब और कैसे करना चाहिए।
परशुराम द्वादशी कब है (Parshuram Dwadashi Kab hai)?
साल 2026 में परशुराम द्वादशी 28 अप्रैल, मंगलवार को मनाई जाएगी। यह तिथि वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी को पड़ती है।
- द्वादशी तिथि शुरू : 27 अप्रैल 2026, शाम 06:15 बजे
- द्वादशी तिथि समाप्त : 28 अप्रैल 2026, शाम 06:51 बजे
- पारण (व्रत खोलने का समय) : 29 अप्रैल 2026, सुबह 05:24 से 08:00 बजे तक
पारण वाले दिन द्वादशी (Parshuram Dwadashi) सूर्योदय से पहले समाप्त हो जाएगी, इसलिए समय का विशेष ध्यान रखना जरूरी है।
परशुराम द्वादशी (Parshuram Dwadashi) क्या है?
परशुराम द्वादशी (Parshuram Dwadashi) एक पवित्र पर्व है, जो धर्म की स्थापना और अधर्म के विनाश का प्रतीक माना जाता है। भगवान विष्णु के अवतार भगवान परशुराम को एक ऐसे योद्धा ऋषि के रूप में जाना जाता है, जिन्होंने अन्याय के खिलाफ खड़े होकर संतुलन स्थापित किया।
उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना जरूरी है। शक्ति के साथ संयम भी उतना ही आवश्यक है।
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धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान परशुराम आठ चिरंजीवियों में से एक हैं, यानी वह आज भी जीवित माने जाते हैं। उन्होंने कठोर तपस्या कर भगवान शिव को प्रसन्न किया और उनसे दिव्य अस्त्र परशु प्राप्त किया।
उनका जीवन कई युगों से जुड़ा है। वह त्रेता युग में भगवान राम के समय भी थे और द्वापर युग में भगवान कृष्ण के समय भी। उन्होंने भीष्म पितामह, गुरु द्रोणाचार्य और कर्ण जैसे महान योद्धाओं को शिक्षा दी।
परशुराम द्वादशी का महत्व (Parshuram Dwadashi ka mahatva)
मान्यता है कि इस व्रत (Parshuram Dwadashi) से संतान सुख की प्राप्ति होती है। जीवन में सुख, समृद्धि और वैभव आता है और अंततः मोक्ष की प्राप्ति होती है।
धार्मिक कथाओं के अनुसार राजा दशरथ और वासुदेव ने भी यह व्रत किया था, जिससे उन्हें दिव्य संतान प्राप्त हुई।
परशुराम द्वादशी (Parshuram Dwadashi) का धार्मिक और सामाजिक संदेश भी है। यह दिन हमें अन्याय के खिलाफ खड़े होना, सत्य और धर्म का पालन करना और जरूरतमंदों की मदद करना सिखाता है।
पुराणों के अनुसार, भगवान परशुराम ने सहस्रबाहु को हराकर पूरी पृथ्वी अपने गुरु को दान कर दी थी। यह हमें सिखाता है कि सच्चा धर्म त्याग और समर्पण में है, अहंकार में नहीं।
व्रत और पूजा विधि
परशुराम द्वादशी (Parshuram Dwadashi) को श्रद्धा और नियम के साथ मनाया जाता है। सुबह जल्दी उठकर स्नान करने के बाद भगवान विष्णु और परशुराम का ध्यान किया जाता है। इसके बाद विधिपूर्वक पूजा की जाती है, जिसमें दीपक जलाना, फूल और प्रसाद अर्पित करना शामिल है।
भक्त पूरे दिन व्रत रखते हैं या फलाहार करते हैं और शाम को आरती के साथ व्रत का समापन करते हैं।
इस दिन कुछ कार्य विशेष रूप से शुभ माने जाते हैं – व्रत और उपवास रखना, भगवान परशुराम का जाप और ध्यान, अन्न, वस्त्र और जल का दान, जरूरतमंदों की सेवा, आत्मचिंतन और सुधार का संकल्प।



