
90वें जन्मदिन से पहले, तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा (Dalai Lama) ने वह बात कह दी जिसकी पूरी दुनिया लंबे समय से प्रतीक्षा कर रही थी – क्या उनकी संस्था आगे भी जारी रहेगी और उनके उत्तराधिकारी का चयन कैसे होगा?
इस सप्ताह मैकलॉडगंज में आयोजित 15वें तिब्बती धार्मिक सम्मेलन के पहले दिन उन्होंने वीडियो संदेश के जरिए स्पष्ट कर दिया कि दलाई लामा (Dalai Lama) की संस्था जारी रहेगी, और उनके उत्तराधिकारी की पहचान करने का अधिकार केवल Gaden Phodrang Trust को होगा।
यह ट्रस्ट उन्होंने स्वयं 2015 में स्थापित किया था, और अब यही संस्था उनके पुनर्जन्म की तलाश और मान्यता की प्रक्रिया को आगे बढ़ाएगी। उन्होंने यह भी कहा कि इस प्रक्रिया में तिब्बती बौद्ध परंपराओं के प्रमुखों और धर्म-संरक्षक शक्तियों की सलाह ली जाएगी, जो दलाई लामा की वंश परंपरा से गहराई से जुड़ी हैं।
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चीन को संदेश – हस्तक्षेप नहीं चलेगा
चीन पिछले कई वर्षों से यह दावा करता रहा है कि वह गोल्डन अर्न (Golden Urn) प्रक्रिया के तहत अगले दलाई लामा की पहचान करेगा। लेकिन दलाई लामा का साफ कहना है कि इस विषय में किसी अन्य संस्था या सरकार को हस्तक्षेप का कोई अधिकार नहीं है।
बीजिंग की ओर से चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग ने दलाई लामा (Dalai Lama) की इस योजना को खारिज करते हुए दोहराया कि भविष्य के उत्तराधिकारी को चीन की परंपराओं और कानूनों के तहत मान्यता मिलनी चाहिए।
पुनर्जन्म तिब्बत में ही होगा, यह जरूरी नहीं
Gaden Phodrang Trust के सदस्य सामधोंग रिनपोछे ने कहा कि दलाई लामा (Dalai Lama) का पुनर्जन्म किसी भी उम्र, लिंग और देश में हो सकता है। यह जरूरी नहीं कि अगला दलाई लामा तिब्बत में ही जन्म लें।
उन्होंने कहा – पुनर्जन्म की प्रक्रिया भौगोलिक सीमाओं से बंधी नहीं होती। अतीत में भी कुछ दलाई लामा अलग-अलग क्षेत्रों में जन्म ले चुके हैं।
इस बयान के बाद यह संभावना बल पकड़ रही है कि अगला दलाई लामा भारत के तवांग में जन्म ले सकते हैं, ठीक वहीं जहां छठवें दलाई लामा का जन्म हुआ था। लेकिन इससे भारत और चीन के बीच एक नया कूटनीतिक संघर्ष भी खड़ा हो सकता है। चीन भी अपना दलाई लामा चुन सकता है और तब दो दलाई लामा होंगे।
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यह पहला अवसर नहीं है जब दलाई लामा (Dalai Lama) ने भविष्य की योजना को लेकर संकेत दिए हों। वे पहले ही कह चुके हैं कि उत्तराधिकारी की पहचान पुनर्जन्म के पारंपरिक मॉडल से इतर ‘उत्सर्जन’ (emanation) के माध्यम से भी हो सकती है। यानी वे अपने जीवनकाल में ही उत्तराधिकारी को पहचान सकते हैं। इससे चीन की रणनीति पर गहरा प्रभाव पड़ सकता है।
अमेरिका का समर्थन और भारत की अहम भूमिका
इस पूरे घटनाक्रम में अमेरिका भी सक्रिय खिलाड़ी बन चुका है। हाल ही में अमेरिकी कांग्रेस में एक प्रस्ताव पेश किया गया, जिसमें कहा गया कि दलाई लामा (Dalai Lama) का उत्तराधिकारी केवल वह स्वयं या तिब्बती परंपराओं के अनुरूप तय किया जा सकता है और इसमें बीजिंग का कोई अधिकार नहीं है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में भारत और अमेरिका आपसी तालमेल के साथ इस प्रक्रिया को आगे बढ़ा सकते हैं, जिससे चीन की रणनीतिक पकड़ कमजोर पड़ सकती है।
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तिब्बत पर फिर से निगाह
2027 में होने वाले चीनी कम्युनिस्ट पार्टी कांग्रेस में राष्ट्रपति शी जिनपिंग अपना कार्यकाल और बढ़ाना चाहते हैं। ऐसे में तिब्बत और दलाई लामा (Dalai Lama) से जुड़ा यह विवाद उन्हें एक मजबूत राष्ट्रीयतावादी मंच दे सकता है।
चीन के लिए तिब्बत हमेशा एक रणनीतिक क्षेत्र रहा है। दलाई लामा (Dalai Lama) की अगली पीढ़ी को लेकर दुनिया भर में जो नैतिक समर्थन और वैधता है, वह चीन के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है। और यही वजह है कि बीजिंग किसी भी कीमत पर Gaden Phodrang द्वारा चुने गए उत्तराधिकारी को मान्यता नहीं देगा।
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