
Historic defeat of Congress in Bihar : बिहार की राजनीति में जो तस्वीर इस बार उभरकर सामने आई है, उसमें सबसे अधिक नुकसान कांग्रेस पार्टी को होता दिखाई दे रहा है। शुरुआती रुझानों में पार्टी मुश्किल से पांच सीटों पर आगे चल रही है, जबकि 2020 के विधानसभा चुनाव में उसने 19 सीटों पर जीत हासिल की थी।
यह गिरावट सिर्फ एक चुनावी घटना नहीं, बल्कि बिहार में कांग्रेस की लगातार कमजोर होती जमीनी पकड़ और उसके तेजी से सिमटते राजनीतिक प्रभाव की ओर इशारा करती है। आंकड़ों से जाहिर होता है कि RJD ने अकेले ही लड़ाई लड़ी और उसे कांग्रेस से पूरा सपोर्ट नहीं मिला (Historic defeat of Congress in Bihar)।
गढ़ में कमजोर हुई पार्टी
बिहार में कांग्रेस का पारंपरिक वोट बैंक सीमांचल, मिथिला और मगध जैसे इलाके में है। इस बार यह वोटबैंक पार्टी के साथ नहीं खड़ा दिखा। कई ऐसी सीटें, जिन्हें कांग्रेस ने 2020 में सुरक्षित माना था, वहां भी उम्मीदवार पीछे होते नजर आए। 61 सीटों पर चुनाव लड़ने के बावजूद पार्टी केवल पांच पर ही बढ़त बना सकी, जो लगभग 10 प्रतिशत का बेहद कमजोर कन्वर्जन रेट है।
यह संकेत है कि पार्टी के पुराने सामाजिक आधार और जमीन से जुड़े कार्यकर्ताओं की ताकत अब पहले जैसी नहीं रही। बिहार के बदलते राजनीतिक समीकरणों में कांग्रेस को न तो स्थानीय स्तर पर नई जमीन मिली और न ही पुराने गढ़ बच पाए (Historic defeat of Congress in Bihar)।
बिहार में नेतृत्व संकट
एक बड़ा कारण कांग्रेस के नेतृत्व संकट से भी जुड़ा है। 1990 में जगन्नाथ मिश्र के बाद से पार्टी बिहार में कोई ऐसा चेहरा नहीं खड़ा कर सकी जो कार्यकर्ताओं को जोड़ सके या जनता के बीच एक विश्वसनीय विकल्प बन सके (Historic defeat of Congress in Bihar)।
तीन दशकों में यह नेतृत्व शून्यता धीरे-धीरे कांग्रेस को किनारे धकेलती रही और अब हालत यह है कि बिहार की राजनीति में पार्टी एक परिधीय खिलाड़ी बनकर रह गई है। इसके विपरीत, राजद और जदयू जैसे दल लगातार जमीनी स्तर पर सक्रिय रहे और उन्होंने अपने सामाजिक आधार को बचाए रखा।
आम जनता से दूरी
कांग्रेस की चुनावी रणनीति भी इस बार जनता से दूर नजर आई। पार्टी ने वोटर चोरी, स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन ड्राइव और वोटर अधिकार यात्रा जैसे मुद्दों को चुनावी प्रचार का केंद्र बनाया, लेकिन ये बातें आम मतदाताओं के साथ जुड़ नहीं सकीं (Historic defeat of Congress in Bihar)।
बिहार के लोगों के लिए इस बार भी रोजगार, स्थानीय विकास, सड़क, शिक्षा और महिलाओं की सुरक्षा जैसे मुद्दे ज्यादा महत्वपूर्ण रहे। कांग्रेस का फोकस जहां राष्ट्रीय राजनीति पर था, वहीं बिहार के मतदाता स्थानीय चिंताओं को लेकर ज्यादा सजग थे।
संगठन लगातार कमजोर हो रहा (Historic defeat of Congress in Bihar)
2020 के चुनाव में कांग्रेस ने 70 सीटों में से 27 जीती थीं और उसका कन्वर्जन रेट 38 प्रतिशत था। लेकिन इस बार स्थिति उलट गई है। 61 सीटों में से सिर्फ पांच पर बढ़त मिलना बताता है कि पार्टी की जमीनी मौजूदगी और भी अधिक कमजोर हो चुकी है। वहीं दूसरी ओर, भाजपा और जदयू के समीकरण इस बार भी असरदार साबित होते दिख रहे हैं।
अगर शुरुआती रुझान कायम रहते हैं, तो भाजपा लगातार दूसरी बार जदयू से बेहतर प्रदर्शन कर सकती है, जिससे पार्टी के भीतर अपने मुख्यमंत्री चेहरे की मांग और तेज होने की संभावना है। एनडीए की मजबूत एकजुटता और मोदी-नीतीश की विकासपरक छवि ने विपक्ष के लिए खासकर कांग्रेस के लिए काफी कम जगह छोड़ी है।
कुल मिलाकर, बिहार में कांग्रेस की स्थिति अब एक गंभीर राजनीतिक संकट का रूप ले चुकी है। न संगठनात्मक ताकत बची है, न नेतृत्व, न सामाजिक आधार, न जमीन से जुड़ी रणनीति। महागठबंधन मजबूत दिख सकता है, लेकिन उसकी सबसे कमजोर कड़ी कांग्रेस ही है। यदि पार्टी ने समय रहते स्थानीय नेतृत्व को मजबूत करने, संगठन को पुनर्जीवित करने और बिहार की जमीनी राजनीति को समझने की कोशिश नहीं की, तो आने वाले चुनावों में स्थिति और भी कठिन हो सकती है।



