

हरतालिका तीज 2025 (Hartalika Teej 2025) का व्रत पति-पत्नी के रिश्ते में प्रेम, स्थिरता और विश्वास को मजबूत करता है। यह दिन केवल पूजा-पाठ का नहीं, बल्कि आस्था, समर्पण और दांपत्य जीवन की मिठास का प्रतीक है। इस दिन किए गए व्रत और पूजा से भगवान शिव और माता पार्वती की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
पंचांग के अनुसार भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि 25 अगस्त को दोपहर 12:35 से शुरू होकर 26 अगस्त को दोपहर 1:55 बजे समाप्त होगी। उदया तिथि के आधार पर हरतालिका तीज 2025 का व्रत 26 अगस्त, मंगलवार को रखा जाएगा। इस बार महालक्ष्मी राजयोग बन रहा है। हस्त नक्षत्र में विधि विधान से पूजा करने से मनोकामना पूर्ण होगी।
व्रत के पूर्ण फल के लिए इसकी कथा (Hartalika Teej Vrat Katha) का पाठ करना भी जरूरी है।
यह भी पढ़ें : Hartalika Teej : इस बार हरतालिका तीज पर बन रहा खास संयोग, जानें मुहूर्त और तारीख
ऐसे शुरू होती है व्रत कथा (Hartalika Teej Vrat Katha)
जिनके केशों पर मंदार (आक) के पुष्पों की माला शोभा देती है और जिन भगवान शंकर के मस्तक पर चंद्र और गले में मुण्डों की माला पड़ी हुई है, जो माता पार्वती दिव्य वस्त्रों से तथा भगवान शंकर दिगंबर वेष धारण किए हैं, उन दोनों भवानी-शंकर को नमस्कार करता हूं।
एक बार कैलाश पर्वत के शिखर पर माता पार्वती ने महादेव जी से कहा – हे प्रभु! मुझ से आप वह गुप्त से गुप्त वार्ता कहिए जो सबके लिए सब धर्मों से भी सरल तथा महान फल देने वाली हो। हे नाथ! यदि आप प्रसन्न हैं तो आप उसे मेरे सम्मुख प्रकट कीजिये। हे जगत नाथ! आप आदि, मध्य और अंत रहित हैं, आपकी माया का कोई पार नहीं है। आपको मैंने किस भांति प्राप्त किया है? कौन से व्रत, तप या दान के पुण्य फल से आप मुझको वर रूप में मिले? कृपया करके बताएं।
इस पर महादेव बोले – हे देवी ! सुनिए, मैं आपके सम्मुख उस व्रत (Hartalika Teej Vrat Katha) को कहता हूं, जो परम गुप्त है, जैसे तारागणों में चंद्रमा और ग्रहों से सूर्य, वर्णों में ब्राह्मण, देवताओं में गंगा, पुराणों में महाभारत, वेदों में साम और इन्द्रियों में मन श्रेष्ठ है। वैसे ही पुराण और वेद सबमें इसका वर्णन किया गया है। जिसके प्रभाव से तुमको मेरा आधा आसन प्राप्त हुआ है।
यह भी पढ़ें : Machail Mata : कौन हैं मचैल माता, जो जम्मू-कश्मीर के पहाड़ों में बस गईं
हे प्रिये ! उसी का मैं तुमसे वर्णन करता हूं, सुनो-भाद्रपद (भादों) मास के शुक्ल पक्ष की हस्त नक्षत्र संयुक्त तृतीया (तीज) के दिन इस व्रत का अनुष्ठान मात्र करने से सब पापों का नाश हो जाता है। तुमने पहले हिमालय पर्वत पर इस महान व्रत को किया था, जो मैं तुम्हें सुनाता दूं।
पार्वती जी बोलीं – हे प्रभु इस व्रत को मैंने किसलिए किया था, यह मुझे सुनने की इच्छा हो रही है। तो कृपा करके मुझसे कहिए।
महादेव ने आगे कहा (Hartalika Teej Vrat Katha)- आर्यावर्त में हिमालय नामक एक महान पर्वत है, जहां अनेक प्रकार की भूमि अनेक प्रकार के वृक्षों से सुशोभित है, जो सदैव बर्फ से ढके हुए तथा गंगा की कल-कल ध्वनि से शब्दायमान ओम रहता है। हे पार्वती जी! तुमने बाल्यकाल में उसी स्थान 12 वर्ष तक अधोमुखी होकर तप किया था। इस अवधि में तुमने अन्न न खाकर पेड़ों के सूखे पत्ते चबाए, माघ की विकराल शीतलता में तुमने निरंतर जल में रहकर तप किया। वैशाख की जला देने वाली गर्मी में तुमने शरीर को पंचाग्नि में तपाया। श्रावण की मूसलाधार वर्षा में तुम खुले में तप करती रही।
यह भी पढ़ें : श्रीराम के जन्म पर क्या कहता है इतिहास?
तुम्हारे पिता तुम्हारी कष्ट साध्य तपस्या को देखकर बड़े दुखी होते थे। तब एक दिन तुम्हारी तपस्या को देखकर नारदजी तुम्हारे घर पधारे। तुम्हारे पिता ने हृदय से अतिथि सत्कार करके उनके आने का कारण पूछा। नारदजी ने कहा- गिरिराज! मैं भगवान विष्णु के भेजने पर यहां उपस्थित हुआ हूं। आपकी कन्या ने बड़ा कठोर तप किया है। इससे प्रसन्न होकर वह आपकी सुपुत्री से विवाह करना चाहते हैं। इस संदर्भ में आपकी राय जानना चाहता हूं।
नारदजी की बात सुनकर गिरिराज गदगद हो उठे। उनके तो जैसे सारे क्लेश ही दूर हो गए। प्रसन्न होकर वे बोले- श्रीमान्! यदि स्वयं विष्णु मेरी कन्या का वरण करना चाहते हैं तो भला मुझे क्या आपत्ति हो सकती है। वह तो साक्षात ब्रह्म हैं। हे महर्षि! यह तो हर पिता की इच्छा होती है कि उसकी पुत्री सुख-सम्पदा से युक्त पति के घर की लक्ष्मी बने। पिता की सार्थकता इसी में है कि पति के घर जाकर उसकी पुत्री पिता के घर से अधिक सुखी रहे।
तुम्हारे पिता की स्वीकृति पाकर नारदजी विष्णु के पास गए और उनसे तुम्हारे ब्याह के निश्चित होने का समाचार सुनाया। मगर इस विवाह संबंध की बात जब तुम्हारे कान में पड़ी तो तुम्हारे दुख का ठिकाना न रहा। तुम्हारी एक सखी ने तुम्हारी इस मानसिक दशा को समझ लिया और उसने तुमसे उस विक्षिप्तता का कारण जानना चाहा। तब तुमने बताया – मैंने सच्चे हृदय से भगवान शिव शंकर का वरण किया है, किंतु मेरे पिता ने मेरा विवाह विष्णु जी से निश्चित कर दिया। मैं विचित्र धर्म-संकट में हूं। अब क्या करूं? प्राण छोड़ देने के अतिरिक्त अब कोई भी उपाय शेष नहीं बचा है।
यह भी पढ़ें : यहां देवताओं को सजा दी जाती है
तुम्हारी सखी बड़ी ही समझदार और सूझबूझ वाली थी। उसने कहा- सखी! प्राण त्यागने का इसमें कारण ही क्या है? संकट के मौके पर धैर्य से काम लेना चाहिए। नारी के जीवन की सार्थकता इसी में है कि पति-रूप में हृदय से जिसे एक बार स्वीकार कर लिया, जीवनपर्यंत उसी से निर्वाह करें। सच्ची आस्था और एकनिष्ठा के समक्ष तो ईश्वर को भी समर्पण करना पड़ता है। मैं तुम्हें घनघोर जंगल में ले चलती हूं, जो साधना स्थली भी हो और जहां तुम्हारे पिता तुम्हें खोज भी न पाएं। वहां तुम साधना में लीन हो जाना। मुझे विश्वास है कि ईश्वर अवश्य ही तुम्हारी सहायता करेंगे।
तुमने ऐसा ही किया। तुम्हारे पिता तुम्हें घर पर न पाकर बड़े दुखी तथा चिंतित हुए। वह सोचने लगे कि तुम जाने कहां चली गई। मैं विष्णुजी से उसका विवाह करने का प्रण कर चुका हूं। यदि भगवान विष्णु बारात लेकर आ गए और कन्या घर पर न हुई तो बड़ा अपमान होगा। यही सब सोचकर गिरिराज ने जोर-शोर से तुम्हारी खोज शुरू करवा दी।
भगवान शिव कथा (Hartalika Teej Vrat Katha) आगे सुनाते हैं,
इधर तुम्हारी खोज होती रही और उधर तुम अपनी सखी के साथ नदी के तट पर एक गुफा में मेरी आराधना में लीन थीं। भाद्रपद शुक्ल तृतीया को हस्त नक्षत्र था। उस दिन तुमने रेत के शिवलिंग का निर्माण करके व्रत किया। रात भर मेरी स्तुति के गीत गाकर जागी। तुम्हारी इस कष्ट साध्य तपस्या के प्रभाव से मेरा आसन डोलने लगा। मेरी समाधि टूट गई।
मैं उसी स्थान पर आ पहुंचा जहां तुम और तुम्हारी सखी दोनों थीं। मैंने आकर तुमसे कहा – हे वरानने, मैं तुमसे प्रसन्न हूं, मागों तुम मुझसे वरदान में क्या मांगना चाहती हो। तब तुमने कहा कि हे देव, यदि आप मुझसे प्रसन्न हैं तो आप मेरे पति हों। मैं ‘तथास्तु’ ऐसा कहकर कैलाश पर्वत को चला गया और तुमने प्रभात होते ही मेरी उस बालू की प्रतिमा को नदी में विसर्जित कर दिया।
यह भी पढ़ें : 56 Bhog : भगवान को 56 भोग क्यों लगते हैं? जानिए इसकी पौराणिक कथा
भगवान शिव ने कथा (Hartalika Teej Vrat Katha) जारी रखते हुए कहा, ‘हे शुभे, तुमने वहां अपनी सखी सहित व्रत का पारायण किया। इतने में तुम्हारे पिता हिमवान भी तुम्हें ढूंढते-ढूंढते उसी घने वन में आ पहुंचे। उस समय उन्होंने नदी के तट पर दो कन्याओं को देखा तो वे तुम्हारे पास आ गये और तुम्हें हृदय से लगाकर रोने लगे। और बोले-बेटी तुम इस सिंह व्याघ्नदि युक्त घने जंगल में क्यों चली आई?
तब तुमने कहा हे पिता, मैंने पहले ही अपना शरीर शंकर जी को समर्पित कर दिया था, लेकिन, आपने इसके विपरीत कार्य किया। इसलिए मैं वन में चली आई। ऐसा सुनकर हिमवान ने तुमसे कहा कि मैं तुम्हारी इच्छा के विरुद्ध यह कार्य नहीं करूंगा। तब वे तुम्हें लेकर घर और वापस लौट आए और तुम्हारा विवाह मेरे साथ कर दिया। हे प्रिये, उसी व्रत के प्रभाव से तुमको मेरा अर्द्धासन प्राप्त हुआ है। इस व्रतराज को मैंने भी अभी तक किसी के सम्मुख वर्णन नहीं किया है।
इसलिए पड़ा हरतालिका नाम
भगवान शिव ने व्रत कथा (Hartalika Teej Vrat Katha) सुनाने के साथ यह भी बताया कि इसे हरतालिका तीज क्यों कहते हैं।
यह भी पढ़ें : काशी में भी गुरु गोरक्षनाथ का मंदिर, पर दर्शन आसान नहीं
कथा (Hartalika Teej Vrat Katha) यहां से जारी है…
महादेव बोले – हे देवी! अब मैं तुम्हें यह बताता हूं कि इस व्रत का यह नाम क्यों पड़ा? तुमको सखी हरण करके ले गई थी, इसलिए हरतालिका नाम पड़ा।
पार्वती जी बोलीं- हे स्वामी! आपने इस व्रतराज का नाम तो बता दिया लेकिन, मुझे इसकी विधि और फल भी बताइए कि इसके करने से किस फल की प्राप्ति होती है। तब भगवान शंकर जी बोले – इस स्त्री जाति के अत्युत्तम व्रत की विधि सुनिये। सौभाग्य की इच्छा रखने वाली स्त्रियां इस व्रत को विधि पूर्वक करें। केले के खम्भों से मण्डप बनाकर उसे वन्दनवारों से सुशोभित करें। उसमें विविध रंगों के उत्तम रेशमी वस्त्र की चांदनी ऊपर तान दें। चंदन आदि सुगन्धित द्रव्यों को लेपन करके स्त्रियां एकत्र हों। शंख, भेरी, मृदंग आदि बजायें। विधि पूर्वक मंगलाचार करके श्री गौरी शंकर की बालू निर्मित प्रतिमा स्थापित करें। फिर भगवान शिव पार्वती जी का गन्ध, धूप, पुष्प आदि से विधि पूर्वक पूजन करें।
अनेकों नैवेद्यों का भोग लगाएं और रात के समय जागरण करें। नारियल, सुपारी, जंवारी, नींबू, लौंग, अनार, नारंगी आदि ऋतु फलों तथा फूलों को एकत्रित करके धूप, दीप आदि से पूजन करके कहें-हे कल्याण स्वरूप शिव! हे मंगल रूप शिव ! हे मंगल रूप महेश्वरी! हे शिवे! सब कामनाओं को देने वाली देवी कल्याण रूप तुम्हें नमस्कार है। कल्याण स्वरुप माता पार्वती, हम तुम्हें नमस्कार करते हैं। भगवान शंकर जी को सदैव नमस्कार करते हैं।
हे ब्रह्म रुपिणी जगत का पालन करने वाली ‘मां’ आपको नमस्कार है। हे सिंहवाहिनी! मैं सांसारिक भय से व्याकुल हूं, तुम मेरी रक्षा करो। हे महेश्वरी ! मैंने इसी अभिलाषा से आपका पूजन किया है। हे पार्वती माता आप मेरे ऊपर प्रसन्न होकर मुझे सुख और सौभाग्य प्रदान कीजिए। इस प्रकार के शब्दों द्वारा उमा सहित शंकर जी का पूजन करें। विधिपूर्वक कथा सुनकर गौ, वस्त्र, आभूषण आदि ब्राह्मणों को दान करें। इस प्रकार से व्रत करने वाले के सब पाप नष्ट हो जाते हैं।
तीज बस हरितालिका नहीं…
बारिश में ठंडी हवा चलती है तो गांव, कस्बों में झूले झूलते दिखाई देते हैं, मेंहदी की खुशबू गलियों में घुल जाती है और चौखट पर गीत गूंजते हैं। यही तो है तीज (Teej Festival) का मौसम। लेकिन तीज बस हरतालिका (Hartalika Teej) नहीं होती। uplive24.com पर जानिए सभी तीज और उनके महत्व के बारे में।
यहां क्लिक करें : Teej : बस हरियाली ही नहीं, जानिए कितनी तरह की होती है तीज
https://uplive24news.blogspot.com/2025/05/Uttrakhand%20Badrinath%20Temple%20opening%20ceremony.html



