
Why governments giving money to increase population : एक समय था जब दुनिया के कई देश बढ़ती आबादी से परेशान थे। सरकारें लोगों से कम बच्चे पैदा करने की अपील करती थीं। भारत में भी ‘हम दो, हमारे दो’ जैसे अभियान चलाए गए। लेकिन अब तस्वीर तेजी से बदल रही है। दुनिया के कई देश घटती जन्मदर और बूढ़ी होती आबादी से चिंतित हैं। भारत के कुछ राज्य भी अब इसी समस्या का सामना करने लगे हैं।
इसी चिंता के बीच आंध्र प्रदेश के सीएम चंद्रबाबू नायडू ने में तीसरे और चौथे बच्चे के जन्म पर आर्थिक प्रोत्साहन देने का ऐलान किया है। सरकार तीसरे बच्चे पर 30 हजार रुपये और चौथे बच्चे पर 40 हजार रुपये देने की तैयारी कर रही है। यह फैसला सिर्फ सामाजिक नहीं, बल्कि आर्थिक और राजनीतिक कारणों से भी जुड़ा हुआ माना जा रहा है (Why governments giving money to increase population)।
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आखिर क्यों घट रही है जन्मदर?
किसी देश में एक महिला औसतन कितने बच्चों को जन्म देती है, इसे Total Fertility Rate यानी TFR कहा जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार आबादी को स्थिर बनाए रखने के लिए TFR लगभग 2.1 होना चाहिए।
लेकिन भारत में यह दर अब करीब 1.9 तक पहुंच चुकी है। दक्षिण भारत के कई राज्यों में तो यह और भी नीचे, लगभग 1.5 से 1.6 तक है। इसका मतलब है कि आने वाले वर्षों में वहां युवाओं की संख्या कम और बुजुर्गों की संख्या ज्यादा हो सकती है (Why governments giving money to increase population)।
अनुमान है कि 2050 तक भारत की लगभग 20% आबादी बुजुर्ग श्रेणी में होगी। आंध्र प्रदेश में यह आंकड़ा 23% तक पहुंच सकता है।
कम जन्मदर से इकॉनमी पर क्या असर पड़ता है?
जब बच्चे कम पैदा होते हैं तो कुछ दशकों बाद काम करने वाली युवा आबादी घटने लगती है। इससे फैक्ट्रियों, कंपनियों और बाजारों को पर्याप्त कार्यबल नहीं मिलता। दूसरी तरफ बुजुर्ग आबादी बढ़ने से सरकार पर पेंशन, स्वास्थ्य सेवाओं और सामाजिक सुरक्षा का खर्च बढ़ जाता है।
यानी टैक्स देने वाले लोग कम और सरकारी सहायता लेने वाले लोग ज्यादा हो जाते हैं। यही वजह है कि कई देश अब घटती आबादी को आर्थिक खतरे के रूप में देखने लगे हैं (Why governments giving money to increase population)।
दक्षिण भारत के राज्यों को यह डर भी है कि भविष्य में परिसीमन (Delimitation) के दौरान उनकी लोकसभा सीटें कम हो सकती हैं। क्योंकि सीटों का निर्धारण आबादी के आधार पर होता है और उत्तर भारत की तुलना में दक्षिणी राज्यों की जनसंख्या वृद्धि कम रही है।
इसी वजह से चंद्रबाबू नायडू पहले भी ज्यादा बच्चे पैदा करने के लिए आर्थिक प्रोत्साहन (Why governments giving money to increase population) की बात उठा चुके हैं।
सिक्किम का हाल चीन से भी खराब
सिक्किम इस समय भारत का सबसे कम जन्मदर वाला राज्य बन चुका है। यहां TFR करीब 1.1 तक पहुंच गया है। यानी औसतन एक महिला सिर्फ एक बच्चे को जन्म दे रही है।
स्थिति सुधारने के लिए सिक्किम सरकार ने IVF इलाज के लिए लाखों रुपये की सहायता दी। सरकारी कर्मचारियों को दूसरे और तीसरे बच्चे पर अतिरिक्त वेतन वृद्धि दी गई। महिलाओं को लंबी मैटरनिटी लीव और पुरुषों को पैटरनिटी लीव भी दी गई (Why governments giving money to increase population)। इसके बावजूद जन्मदर में बड़ा सुधार नहीं हो पाया।
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दुनिया के कई देश इसी संकट से जूझ रहे
दक्षिण कोरिया, जापान, सिंगापुर और कई यूरोपीय देश आज घटती आबादी की समस्या से परेशान हैं। दक्षिण कोरिया का TFR दुनिया में सबसे कम, लगभग 0.7 तक पहुंच चुका है। सरकार वहां बच्चों के लिए नकद सहायता (Why governments giving money to increase population), टैक्स छूट और लंबी पेरेंटल लीव जैसी योजनाओं पर भारी पैसा खर्च कर रही है, लेकिन लोग कम बच्चे पैदा कर रहे हैं।
जापान में भी हालात चिंताजनक हैं। वहां बुजुर्ग आबादी तेजी से बढ़ रही है और युवाओं की संख्या लगातार घट रही है।
चीन को वन चाइल्ड पॉलिसी से क्या नुकसान हुआ?
चीन इसका सबसे बड़ा उदाहरण माना जाता है। चीन ने 1979 में वन चाइल्ड पॉलिसी लागू की थी। सरकार चाहती थी कि आबादी नियंत्रित रहे, इसलिए दूसरे बच्चे पर सख्त प्रतिबंध लगाए गए।
शुरुआत में इस नीति से आबादी नियंत्रण में मदद मिली, लेकिन बाद में इसका बड़ा नुकसान सामने आया। जन्मदर तेजी से गिर गई और अब चीन बूढ़ी होती आबादी की समस्या से जूझ रहा है (Why governments giving money to increase population)।
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स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि चीन को पहले दो बच्चों और फिर तीन बच्चों की अनुमति देनी पड़ी। बाद में सारी सीमाएं हटा दी गईं। यहां तक कि सरकार ने कॉन्डम और गर्भनिरोधक उत्पादों पर टैक्स बढ़ाने जैसे कदम भी उठाए ताकि लोग ज्यादा बच्चे पैदा करें।
लेकिन अब समस्या यह है कि चीन के लोग ज्यादा बच्चे पैदा करना ही नहीं चाहते। विशेषज्ञों के अनुसार आज बच्चों की परवरिश बेहद महंगी हो चुकी है। शिक्षा, स्वास्थ्य, घर और जीवनशैली का खर्च इतना बढ़ गया है कि युवा दंपति कम बच्चे पैदा करना पसंद कर रहे हैं।
शहरी जीवन, करियर का दबाव और महिलाओं की बढ़ती कार्यभागीदारी भी जन्मदर घटने की बड़ी वजह मानी जा रही है।
दुनिया के अनुभव बताते हैं कि सिर्फ आर्थिक प्रोत्साहन(Why governments giving money to increase population) देकर जन्मदर में बड़ा बदलाव लाना आसान नहीं है। हंगरी को कुछ हद तक सफलता जरूर मिली, लेकिन ज्यादातर देशों में योजनाओं का असर सीमित रहा।
दुनिया अब उस दौर में पहुंच रही है जहां कई देशों के सामने सवाल यह नहीं रह गया कि आबादी कैसे रोकी जाए, बल्कि यह बन गया है कि भविष्य में काम करने वाले लोग कहां से आएंगे।
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