
Pakistan debt crisis : गंभीर आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहे पाकिस्तान ने अमेरिका से 10 अरब डॉलर यानी लगभग 8.6 लाख करोड़ पाकिस्तानी रुपये की सहायता मांगी है। इसे एक्सचेंज स्टेबलाइजेशन फैसिलिटी कहा जा रहा है। यानी पाकिस्तान को अपने यहां के हालात को स्थिर बनाने के लिए आर्थिक मदद चाहिए।
पाकिस्तान ने यह प्रस्ताव अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट के सामने रखा है। यदि अमेरिका इस पर सहमत होता है, तो यह सुविधा पांच साल तक के लिए उपलब्ध कराई जा सकती है।
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क्या है Exchange Stabilisation Facility?
यह अमेरिका के Exchange Stabilization Fund (ESF) के तहत दी जाने वाली एक विशेष वित्तीय व्यवस्था होती है। इसका उद्देश्य किसी देश की मुद्रा पर दबाव बढ़ने की स्थिति में उसे डॉलर की अस्थायी सहायता उपलब्ध कराना होता है (Pakistan debt crisis)।
इस व्यवस्था के तहत अमेरिका संबंधित देश को डॉलर में अस्थायी वित्तीय सहायता, करेंसी स्वैप या सरकारी गारंटी जैसी सुविधाएं दे सकता है, जिससे उस देश की मुद्रा में स्थिरता बनी रहे और विदेशी मुद्रा संकट को नियंत्रित किया जा सके।
यह सुविधा अमेरिकी फेडरल रिजर्व की स्थायी डॉलर स्वैप लाइन से अलग होती है और बहुत कम देशों को ही मिलती है (Pakistan debt crisis)।
पाकिस्तान को इस मदद की जरूरत क्यों पड़ी?
पिछले कुछ वर्षों से पाकिस्तान लगातार आर्थिक संकट से जूझ रहा है। वर्ष 2023 में देश लगभग डिफॉल्ट की स्थिति में पहुंच गया था। उस समय IMF के 3 अरब डॉलर के स्टैंडबाय पैकेज ने उसे तत्काल राहत दी थी।
इसके बाद पाकिस्तान को 7 अरब डॉलर का Extended Fund Facility (EFF) मिला। 1.3 अरब डॉलर का क्लाइमेट रेजिलिएंस लोन भी स्वीकृत हुआ (Pakistan debt crisis)।
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इसके बावजूद पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था अब भी पूरी तरह स्थिर नहीं हो सकी है। विदेशी मुद्रा भंडार सीमित है और बाहरी कर्ज चुकाने का दबाव लगातार बना हुआ है।
विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति कई दशकों की कमजोर आर्थिक नीतियों का परिणाम है। उसका राजकोषीय घाटा लगातार बढ़ रहा है, कमाई कम है और खर्च ज्यादा, आबादी बेहिसाब बढ़ रही है, जबकि विकास पर पैसे नहीं लगाए जा रहे (Pakistan debt crisis)।
सरकारी आय का बड़ा हिस्सा केवल ब्याज भुगतान में खर्च हो जाता है। इसके कारण स्वास्थ्य, शिक्षा और बुनियादी ढांचे जैसे क्षेत्रों में पर्याप्त निवेश नहीं हो पाता।
अमेरिका से मदद की उम्मीद क्यों बढ़ी?
रिपोर्ट के मुताबिक हाल ही में अमेरिका और ईरान के बीच तनाव के दौरान पाकिस्तान ने बातचीत कराने में सहयोग किया था। इससे वॉशिंगटन के साथ इस्लामाबाद के रिश्तों में कुछ सकारात्मक माहौल बना है (Pakistan debt crisis)।
इसी कूटनीतिक पृष्ठभूमि में पाकिस्तान ने अमेरिका से आर्थिक सहयोग बढ़ाने की उम्मीद जताई है। अगर अमेरिकी मदद मिलती है, तो पाकिस्तान का विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ जाएगा और पाकिस्तानी रुपये पर दबाव कम होगा। इससे उसे दूसरों से कर्ज लेने की जरूरत नहीं पड़ेगी (Pakistan debt crisis)।



