
Shubhanshu Shukla
18 दिन की अद्भुत अंतरिक्ष यात्रा के बाद ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला (Shubhanshu Shukla) धरती पर लौट आए हैं। वह अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) पर जाने वाले पहले भारतीय अंतरिक्ष यात्री बन गए हैं। उनका अंतरिक्ष यान ‘ड्रैगन’ अमेरिका के कैलिफोर्निया तट के पास प्रशांत महासागर में सफलतापूर्वक उतरा।
इस गौरवपूर्ण क्षण पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया पर लिखा, ‘मैं पूरे देश के साथ ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला (Shubhanshu Shukla) का स्वागत करता हूं। उन्होंने अपने साहस और समर्पण से करोड़ों भारतीयों के सपनों को प्रेरणा दी है। यह भारत के मानव अंतरिक्ष मिशन की दिशा में एक और मील का पत्थर है।’
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भी बधाई देते हुए कहा, ‘यह हर भारतीय के लिए गर्व का क्षण है। शुभांशु ने सिर्फ अंतरिक्ष को नहीं छुआ, बल्कि भारत की उम्मीदों को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया है।’
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शुभांशु शुक्ला (Shubhanshu Shukla) की यह यात्रा सिर्फ एक मिशन नहीं थी, बल्कि भारत के अंतरिक्ष स्वप्न की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम थी। उनकी वापसी ने साबित किया कि अब भारत सिर्फ देखता नहीं, बल्कि अंतरिक्ष की दुनिया में चल भी रहा है।

उड़ान जितनी मुश्किल, आना उतना ही कठिन
जब कोई अंतरिक्ष यात्री International Space Station (ISS) की ओर उड़ान भरता है, तो पूरा देश गर्व से भर उठता है। लेकिन यह खुशी उस जोखिम की सच्चाई को नहीं मिटा सकती जो धरती पर वापसी के दौरान हर अंतरिक्ष यात्री को झेलनी पड़ती है। अंतरिक्ष में जाना जितना रोमांचक है, वापस लौटना उतना ही खतरनाक।
धरती की सतह पर लौटते समय, स्पेसक्राफ्ट को वायुमंडल में बेहद तेजी से घुसना होता है। इस दौरान अंतरिक्ष यान की बाहरी परत पर तापमान 1600°C से भी अधिक हो सकता है – इतना कि स्टील भी पिघल जाए। अगर किसी हिस्से की हीट शील्ड (heat shield) खराब हो जाए, या स्पेसक्राफ्ट का कोण थोड़ा भी गलत हो जाए, तो पूरा मिशन नष्ट हो सकता है।
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यही हुआ था कल्पना चावला (Kalpana Chawla) के साथ।
1 फरवरी, 2003 को जब कल्पना चावला और उनके छह साथी पृथ्वी पर लौट रहे थे, उनका अंतरिक्ष यान – Space Shuttle Columbia तेजी से वायुमंडल में प्रवेश कर रहा था। लेकिन किसी को पता नहीं था कि लॉन्च के समय ही यान के एक पंख में छोटी-सी दरार पड़ गई थी।
यह दरार हीट शील्ड में थी और वायुमंडल में लौटते समय वही दरार धीरे-धीरे बढ़ी। नतीजा, Columbia का ढांचा 60 किलोमीटर की ऊंचाई पर ही टूटने लगा और यान टुकड़ों में बंटकर जल गया।
कल्पना चावला, जिनके नाम पर लाखों बेटियों ने सपने गढ़े, धरती पर वापस लौट ही नहीं सकीं।
अंतरिक्ष से लौटते वक्त और क्या खतरे होते हैं?
हीट शील्ड फेलियर : जैसा कि कल्पना के साथ हुआ, अगर गर्मी को सहने वाली ढाल टूट जाए, तो यान जल सकता है।
Re-entry Angle Error : अगर वापसी का कोण ज्यादा तेज हुआ, तो यान जल सकता है; अगर बहुत सीधा हुआ, तो वापस वायुमंडल से उछल सकता है।
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गति की समस्या : 28,000 km/hr की रफ्तार से लौटते यान को कुछ ही मिनटों में धीमा करना होता है, गलती की गुंजाइश नहीं।
Communication Blackout : वायुमंडलीय घर्षण के कारण कुछ मिनटों तक ग्राउंड स्टेशन से संपर्क टूट जाता है। इसी समय दुर्घटना की संभावना सबसे ज्यादा होती है।
G-Force का असर : लौटते वक्त शरीर पर बहुत अधिक गुरुत्वाकर्षण बल पड़ता है, जिससे कई बार मानसिक और शारीरिक नियंत्रण कमजोर हो जाता है।
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