
अरावली पहाड़ियों (Aravalli Hills) को लेकर जारी विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को बड़ा कदम उठाया है। शीर्ष अदालत ने नवंबर 2025 में दिए गए अपने आदेश को फिलहाल स्थगित कर दिया है और कहा है कि अरावली की परिभाषा को लेकर कुछ अहम स्पष्टीकरण जरूरी हैं।
सुप्रीम कोर्ट स्वतः संज्ञान लेकर मामले की सुनवाई कर रहा था, जिसमें अरावली पहाड़ियों की वैज्ञानिक परिभाषा, उनके संरक्षण और खनन गतिविधियों पर रोक से जुड़े मुद्दे शामिल हैं। यह मामला उस आदेश के बाद सामने आया, जिसमें अदालत ने अरावली की एक समान परिभाषा स्वीकार करते हुए दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात में नए खनन पट्टों पर रोक लगा दी थी।
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पुराने आदेश पर क्यों लगाई गई रोक
मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने कहा कि विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट और अदालत की टिप्पणियों को कुछ जगहों पर गलत तरीके से समझा गया है। ऐसे में अदालत ने फैसला किया कि जब तक एक नई, स्वतंत्र और निष्पक्ष उच्चस्तरीय विशेषज्ञ समिति अपनी रिपोर्ट नहीं दे देती, तब तक 20 नवंबर 2025 का आदेश और उससे जुड़ी सिफारिशें लागू नहीं होंगी।
अदालत ने साफ किया कि अरावली पहाड़ियों (Aravalli Hills) और पर्वतमालाओं का multi-temporal examination किया जाएगा, यानी समय के साथ उनके भूगोल, संरचना और पर्यावरणीय बदलावों का अध्ययन होगा।
केंद्र और चार राज्यों को नोटिस
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और उन चार राज्यों – राजस्थान, गुजरात, हरियाणा और दिल्ली को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है, जिनसे होकर अरावली पर्वत श्रृंखला (Aravalli Hills) गुजरती है।
क्या थी विवादित परिभाषा
पहले गठित विशेषज्ञ समिति ने सुझाव दिया था कि अरावली हिल (Aravalli Hills) वह भू-भाग होगा, जो अधिसूचित अरावली जिलों में स्थानीय भू-स्तर से 100 मीटर या उससे अधिक ऊंचा हो। अरावली रेंज वह क्षेत्र होगा, जहां 500 मीटर के दायरे में दो या उससे अधिक अरावली पहाड़ मौजूद हों।
इसी परिभाषा के आधार पर खनन गतिविधियों पर व्यापक असर पड़ने लगा था, जिसके बाद विरोध और भ्रम की स्थिति बनी।
अरावली (Aravalli Hills) क्यों है इतनी खास?
अरावली पर्वत श्रृंखला सिर्फ पहाड़ों की एक कतार नहीं है, बल्कि यह उत्तर भारत की पर्यावरणीय ढाल मानी जाती है। यह थार रेगिस्तान को गंगा के मैदानों तक बढ़ने से रोकती है। अरावली भूजल रिचार्ज, जैव विविधता और वायु गुणवत्ता (AQI) को बनाए रखने में अहम भूमिका निभाती है।
दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण की समस्या और पानी का संकट सीधे तौर पर अरावली (Aravalli Hills) के कमजोर होते इकोसिस्टम से जुड़ा माना जाता है।
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अरावली (Aravalli Hills) का निर्माण कैसे हुआ?
अरावली पर्वतमाला दुनिया की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है। भूवैज्ञानिकों के अनुसार इसका निर्माण लगभग 3.2 अरब से 2.5 अरब वर्ष पहले हुआ था, जब पृथ्वी की टेक्टोनिक प्लेट्स आज जैसी सक्रिय नहीं थीं।
यह पर्वतमाला fold mountains की श्रेणी में आती है, लेकिन समय के साथ अत्यधिक अपरदन (erosion) के कारण इसकी ऊंचाई कम होती चली गई। आज अरावली की कई पहाड़ियां सपाट और खंडित दिखाई देती हैं, जो इसकी प्राचीनता का प्रमाण हैं।
दुनिया में अरावली (Aravalli Hills) जैसी और कौन-सी रेंज हैं?
- Appalachian Mountains (USA) : अमेरिका की यह पर्वतमाला भी अरबों साल पुरानी है और यहां खनन पर कड़े नियम हैं।
- Ural Mountains (Russia) : यूरोप और एशिया को विभाजित करने वाली यह श्रृंखला भी संरक्षण कानूनों के दायरे में है।
- Scottish Highlands (UK) : यहां पुराने पहाड़ों के संरक्षण के लिए लैंड-यूज कंट्रोल बेहद सख्त है।
दुनिया के कई देशों में प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं के संरक्षण के लिए खनन पर सीमाएं, ग्रीन बेल्ट और बायोस्फियर रिजर्व, स्थानीय समुदायों की भागीदारी और सख्त पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) जैसे उपाय अपनाए जा रहे हैं। भारत में भी अरावली (Aravalli Hills) के लिए ऐसी ही समग्र नीति की जरूरत महसूस की जा रही है, ताकि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बना रहे।
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