ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मनाई जाने वाली एकदंत संकष्टी चतुर्थी (Dharm Sankashti Chaturthi) इस साल 5 मई 2026 को पड़ रही है। मान्यता है कि इस दिन सच्चे मन से पूजा करने से जीवन के सभी विघ्न-बाधाएं दूर होती हैं और सुख-समृद्धि का मार्ग खुलता है।
यह व्रत खास तौर पर उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है, जो अपने जीवन में आ रही रुकावटों, मानसिक तनाव या पारिवारिक समस्याओं से मुक्ति चाहते हैं।
इस साल चतुर्थी तिथि (Dharm Sankashti Chaturthi) 5 मई 2026 को सुबह 05:24 बजे से शुरू होकर 6 मई 2026 को सुबह 07:51 बजे तक रहेगी। पूजा के लिए सबसे शुभ समय सुबह 08:58 बजे से दोपहर 01:58 बजे तक का है, जिसे लाभ और अमृत चौघड़िया माना गया है।
वहीं अभिजीत मुहूर्त दोपहर 11:51 बजे से 12:45 बजे तक रहेगा। इस व्रत का सबसे अहम हिस्सा चंद्र दर्शन होता है, और 5 मई को चंद्रोदय रात 10:35 बजे के आसपास होगा, जिसके बाद ही व्रत का पारण किया जाता है।
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संकष्टी चतुर्थी (Dharm Sankashti Chaturthi) व्रत विधि
पूजा विधि की बात करें तो व्रती को सुबह जल्दी उठकर स्नान करना चाहिए और व्रत का संकल्प लेना चाहिए। इसके बाद लाल या पीले कपड़े से सजी चौकी पर गणेश जी की प्रतिमा स्थापित कर उन्हें सिंदूर, अक्षत और दूर्वा अर्पित करें।
‘ॐ गं गणपतये नमः’ मंत्र का जाप करें और गणेश जी की कथा सुनें या पढ़ें। चंद्रमा निकलने के बाद जल, दूध और अक्षत मिलाकर अर्घ्य दें और आरती के साथ व्रत पूरा करें। भोग में मोदक, लड्डू, फल और गुड़ अर्पित करना शुभ माना जाता है।
हालांकि इस दिन (Dharm Sankashti Chaturthi) कुछ विशेष बातों का ध्यान रखना बेहद जरूरी है। चंद्र दर्शन से पहले भोजन करना वर्जित माना गया है, इसलिए अर्घ्य देने से पहले अन्न ग्रहण नहीं करना चाहिए। गणेश जी की पीठ के दर्शन नहीं करने चाहिए, क्योंकि मान्यता है कि वहां दरिद्रता का वास होता है।
पूजा में तुलसी दल का उपयोग नहीं किया जाता, बल्कि केवल दूर्वा अर्पित की जाती है। इस दिन तामसिक भोजन जैसे प्याज, लहसुन और मांसाहार से दूर रहना चाहिए और मन में क्रोध या नकारात्मक विचार नहीं लाने चाहिए। चंद्रमा को अर्घ्य देते समय इस बात का ध्यान रखें कि जल पैरों पर न गिरे।
इस व्रत (Dharm Sankashti Chaturthi) का धार्मिक महत्व भी बेहद खास है। माना जाता है कि इस दिन दान करने से विशेष पुण्य मिलता है। जरूरतमंदों या ब्राह्मणों को तिल और लड्डू दान करने से अटके हुए कार्य पूरे होते हैं। यह व्रत मानसिक शांति, सुख-समृद्धि और संतान की रक्षा के लिए विशेष रूप से किया जाता है।



