
सिंधु जल समझौते (Indus Waters Treaty) का सच क्या है? यह सवाल बार-बार घूमकर आता रहता है। पहले भी आरोप लगे हैं कि देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इस समझौते को करने में पाकिस्तान के प्रति हद से ज्यादा नरमी दिखाई।
अब पीएम नरेंद्र मोदी ने सीधे तौर पर Indus Waters Treaty में भारत को कम पानी मिलने के लिए नेहरू को जिम्मेदारी ठहराया है। NDA की बैठक में उन्होंने कहा कि नेहरू ने भारत के हितों से समझौता किया। यह संधि किसान विरोधी है। इससे 80 फीसदी पानी पाकिस्तान के हिस्से में चला गया। मोदी ने यहां तक कहा कि नेहरू ने पहले देश का बंटवारा किया और फिर उसे एक बार और बांट दिया।
वर्ल्ड बैंक के नेतृत्व में 1951 से लेकर 1959 तक दोनों देशों के बीच चर्चाओं के दौर चले थे। अंत में 19 सितंबर 1960 को कराची में संधि (Indus Waters Treaty) हुई। भारत की तरफ से प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान की ओर से सैन्य शासक राष्ट्रपति अयूब खान ने हस्ताक्षर किए थे।
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समझौते (Indus Waters Treaty) के बाद हुई चर्चा
30 नवंबर, 1960 को लोकसभा में सिंधु जल संधि पर चर्चा शुरू हुई। इसके लिए 10 सदस्यों ने प्रस्ताव दिया था। चर्चा के दौरान ही सामने आ गया कि Indus Waters Treaty से कांग्रेस के ही कई नेता खुश नहीं थे।
संधि पर संसद या विपक्षी नेताओं को विश्वास में लिए बिना हस्ताक्षर किए गए थे। जब संसद ने इस पर चर्चा की, तब तक इसे अनुमोदित किया जा चुका था। संसद में लगभग हर वक्ता ने संधि की निंदा की और इसे अनुचित, एक धोखा, या यहां तक कि ‘दूसरा विभाजन’ कहा। बलरामपुर के सांसद अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा कि पाकिस्तान को खतरनाक रियायत दे दी गई है।
बहस की शुरुआत ढेनकनाल से ऑल इंडिया गणतंत्र परिषद के सांसद सुरेंद्र मोहंती ने की। उन्होंने कहा कि नेहरू को बताना चाहिए किन परिस्थितियों में यह समझौता (Indus Waters Treaty) किया गया। फिरोजाबाद के सांसद ब्रज राज सिंह ने कहा कि संधि ने देश में काफी चिंता पैदा कर दी है।
यहां तक कि कांग्रेस के सांसद हरीश चंद्र माथुर ने भी संधि की आलोचना करते हुए कहा था कि यह भारत के लिए नुकसानदेह है। उन्होंने कहा कि भारत बहुत अधिक दे रहा है। अपने ही लोगों की कीमत पर उदारता दिखाना राजनेता का काम नहीं है। उन्होंने चेतावनी दी कि उनके गृह राज्य राजस्थान को पांच मिलियन एकड़ फीट पानी के नुकसान के कारण प्रति वर्ष 70-80 करोड़ रुपये का स्थायी नुकसान होगा।
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कांग्रेस सांसद ने की कड़ी आलोचना
हरीश चंद्र माथुर ने यहां तक कहा कि पाकिस्तान अपनी मांगें बढ़ाता जा रहा है और भारत दबाव में झुकता जा रहा है। उनका कहना था कि अगर पाकिस्तान को पानी का आश्वासन दिया जाता है, तो फिर कश्मीर समस्या हल हो जानी चाहिए।
अटल बिहारी वाजपेयी ने सरकार पर तीखे हमले बोले। उन्होंने सवाल उठाया कि कैसे सरकार ने पहले 1962 तक पाकिस्तान को पानी रोकने की घोषणा की थी, फिर भी अब वह स्थायी अधिकार दे रही है। वाजपेयी ने कहा कि या तो वह घोषणा गलत थी, या यह संधि गलत है।
वाजपेयी ने पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान के उस दावे का हवाला दिया जिसमें उन्होंने कहा था कि भारत ने नदियों के संयुक्त नियंत्रण को स्वीकार कर लिया है। वाजपेयी ने चेतावनी दी कि संयुक्त नियंत्रण में संयुक्त कब्जा शामिल है। उन्होंने नेहरू के इरादों पर भी सवाल उठाते हुए कहा, ‘नेहरू इतनी दूर क्यों गए? सद्भाव बनाने का यह तरीका नहीं है। अच्छे संबंध केवल न्याय पर बनाए जा सकते हैं, न कि तुष्टीकरण पर। संधि (Indus Waters Treaty) भारत के हित में नहीं है और इससे स्थायी मित्रता नहीं होगी।’
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नेहरू बोले – हमने शांति खरीदी
आखिर में नेहरू बोलने के लिए उठे। उन्होंने आरोपों को खारिज करते हुए पूछा, ‘किसका विभाजन? एक बाल्टी भर पानी का?’ नेहरू ने तर्क दिया, ‘पहाड़ों जितने कागजात थे, एक दर्जन दृष्टिकोण थे, 10 साल का संघर्ष था। हमें एक फैसला लेना था। हमने एक समझौता खरीदा, हमने शांति खरीदी।’
नेहरू ने स्वीकार किया कि पाकिस्तान ने शुरू में 300 करोड़ रुपये मांगे थे, लेकिन भारत 83 करोड़ रुपये पर सहमत हो गया। उन्होंने कहा कि संधि (Indus Waters Treaty) को अस्वीकार करने से पश्चिमी पंजाब बंजर भूमि में बदल जाएगा, जिससे उपमहाद्वीप अस्थिर हो जाएगा।
नेहरू ने कहा कि जब हम राष्ट्रों के बीच संबंधों जैसी महान चीजों से निपटते हैं, तो हमें एक संकीर्ण दृष्टिकोण नहीं अपनाना चाहिए। हालांकि 65 साल बाद कह सकते हैं कि नेहरू ने जो सोचा था, वह नहीं हुआ। ‘बाल्टी भर पानी’ देकर भी वह शांति नहीं खरीद पाए।
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