
History of Diego Garcia : अमेरिका-इजरायल और ईरान (America Israel and Iran War) की आंच हिंद महासागर तक पहुंच गई है। ब्रिटेन ने कहा था कि उसके मिलिट्री बेस का इस्तेमाल होर्मुज स्ट्रेट पर ईरानी हमलों को रोकने के लिए किया जा सकता है। इसके जवाब में ईरान ने ब्रिटेन को चेतावनी दी थी कि अमेरिका की ओर से Diego Garcia मिलिट्री बेस का इस्तेमाल किए जाने को ‘तनाव बढ़ाने’ के रूप में लिया जाएगा। इसके बाद ईरान ने इस द्वीप पर दो मिसाइल दागीं, जिन्हें बीच में ही इंटरसेप्ट कर लिया गया।
यह द्वीप हाल में काफी चर्चा में रहा है। डोनाल्ड ट्रंप ने सवाल उठाया कि ब्रिटेन Diego Garcia द्वीप को मॉरिशस को क्यों लौटा रहा है, जबकि वहां अमेरिका का एक अहम सैन्य अड्डा मौजूद है। ट्रंप ने इसे ब्रिटेन की कमजोरी बताया था दावा किया कि चीन और रूस इस पर नजर रखे हुए हैं।
यहीं से Diego Garcia एक बार फिर वैश्विक राजनीति के केंद्र में आ गया है। लेकिन यह द्वीप सिर्फ एक सैन्य ठिकाना नहीं है। इसके पीछे उपनिवेशवाद, विस्थापन, टूटी जिंदगियां और भूली-बिसरी संस्कृतियों की एक लंबी और दर्दनाक कहानी छिपी हुई है (History of Diego Garcia)।
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एक द्वीप, जो कभी घर हुआ करता था (History of Diego Garcia)
Diego Garcia हिंद महासागर में स्थित Chagos Archipelago का सबसे बड़ा द्वीप है। यह मालदीव और मॉरिशस के बीच पड़ता है और ब्रिटिश इंडियन ओशन टेरिटरी (BIOT) का हिस्सा है। इसका क्षेत्रफल लगभग 44 वर्ग किलोमीटर है। यह द्वीप मुख्य रूप से नीले समुद्र, नारियल के पेड़ों और लैगून से घिरा हुआ है।
16वीं सदी में पुर्तगाली नाविकों ने Diego Garcia और आसपास के द्वीपों की खोज की थी। 18वीं सदी में फ्रांसीसी इस द्वीप पर आए और मुख्य रूप से नारियल और कृषि के लिए इसका इस्तेमाल किया।
इस समय, द्वीप पर रहने वाले लोग मुख्य रूप से अफ्रीकी दास और फ्रांसीसी व्यापारी थे। ये लोग स्थानीय खेती, मछली पकड़ने और सामुदायिक जीवन में लगे रहते थे।
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ब्रिटेन का नियंत्रण (1814–1960)
1814 में ब्रिटेन ने फ्रांस से Chagos Archipelago को कब्जा लिया और इसे अपने भारतीय महासागर क्षेत्र में शामिल कर लिया (History of Diego Garcia)। ब्रिटिश शासन ने धीरे-धीरे द्वीप पर प्रशासनिक नियंत्रण स्थापित किया, लेकिन तब तक वहां के स्थानीय लोग यानी Chagossians का जीवन शांत और सामुदायिक था।
1965 में मॉरिशस को स्वतंत्रता मिलने वाली थी। तब ब्रिटेन ने Chagos Archipelago को मॉरिशस से अलग कर लिया और इसे अपने British Indian Ocean Territory (BIOT) में शामिल कर दिया। (History of Diego Garcia)
स्थानीय लोग और उनकी संस्कृति
Chagossians की अपनी एक अलग संस्कृति थी। उनकी भाषा, संगीत, नृत्य और खानपान अफ्रीकी, फ्रांसीसी और द्वीपीय परंपराओं का मिश्रण थे। सामूहिक उत्सव, लोकगीत और समुद्र से जुड़ा जीवन उनकी पहचान था। वे न तो किसी देश के लिए खतरा थे और न ही किसी राजनीति का हिस्सा, लेकिन फिर भी वे इतिहास की सबसे बेरहम चाल के शिकार बने (History of Diego Garcia)।
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जबरन कराया गया विस्थापन
1960 के दशक के अंत में अमेरिका ने हिंद महासागर में एक बड़ा सैन्य अड्डा बनाने का फैसला किया। यह फैसला निक्सन प्रशासन के दौरान लिया गया। ब्रिटेन ने अमेरिका को Diego Garcia देने के बदले एक ही शर्त रखी – द्वीप खाली होना चाहिए।
इसके बाद जो हुआ, वह आज भी मानवाधिकार इतिहास का एक काला अध्याय है। हजारों Chagossians को धीरे-धीरे द्वीप से बाहर निकाल दिया गया। उन्हें इलाज, नौकरी या छुट्टी के बहाने बाहर भेजा गया और वापस लौटने नहीं दिया गया। कई लोगों को मॉरिशस और सेशेल्स में गरीबी, बेरोजगारी और पहचान के संकट में छोड़ दिया गया (History of Diego Garcia)।
भारत, 1971 का युद्ध और Diego Garcia
भारत के लिए Diego Garcia सिर्फ एक द्वीप नहीं, बल्कि ऐतिहासिक स्मृति (History of Diego Garcia) भी है। 1971 के बांग्लादेश मुक्ति युद्ध के दौरान अमेरिका ने भारत पर दबाव बनाने के लिए USS Enterprise को बंगाल की खाड़ी की ओर भेजा था। हालांकि भारत ने दबाव में आए बिना युद्ध जीत लिया, लेकिन अमेरिका को यह एहसास हुआ कि उसे हिंद महासागर में एक स्थायी सैन्य ठिकाने की जरूरत है। इसके बाद Diego Garcia को तेजी से विकसित किया गया।
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यही वजह है कि भारत लंबे समय से हिंद महासागर के सैन्यीकरण को लेकर सतर्क रहा है।
ब्रिटेन-मॉरिशस समझौता और भारत की भूमिका
दशकों की कानूनी लड़ाई और अंतरराष्ट्रीय दबाव के बाद, मई 2025 में ब्रिटेन और मॉरिशस के बीच एक ऐतिहासिक समझौता हुआ। इसमें Chagos Archipelago की संप्रभुता मॉरिशस को लौटाने पर सहमति बनी। हालांकि Diego Garcia पर अमेरिकी सैन्य अड्डा 99 साल की लीज पर बना रहेगा।
भारत ने इस समझौते का खुलकर समर्थन किया। भारत न सिर्फ मॉरिशस को आर्थिक मदद दे रहा है, बल्कि वहां Chagos Marine Protected Area, सैटेलाइट स्टेशन और समुद्री सर्वे जैसे प्रोजेक्ट्स में भी सहयोग कर रहा है। भारत के लिए यह सिर्फ कूटनीति नहीं, बल्कि औपनिवेशिक अन्याय को ठीक करने की कोशिश भी है।
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