
सोचना आसान है कि नींद (Sleep) सिर्फ दिमाग की देन है – थका हुआ दिमाग आराम चाहता है, इसलिए हम सोते हैं। पर नई रिसर्च इस धारणा को पलटकर कहती है कि नींद केवल दिमाग का खेल नहीं है। हमारी आंतों में रहने वाले छोटे-छोटे जीव यानी माइक्रोब्स भी इस खेल के बड़े खिलाड़ी हैं (How Gut bacteria affect sleep)।
वॉशिंगटन स्टेट यूनिवर्सिटी के शोध ने दिखाया है कि बैक्टीरिया की दीवार में मौजूद एक पदार्थ पेप्टिडोग्लाइकन (Peptidoglycan/PG) हमारे मस्तिष्क में मिलता है और इसकी मात्रा दिन के समय और नींद की हालत पर बदलती रहती है। यह खोज बताती है कि आंत और दिमाग के बीच लगातार बातचीत चल रही है, और उसी बातचीत से नींद जन्म ले सकती है।
खोज का सरल मतलब
WSU की शोधकर्ता एरिका इंग्लिश (Erika English) और प्रो. जेम्स क्रूगर (James Krueger) ने पाया कि बैक्टीरिया के सेल-वॉल का हिस्सा पेप्टिडोग्लाइकन मस्तिष्क में मौजूद है (How Gut bacteria affect sleep)।
इसके रिसेप्टर भी दिमाग में पाए गए जो दिन-रात और नींद की कमी के अनुसार बदलते हैं।
पहले माना जाता था कि यह पदार्थ दिमाग तक स्वाभाविक रूप से नहीं पहुंचता, पर अब दिखा कि यह वहां है और नींद के चक्र के साथ जुड़ा हुआ है (How Gut bacteria affect sleep)।
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नींद पर दो तरह की सोच रही है – एक कहती है कि नींद दिमाग और नर्वस सिस्टम द्वारा नियंत्रित होती है यानी ऊपर से नीचे की प्रक्रिया।
दूसरी कहती है कि छोटे-छोटे सेल समूह भी नींद जैसी स्थिति में चले जाते हैं – जैसे अनेक छोटे-छोटे बल्ब धीरे-धीरे बंद होते हैं और अंत में पूरा घर अंधा हो जाता है।
WSU की नई परिकल्पना, जिसे वे होलोबायोन्ट कंडीशन (Holobiont Condition) कहते हैं। रिसर्च बताती है कि नींद एक समन्वित प्रक्रिया है – दिमाग की प्रणाली, शरीर के स्थानीय सेल नेटवर्क और आंतों के माइक्रोब्स तीनों मिलकर नींद बनाते हैं। सरल भाषा में यह ‘ऊपर से’ और ‘नीचे से’ दोनों तरह से बनती है।
नई रिसर्च के मायने (How Gut bacteria affect sleep)
हमारे अंदर रहने वाले माइक्रोब्स सिर्फ पाचन या बीमारी के लिए जिम्मेदार नहीं हैं। वे हमारी सोच (Cognition), भूख, चाहत और अब तक की समझ से बहुत गहरा रिश्ता रखते हैं।
बैक्टीरियल संक्रमण (Bacterial Infection) में लोग ज्यादा सोते हैं (How Gut bacteria affect sleep)।
अगर माइक्रोब्स नींद को प्रभावित करते हैं तो नींद संबंधी समस्याओं (Sleep Disorders) के नए इलाज, दवा और जीवनशैली (lifestyle) नुस्खे भी बदल सकते हैं।
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घर के उदाहरण से समझिए बैक्टीरिया का रोल (How Gut bacteria affect sleep)
कल्पना कीजिए कि एक बड़ा मकान है, जिसमें अलग-अलग कमरे हैं। कुछ कमरों की बत्तियां अपनी मर्जी से बुझती-जलती रहती हैं। अगर कई कमरों की बत्तियां धीरे-धीरे बंद हो जाएं, तो पूरा घर सोने जैसा दिखाई देगा।
अब सोचिए कि हर कमरे में एक छोटा अतिथि (माइक्रोब) रहता है, जो उस कमरे का काम देखता और प्रभावित करता है – अतिथि की चाल-ढाल से बत्तियों के बुझने-जगने का पैटर्न बदलता है। इस ढांचे में दिमाग, शरीर और माइक्रोब्स सब मिलकर यह तय करते हैं कि कब सोना है (How Gut bacteria affect sleep)।
यह रिसर्च नए तरह के सवाल उठाती है कि पेप्टिडोग्लाइकन (Peptidoglycan) दिमाग में कैसे पहुंचता है – खून के रास्ते से या किसी और माध्यम से?
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माइक्रोब्स के कौन से प्रकार नींद पर ज्यादा असर करते हैं?
क्या खान-पान, प्रीबायोटिक्स/प्रोबायोटिक्स से नींद में सुधार संभव होगा? यह संभावना है, पर अभी सीधे इलाज बताना जल्दबाजी होगी।
यह समझ विकास (Evolution) के दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है यानी नींद की जड़ें शायद बहुत प्राचीन जैविक लय में हैं, जो बैक्टीरिया के समय से जुड़ी हैं।
कुल मिलाकर नींद अब केवल दिमाग की ही कहानी नहीं रह गई। यह हमारी पूरी होलोबायोन्ट (Holobiont) यानी शरीर और उसमें बसे सूक्ष्म जीवों की सहमति का परिणाम हो सकती है।
जब हम कहते हैं कि हम सो रहे हैं, तो शायद हमारे अंदर के लाखों-करोड़ों जीव भी उसी समय अपने काम के हिसाब से ‘आराम’ कर रहे होते हैं (How Gut bacteria affect sleep)। इस नए नजरिए से नींद की बीमारी, दवा और हमारी रोजमर्रा की आदतों को देखने का तरीका बदल सकता है।
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