
गणेश पुराण (Ganesh Puran) को आधार माने तो गणेश के तीन अवतार हुए (Avatars of Lord Ganesha) – विनायक, गुणेश और गणेश। इनमें विनायक और गणेश की तो पूजा होती है, लेकिन विकास के क्रम में गुणेश की पूजा कहीं पीछे छूट गई। जबकि गणेश पुराण में शंकर और पार्वती के पुत्र का नाम गुणेश ही बताया गया है।
विनायक कौन थे? (Story of Vinayak)
अवतारों (Avatars of Lord Ganesha) की कथा शुरू होती है विनायक से।
पंडित दामोदर सातवलेकर ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘मंगलमूर्ति गणेश’ के प्रथम अध्याय महोत्कट में लिखा है, ‘अंग देश में महाविद्वान ब्राह्मण रुद्रकेतु और उसकी पत्नी शारदा को दो पुत्र हुए। नाम रखे गए देवांतक और नरांतक। दोनों सुंदर बालक बहुत कुशाग्र थे। नारद मुनि की सलाह पर दोनों को पढ़ने के लिए भूत देश यानी आज के भूटान भेजा गया।
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भूत देश में असुर, राक्षस, दानव और दैत्यों का बोलबाला था। दोनों आर्य बालक भूत जाति के रंग में रंग गए। अध्ययन के बाद दोनों वापस लौटे और कुछ ही समय में आर्यावर्त, त्रिविष्टप यानी तिब्बत और आसपास के सारे प्रदेश जीत लिए। इधर, पूर्व में ब्रह्मदेश यानी आज के म्यांमार में कश्यप ऋषि और उनकी पत्नी अदिति के घर एक पुत्र का जन्म हुआ। नामकरण हुआ महोत्कट। वीर और मेधावी बालक ने बहुत कम आयु में सब कुछ सीख लिया।’
‘उस दौर में हर कोई देवांतक और नरांतक के अत्याचारों से परेशान था। कश्यप ऋषि ने किशोर महोत्कट को काशी नरेश के पुत्र का विवाह कराने के लिए भेजा। महोत्कट ने रास्ते में कई राक्षसों को ढेर कर दिया। जवाब में काशी पर नरांतक का आक्रमण हुआ, लेकिन महोत्कट के असीम युद्ध कौशल और पराक्रम के आगे नरांतक हार गया।
राक्षसों को हराने के लिए जो सेना तैयार की गई, उसमें इक्कीस दलों के नायक को ‘गणेश’ कहा गया। हजारों के अधीश को ‘गणाधीश’ और इनके बाद सेना में ‘गणेश्वर’, ‘गणमंडलाध्यक्ष’ और ‘महागणपति’ की नियुक्ति हुई। सेना के सबसे बड़े अधिकारी को ‘विनायक’ कहा गया।
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विनायक (Vinayak) यानी विशिष्ट नायक। यह पद किशोरवय महोत्कट को सौंपा गया और वह महोत्कट विनायक कहलाए। देवांतक के मरने के बाद काशी के लोग विनायक को अवतारी महात्मा मानने लगे। हर घर उत्सव हुआ। विनायक सबसे पहले गरीबों के घर गए। बाद में गरीबों का जीवन स्तर भी सुधारा। इसे सार्वजनिक गणेश महोत्सव की शुरुआत कह सकते हैं, जो आज भी जारी है।’
बात यहां खत्म नहीं होती। ‘कुछ समय बाद नरांतक का हमला हुआ और भीषण युद्ध में आखिरकार वह भी विनायक के हाथों मारा गया। त्रिविष्टप, भूतदेश के अलावा पूरे भारत को राक्षसों और असुरों से मुक्ति मिली। कथा पर भरोसा किया जाए तो विनायक ने राक्षसों को हराने के लिए महिलाओं के भी आठ दल बनाए थे। इन टुकड़ियों की मुखिया के नाम प्रथिमा, प्रकाम्या, वशिता, महिमा, अणिमा, गरिमा, ईशिता, लघिमा और प्राप्ति थे।
राक्षसों से मुक्ति के बाद महोत्कट अपने पिता कश्यप ऋषि के आश्रम लौटे और सोलह वर्ष की आयु में ही योग विद्या से शरीर त्याग दिया। इसके बाद कश्यप ऋषि ने विनायक की मूर्ति स्थापित कर मंदिर बनवाया। बस यहीं से सिद्धि विनायक की पूजा आरंभ हुई।’
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दूसरे अवतार गुणेश की कथा (Avatars of Lord Ganesha)
मिथिला में चक्रपाणि राजा की पत्नी उग्रा ने एक पुत्र को जन्म दिया। बालक देखने में अच्छा नहीं था तो उसे कपड़े में लपेट नदी में बहा दिया। बालक एक व्यक्ति को मिला और उसने इसे दोबारा राजा चक्रपाणि को सौंप दिया। इस प्रकार यह बालक सिंधु वर्मा अपने जैविक पिता के घर ही पला-बढ़ा।
युवा होने पर बेहद शक्तिशाली सिंधु वर्मा ने सूर्य की उपासना के बाद कंठ में अमृत धारण किया। राजा ने उसे राजपाट सौंप दिया गया। सिंधु वर्मा जो सिंधु दैत्य भी कहलाता था, उसने प्रजा पर खूब अत्याचार किए। शंकर समेत सभी देवताओे को हराकर उन्हें उनके देश से भगा दिया। विष्णु को कैद कर लिया। इस बीच शंकर और पार्वती का एक पुत्र हुआ, गुणेश। पार्वती के पिता अपने नाती गुणेश को ‘हेरंब’ नाम से पुकारते थे।
गुणेश भी बेहद वीर था। सिंधु दैत्य के खात्मे के लिए विश्वकर्मा ने बालक गुणेश को अंकुश, फरसा, पाश और पद्म दिए। गुणेश और उनकी सेना ने सिंधु दैत्य को हरा विष्णु को कैद से मुक्त करवाया और देवताओं को उनका राज लौटाया। युद्ध जीतने के बाद ब्रह्मदेव की बेटियों ‘ऋद्धि’ और ‘सिद्धि’ का विवाह गुणेश से हुआ। इस अवतार में भी सोलह वर्ष की उम्र में गुणेश ने शरीर त्याग दिया। इसके बाद मंदिर बनवाकर गुणेश की पूजा की परंपरा शुरू हुई।
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भगवान गणेश के तीसरे अवतार की कथा (Avatars of Lord Ganesha)
ब्रह्मदेव और महाजृंभा राक्षसी के मेल से एक बेहद सुंदर बालक का जन्म हुआ। इसका नाम था सिंदूर। ब्रह्मदेव अपने पुत्र को बहुत प्यार करते थे। इस आसक्ति में एक दिन ब्रह्मदेव ने पुत्र को वरदान दे दिया कि क्रोध में वह जिसे भी गले लगाएगा, वह तुरंत मर जाएगा। मूर्ख सिंदूर अपने पिता को ही मारना चाहता था, लेकिन वह प्राण बचाते हुए विष्णु के पास पहुंचे। विष्णु ने सिंदूर असुर को शंकर के पास भेजा। वह शंकर की पत्नी पार्वती को लेकर भागा। शंकर ने युद्ध में उसे हरा दिया।
कुछ समय बाद पार्वती को एक पुत्र हुआ। उसकी नाक हाथी की सूंड़ जैसी लंबी-चौड़ी, छोटी-छोटी आंखें और पैरों के अलावा बड़ा पेट और ऊबड़-खाबड़ सिर था। पार्वती अपनी संतान को देख दुखी हुईं। इस बच्चे को माहिष्मती के राजा वरेण्य को सौंप दिया गया। वरेण्य की पत्नी पुष्पिका के अपने बच्चे को कुछ दिन पहले राक्षस उठा ले गए थे। उन्होंने भी इस मासूम पार्वती पुत्र (Lord Ganesh) को जंगल में छोड़ दिया।
बाद में यह बच्चा पराशर मुनि और उनकी पत्नी वत्सला के पास पला। इधर, सिंदूर दैत्य प्रजा पर अत्याचार कर रहा था। एक दिन पराशर मुनि की आज्ञा से बालक गणेश ने सिंदूर दैत्य को मार गिराया। अंत में गणेश (Lord Ganesh) ने राजा वरेण्य को जो उपदेश दिया, वह ‘गणेश गीता’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
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कथाएं और भी हैं (Avatars of Lord Ganesha)
ये तो थी पुराण के आधार पर गणेश (Lord Ganesh) के तीन अवतारों की कथाएं, लेकिन उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे डॉ. संपूर्णानंद ने अपनी पुस्तक ‘गणेश’ में कई रोचक तथ्य सामने रखे हैं। वह लिखते हैं, ‘गणेश (Lord Ganesh) के कई नाम लोग पूरी श्रद्धा से लेते हैं। उन्हें एकदंत, विघ्नहर्ता, सिद्धिदायक, उमापुत्र, मंगलमूर्ति, हेरंब आदि नामों से भी पहचाना जाता है। ये नाम गणेश पुराण में ही गणेशकवच में दिए गए हैं।’
लेकिन, गणेश (Lord Ganesh) के जन्म के बारे में सिर्फ तीन नहीं, कई कथाएं (Ganesh birth story) प्रचलित हैं। गणेश के जन्म की कथाएं शिवपुराण, स्कंदपुराण और ब्रह्मवैवर्तपुराण में भी मिलती हैं। शिवपुराण की कहानी आम जनमानस में सबसे ज्यादा लोकप्रिय है।
शिवपुराण में बताया गया है कि देवी पार्वती जब नहाने गईं तो बाहर पहरेदार की जरूरत थी। उन्होंने अपने शरीर के मैल से एक पुतला बनाया और उसमें प्राणों का संचार कर बाहर बैठा दिया।
यह गणेश (Lord Ganesh) थे। गणेश ने शंकर को अंदर जाने से रोका तो भयंकर युद्ध हुआ और अंत में शंकर ने गणेश का सिर काट दिया। पार्वती ने लौटकर यह नजारा देखा तो क्रोध चरम पर पहुंच गया। देवियां और मातृका आईं, देवताओं से संग्राम हुआ। अंत में शंकर ने हाथी का सिर लगाकर गणेश को जीवनदान दिया और आशीर्वाद दिया कि उनकी पूजा सबसे पहले होगी। स्कंदपुराण और ब्रह्मवैवर्तपुराण में भी अलग-अलग कथाएं हैं। वाराहपुराण में तो गणेश के जन्म की बिल्कुल अलग कथा है।
डॉ. संपूर्णानंद ने लिखा है, ‘विनायक के वैसे तो कई प्रकार हैं, लेकिन इनमें चार मुख्य (Avatars of Lord Ganesha) हैं। याज्ञवल्क्य स्मृति के आधार पर इनके नाम मित, सम्मित, शालकटंकट और कूष्मांडराजपुत्र बताए गए हैं। यहां चार विनायक बताए गए हैं, लेकिन अब इन चारों को अलग अस्तित्व नहीं दिखता है। चारों एक ही हो गए हैं।’
‘कहीं-कहीं विनायकों के दो वर्ग (Avatars of Lord Ganesha) हैं – वैष्णव और गांगेय। प्रधान विनायक शिव के पुत्र हैं और उनका नाम गणेश (Lord Ganesh) है। अग्निपुराण में गणनायक को गांगेय की उपाधि दी गई है। माना जाता है कि यह गणनायक ही गणेश होंगे। संत विश्वरूपाचार्य ने बालक्रीड़ा नाम की टीका में विनायकों के छह भेद (Avatars of Lord Ganesha) बताए हैं।’
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