
Jagannath Puri Temple mysteries : ओडिशा के पुरी में स्थित भगवान जगन्नाथ मंदिर हिंदू धर्म के चार प्रमुख धामों में से एक है। हर साल निकलने वाली जगन्नाथ रथयात्रा दुनिया भर के करोड़ों श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करती है। लेकिन यह मंदिर केवल रथयात्रा के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी अनोखी परंपराओं और रहस्यमयी मान्यताओं के कारण भी प्रसिद्ध है।
मूर्तियों के बदलने की परंपरा से लेकर रहस्यमयी ‘ब्रह्म पदार्थ’, समुद्र की आवाज और दुनिया की सबसे बड़ी मंदिर रसोइयों में से एक तक, जगन्नाथ मंदिर से जुड़ी कई ऐसी बातें हैं, जो लोगों को हैरान कर देती हैं (Jagannath Puri Temple mysteries)।
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रथयात्रा की शुरुआत कैसे हुई?
धार्मिक मान्यता के अनुसार, एक बार भगवान जगन्नाथ की बहन सुभद्रा ने नगर भ्रमण की इच्छा जताई। उनकी इच्छा पूरी करने के लिए भगवान जगन्नाथ और बड़े भाई बलभद्र उन्हें रथ पर बैठाकर नगर भ्रमण के लिए निकले। इस दौरान तीनों अपनी मौसी के घर गुंडिचा मंदिर भी पहुंचे।
इसी घटना की स्मृति में हर वर्ष भव्य जगन्नाथ रथयात्रा निकाली जाती है, जिसमें लाखों श्रद्धालु भगवान के रथ को खींचने का सौभाग्य प्राप्त करते हैं (Jagannath Puri Temple mysteries)।
हर 12 साल में क्यों बदली जाती हैं भगवान जगन्नाथ की मूर्तियां?
जगन्नाथ मंदिर में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियां पत्थर की नहीं, बल्कि विशेष प्रकार की नीम की लकड़ी से बनाई जाती हैं। एक निश्चित अवधि के बाद इन मूर्तियों को बदलने की परंपरा है, जिसे नवकलेवर (Nabakalebara) कहा जाता है। यह अनुष्ठान सामान्यतः लगभग 12 से 19 वर्ष के अंतराल पर तब होता है, जब हिंदू पंचांग में विशेष खगोलीय योग बनता है। इसलिए यह हर 12 वर्ष में निश्चित रूप से नहीं होता (Jagannath Puri Temple mysteries)।
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क्या है ‘ब्रह्म पदार्थ’ का रहस्य?
नवकलेवर के दौरान पुरानी मूर्तियों से एक अत्यंत पवित्र तत्व नई मूर्तियों में स्थापित किया जाता है। इसे ब्रह्म पदार्थ या ब्रह्म पदार्थ कहा जाता है।
इस प्रक्रिया को अत्यंत गोपनीय रखा जाता है। मंदिर परिसर में सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए जाते हैं। परंपरा के अनुसार, इस अनुष्ठान के समय सीमित सेवायत ही शामिल होते हैं और पूरी प्रक्रिया धार्मिक नियमों के अनुसार संपन्न होती है (Jagannath Puri Temple mysteries)।
लोक मान्यताओं के अनुसार, ब्रह्म पदार्थ का संबंध भगवान श्रीकृष्ण से माना जाता है। कुछ कथाओं में इसे श्रीकृष्ण के दिव्य हृदय से जोड़ा जाता है। वास्तव में ब्रह्म पदार्थ क्या है, यह आज भी मंदिर की सबसे बड़ी धार्मिक गोपनीयताओं में से एक माना जाता है (Jagannath Puri Temple mysteries)।
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कहते हैं कि जब भगवान श्रीकृष्ण ने देह त्यागी, तो उनका हृदय धड़कता रहा। मान्यता है कि यही ब्रह्म पदार्थ है। भगवान जगन्नाथ की पुरानी से नई मूर्ति में जिस ब्रह्म पदार्थ को ट्रांसफर किया जाता है, उसे लोग भगवान श्रीकृष्ण के हृदय से जोड़ते हैं।
मूर्ति बदलने के दौरान मंदिर सुरक्षा के कड़े पहरे में होता है। कोई आ-जा नहीं सकता। पूरे परिसर की लाइट काट दी जाती है। जो पुजारी ब्रह्म पदार्थ बदलते हैं, उनकी आंखों पर कपड़ा बांधा जाता है। किसी को भी इस ब्रह्म पदार्थ को देखने की अनुमति नहीं है। पुजारी केवल इसे महसूस करते हैं।
आज तक किसी ने भी ब्रह्म पदार्थ को नहीं देखा है। यह भगवान जगन्नाथ से जुड़ा ऐसा रहस्य है, जो सदियों से कायम है (Jagannath Puri Temple mysteries)। इसके अलावा भी मंदिर से जुड़ी कई मान्यताएं और रहस्य हैं।
लोक मान्यता है कि मंदिर के शिखर के ऊपर पक्षी उड़ते या बैठते नहीं दिखाई देते। कहा जाता है कि सिंहद्वार के बाहर समुद्र की लहरों की आवाज स्पष्ट सुनाई देती है, लेकिन जैसे ही श्रद्धालु मंदिर परिसर में प्रवेश करते हैं, यह आवाज बहुत कम महसूस होती है। कई लोग इसे मंदिर की अनूठी वास्तुकला से जोड़कर देखते हैं (Jagannath Puri Temple mysteries)।
मंदिर के पास स्थित श्मशान घाट को लेकर यह मान्यता प्रचलित है कि बाहर गंध महसूस होती है, लेकिन मंदिर में प्रवेश करने के बाद उसका प्रभाव कम हो जाता है। अक्सर यह भी कहा जाता है कि जगन्नाथ मंदिर की परछाई नहीं बनती।
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दुनिया की सबसे बड़ी मंदिर रसोइयों में से एक
जगन्नाथ मंदिर की रसोई दुनिया की सबसे बड़ी मंदिर रसोइयों में गिनी जाती है। यहां प्रतिदिन सैकड़ों रसोइये और उनके सहयोगी हजारों श्रद्धालुओं के लिए महाप्रसाद तैयार करते हैं। प्रसाद के बारे में प्रसिद्ध कहावत है, ‘जगन्नाथ का भात, जगत पसारे हाथ।’
श्रद्धालुओं का विश्वास है कि मंदिर में आने वाले भक्तों की संख्या चाहे जितनी हो, महाप्रसाद कभी कम नहीं पड़ता। वहीं मंदिर बंद होने के समय तक प्रसाद लगभग समाप्त हो जाता है। इसे भक्त भगवान की कृपा मानते हैं (Jagannath Puri Temple mysteries)।
मंदिर की रसोई में मिट्टी के सात बर्तनों को एक ही चूल्हे पर एक-दूसरे के ऊपर रखकर भोजन पकाया जाता है। परंपरा के अनुसार, सबसे ऊपर रखा बर्तन पहले पक जाता है और सबसे नीचे रखा बर्तन सबसे अंत में। यह प्रक्रिया आज भी लोगों के लिए आकर्षण का विषय बनी हुई है।



