
US Latin America intervention history : अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के आदेश पर वेनेजुएला पर हुए सैन्य हमले ने पूरी दुनिया का ध्यान एक बार फिर अमेरिका और लैटिन अमेरिका के लंबे और विवादास्पद रिश्तों की ओर खींच लिया है। कराकस में धमाके, सैन्य ठिकानों पर हमले और सत्ता परिवर्तन के संकेत ऐसे नहीं हैं जो इतिहास में पहली बार दिखाई दे रहे हों।
पिछले दो सौ वर्षों में अमेरिका ने मध्य अमेरिका, दक्षिण अमेरिका और कैरेबियन देशों में बार-बार सैन्य हस्तक्षेप किए हैं। कभी इन्हें सुरक्षा के नाम पर जायज ठहराया गया, तो कभी लोकतंत्र बचाने या ड्रग्स के खिलाफ युद्ध का बहाना बनाया गया। लेकिन आलोचकों का मानना है कि असली वजह अक्सर सत्ता परिवर्तन और अमेरिकी हितों की रक्षा रही है (US Latin America intervention history)।
बनाना वॉर से हुई शुरुआत
1823 में अमेरिकी राष्ट्रपति जेम्स मोनरो ने एक नीति घोषित की – Monroe Doctrine। इसके तहत अमेरिका ने कहा कि यूरोपीय ताकतें अब अमेरिका महाद्वीप में दखल नहीं देंगी। सुनने में यह नीति लैटिन अमेरिका की रक्षा जैसी लगती थी, लेकिन धीरे-धीरे इसका अर्थ बदल गया।
असल संदेश यह बन गया – लैटिन अमेरिका में दखल सिर्फ अमेरिका करेगा (US Latin America intervention history)। यहीं से अमेरिका ने खुद को इस पूरे क्षेत्र का स्वघोषित संरक्षक और निर्णायक मानना शुरू किया।
19वीं सदी के अंत और 20वीं सदी की शुरुआत में अमेरिका ने मध्य अमेरिका और कैरेबियन देशों में बार-बार सैन्य हस्तक्षेप किए। इन्हें इतिहास में Banana Wars कहा जाता है। इन युद्धों का मकसद लोकतंत्र नहीं था, बल्कि अमेरिकी कंपनियों की सुरक्षा, केले, चीनी और कृषि व्यापार पर नियंत्रण और स्थानीय सरकारों को अमेरिकी हितों के अनुसार चलाना था।
होंडुरास, निकारागुआ, हैती और डोमिनिकन रिपब्लिक जैसे देशों में अमेरिकी मरीन उतरे, सरकारें बदली गईं और कठपुतली शासक बैठाए गए (US Latin America intervention history)।
वादा किया और तोड़ दिया
1934 में अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी रूजवेल्ट ने Good Neighbor Policy की घोषणा की और वादा किया कि अमेरिका अब लैटिन अमेरिकी देशों के आंतरिक मामलों में दखल नहीं देगा।
लेकिन यह नीति शीत युद्ध (Cold War) के दौर में लगभग बेअसर हो गई। जैसे-जैसे दुनिया दो ध्रुवों – अमेरिका और सोवियत संघ में बंटी, अमेरिका ने वामपंथी सरकारों को गिराने के लिए गुप्त और खुले ऑपरेशन तेज कर दिए। इस काम में सबसे बड़ी भूमिका निभाई CIA, जिसकी स्थापना 1947 में हुई थी (US Latin America intervention history)।
ग्वाटेमाला में चुनी हुई सरकार का तख्तापलट
1954 में अमेरिका ने ग्वाटेमाला के निर्वाचित राष्ट्रपति जैकोबो आर्बेन्ज को सत्ता से हटाने में अहम भूमिका निभाई। उनका अपराध सिर्फ इतना था कि वह एक अमेरिकी कंपनी का राष्ट्रीयकरण करना चाहते थे।
CIA के Operation PBSuccess के तहत सैन्य अफसर कार्लोस कास्टिलो आर्मस को सत्ता दिलाई गई। इसके बाद देश दशकों तक गृहयुद्ध और हिंसा में डूबा रहा।
क्यूबा में मिली नाकामी
1959 में फिदेल कास्त्रो ने क्यूबा में सत्ता संभाली और अमेरिका विरोधी रुख अपनाया। CIA ने क्यूबाई निर्वासितों को ट्रेनिंग देकर सत्ता पलटने की योजना बनाई।
1961 में राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी ने Bay of Pigs Invasion को मंजूरी दी, लेकिन यह ऑपरेशन बुरी तरह असफल रहा और कास्त्रो और मजबूत होकर उभरे (US Latin America intervention history)।
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ब्राजील में तबाही
1961 में ब्राजील को जोआओ गूलार्ट जैसा राष्ट्रपति मिला, जो अमीर–गरीब के फर्क को कम करना चाहता था। उसने समाज सुधार की बात की, मजदूरों के हक में फैसले लिए और क्यूबा जैसे देशों से रिश्ते भी बनाए। यहीं से अमेरिका असहज हो गया।
जैसे ही गूलार्ट ने एक अमेरिकी कंपनी की ब्राजील वाली इकाई को सरकारी नियंत्रण में लिया, वॉशिंगटन की बेचैनी खुलकर सामने आ गई। पर्दे के पीछे अमेरिका समर्थक नेताओं और समूहों को आगे किया गया। माहौल ऐसा बना कि 1964 में सेना ने सत्ता संभाल ली। इसके बाद ब्राजील करीब 20 साल तक सैन्य शासन के अधीन रहा (US Latin America intervention history)।
इक्वाडोर में अमेरिका की वजह से अस्थिरता (US Latin America intervention history)
1950 के दशक में इक्वाडोर ने कुछ समय की शांति देखी थी, लेकिन 1960 आते-आते हालात फिर बिगड़ने लगे। राष्ट्रपति वेलास्को इबारा और उनके सहयोगी क्यूबा से नजदीकियां बढ़ा रहे थे। अमेरिका को लगा कि इक्वाडोर उसके हाथ से निकल रहा है। नतीजा यह हुआ कि देश के भीतर कम्युनिज्म के खिलाफ माहौल बनाया गया। पहले सत्ता के भीतर खींचतान चली और फिर 1963 में सेना ने सरकार ही पलट दी।
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बोलीविया में बार-बार दखल
बोलीविया में अमेरिका का हस्तक्षेप एक बार का नहीं था। 1964 में चुनी हुई सरकार को हटाकर सेना को आगे किया गया। फिर 1970 में जब राष्ट्रपति जुआन जोसे टोरेस ने विदेशी कंपनियों पर लगाम कसनी शुरू की, तो कहानी दोहराई गई। इस बार भी सेना ने सत्ता हथिया ली। अमेरिका ने नई सरकार को खुला समर्थन दिया। दिलचस्प बात यह रही कि वही सैन्य शासक बाद में चुनाव जीतकर फिर सत्ता में लौट आया (US Latin America intervention history)।
चिली में लोकतंत्र से तानाशाही तक
चिली में साल्वाडोर आयेंदे चुनाव जीतकर सत्ता में आए थे। वह देश की खनिज संपदा पर चिली का हक चाहते थे। यह बात अमेरिकी कंपनियों को रास नहीं आई। धीरे-धीरे देश में अस्थिरता बढ़ाई गई और 1973 में सेना ने सत्ता छीन ली। आयेंदे की मौत इसी उथल-पुथल के बीच हुई। इसके बाद चिली पर 17 साल तक एक सख्त सैन्य शासन थोप दिया गया (US Latin America intervention history)।
ऑपरेशन कोंडोर, जब डर को सिस्टम बना दिया गया
1970 के दशक में लैटिन अमेरिका के कई देशों में सैन्य तानाशाह सत्ता में थे। अलग-अलग दिखने वाली ये सरकारें असल में एक ही सोच से जुड़ी थीं। जो भी सवाल उठाए, जो भी सत्ता का विरोध करे, उसे खत्म कर दो। इसी सोच को एक संगठित ढांचे में बदलने का नाम था ऑपरेशन कोंडोर।
अमेरिका की खुफिया एजेंसी CIA के समर्थन से अर्जेंटीना, चिली, ब्राजील, उरुग्वे, पराग्वे और बोलीविया की सैन्य सरकारों ने आपस में हाथ मिला लिया। अब सीमा कोई बाधा नहीं रही। अगर कोई विरोधी एक देश से भागकर दूसरे देश पहुंचा, तो भी वह सुरक्षित नहीं था (US Latin America intervention history)।
इन देशों ने मिलकर एक साझा डाटाबेस बनाया, जिसमें सरकार विरोधियों, वामपंथी कार्यकर्ताओं, छात्रों, पत्रकारों और यहां तक कि उनके परिवारों तक की जानकारी दर्ज की जाती थी। खुफिया सूचनाएं, गिरफ्तारियां, कैदी और यातना के तरीके – सब कुछ एक-दूसरे के साथ बांटा जाता था।
इस दौर में लोगों को रातों-रात घरों से उठा लिया जाता, कई बार वे कभी वापस नहीं आते। कुछ की लाशें मिलीं, कई हमेशा के लिए गायब हो गए। डर इतना गहरा था कि लोग बोलना ही भूल गए (US Latin America intervention history)।
आज इतिहासकार मानते हैं कि ऑपरेशन कोंडोर सिर्फ एक सुरक्षा अभियान नहीं था, बल्कि सत्ता को बचाने के लिए डर को हथियार बनाने की पूरी व्यवस्था थी। यह वह दौर था जब लोकतंत्र को कुचलने का काम संगठित तरीके से किया गया और उसकी कीमत आम लोगों ने अपनी जान और आजादी से चुकाई।
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ग्रेनाडा में दखल (US Latin America intervention history)
ग्रेनाडा एक छोटा-सा कैरेबियाई द्वीप देश है। साल 1979 में वहां के नेता मॉरिस बिशप ने सत्ता संभाली। उस समय देश के प्रधानमंत्री एरिक गैरी विदेश में थे। सत्ता में आने के बाद बिशप ने मार्क्सवादी–लेनिनवादी नीतियां अपनाईं और क्यूबा जैसे समाजवादी देशों के करीब जाने लगे।
1980 के शुरुआती वर्षों में अमेरिका को यह डर सताने लगा कि ग्रेनाडा पर क्यूबा का असर बढ़ रहा है। इसी बीच अक्टूबर 1983 में बिशप की पार्टी के भीतर सत्ता को लेकर भीषण अंदरूनी संघर्ष शुरू हो गया। हालात इतने बिगड़े कि खून-खराबा होने लगा (US Latin America intervention history)।
इसी मौके का फायदा उठाकर अमेरिका ने Operation Urgent Fury नाम से ग्रेनाडा पर हमला कर दिया। अमेरिकी सेना ने देश में घुसकर वहां मौजूद क्यूबाई नागरिकों को पकड़ लिया और सत्ता व्यवस्था को इस तरह बदला कि ग्रेनाडा का भविष्य अमेरिकी हितों के मुताबिक तय हो सके।
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पनामा पर हमला
साल 1989 में अमेरिका ने पनामा पर सीधा सैन्य हमला किया। उस समय अमेरिका के राष्ट्रपति जॉर्ज एच. डब्ल्यू. बुश थे। इस हमले को Operation Just Cause नाम दिया गया।
अमेरिका ने इस हमले को यह कहकर सही ठहराया कि वह पनामा के राष्ट्रपति मैनुअल नोरीएगा को हटाना चाहता है, जिन पर ड्रग तस्करी के आरोप लगाए गए थे। लेकिन हमले में कितने लोग मारे गए, इसका सही आंकड़ा अमेरिका ने कभी साफ तौर पर सामने नहीं रखा (US Latin America intervention history)।
इस हमले के बाद नोरीएगा की सत्ता खत्म हो गई और पनामा की राजनीति पर लंबे समय तक अमेरिकी प्रभाव बना रहा।
इतिहास खुद को दोहरा रहा है?
अब वही सवाल वेनेजुएला के संदर्भ में उठ रहा है। ट्रंप प्रशासन मादुरो सरकार पर ड्रग तस्करी और तानाशाही के आरोप लगा रहा है, लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि असली वजह वेनेजुएला का विशाल तेल भंडार, चीन और रूस से उसकी नजदीकी और अमेरिका समर्थक सत्ता की स्थापना हो सकती है (US Latin America intervention history)।
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