

Rajiv Gandhi : सर्दी के मौसम में न्यूयॉर्क की एक अस्पताल की खिड़की से बाहर झांकते हुए वह अकेला आदमी मौत से आंख मिलाकर कुछ शब्दों से लड़ रहा था। शरीर कैंसर से जूझ रहा था, लेकिन मन भीतर कहीं गा रहा था, ‘हार नहीं मानूंगा, रार नई ठानूंगा…।’
वो आदमी कोई आम मरीज नहीं था। वह थे अटल बिहारी वाजपेयी (Atal Bihari Vajpayee)। वह अस्पताल में इसलिए थे, क्योंकि उन्हें कैंसर था और वह अमेरिका में इलाज करा सके थे तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी (Rajiv Gandhi) के कारण।
अटल बिहारी वाजपेयी तब सदन में विपक्ष की आवाज थे। अपने चुटीले अंदाज और वाकपटुता से सरकार को घेरने में माहिर। उनके सवालों का जवाब देना सरकार के लिए बहुत मुश्किल हो जाता था।
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लेकिन साल 1988 में वाजपेयी जी की गंभीर बीमारी के बारे में पता चला। उस समय इलाज के लिए अमेरिका ले जाना जरूरी था। अटल बिहारी वाजपेयी ने इस बारे में किसी को नहीं बताया, यहां तक कि अपने खास राजनीतिक दोस्तों को भी नहीं।
कवि मिजाज वाजपेयी नहीं चाहते थे कि लोगों को पता चले कि वह जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष कर रहे हैं।
उन्होंने बीमारी को भरसक छुपाने की कोशिश की, लेकिन किसी तरह से राजीव गांधी (Rajiv Gandhi) को इसका पता चल गया। उन्होंने वाजपेयी को अपने दफ्तर बुलाया और कहा कि संयुक्त राष्ट्र (UN General Assembly) के लिए भारत का प्रतिनिधिमंडल जा रहा है। मैं चाहता हूं कि आप भी उस प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा बनें।
अटल बिहारी वाजपेयी विपक्ष में थे, इसलिए वह राजीव गांधी (Rajiv Gandhi) के प्रस्ताव से चौंके। लेकिन इसके बाद राजीव गांधी ने जो कहा, उससे सारी बातें साफ हो गईं। वह धीरे से अटल बिहारी से बोले, ‘उम्मीद है कि इस मौके का इस्तेमाल आप अपने इलाज के लिए करेंगे।’
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वाजेपयी जी सारा माजरा समझ गए। वह प्रतिनिधिमंडल के साथ न्यूयॉर्क गए और वहां अपना इलाज कराया। उसी दौरान उन्होंने अपनी सबसे प्रसिद्ध कविताओं में से एक लिखी,
टूटे हुए सपनों की कौन सुने सिसकी,
अंतर की चीर व्यथा पलकों पर ठिठकी,
हार नहीं मानूंगा, रार नई ठानूंगा,
काल के कपाल पर लिखता हूं, मिटाता हूं,
गीत नया गाता हूं।
राजीव गांधी (Rajiv Gandhi) के बाद भी एक तरह से यह परंपरा बन गई कि संयुक्त राष्ट्र महासभा जाने वाले भारतीय प्रतिनिधिमंडल में अटल बिहारी वाजपेयी जरूर होते। दूसरे प्रधानमंत्रियों ने इसे कायम रखा।
वाजपेयी जी प्रतिनिधिमंडल के साथ न्यूयॉर्क जाते, वहां बैठक में हिस्सा लेते और फिर अपना मेडिकल चेकअप कराते।
हमेशा चुप रहे Rajiv Gandhi
राजीव गांधी (Rajiv Gandhi) ने इस घटना का जिक्र किसी से नहीं किया। दूसरे प्रधानमंत्रियों ने भी इस बारे में कभी कुछ नहीं कहा।
यह राज खुला खुद अटल बिहारी वाजपेयी के जरिये। उन्होंने कई बरसों बाद एक इंटरव्यू में पूरी घटना के बारे में बताया था। यह घटना कविता, राजनीति और करुणा का एक दुर्लभ संगम है। दो विपरीत ध्रुवों के नेता – एक सत्ता में, एक विपक्ष में – लेकिन जब बात इंसानियत की आई, तो राजनीति कहीं पीछे छूट गई।
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