
Mass slaughter of dogs : दक्षिण-पश्चिमी चीन के युन्नान प्रांत के मौडिंग इलाके में आधी रात को अचानक से शोर उठा। पिछली कुछ रातों से यह छोटा-सा इलाका अंधेरा घिरते ही ऐसे शोर में डूब जाता था। कुछ सरकारी कर्मचारी और वर्दीधारी गलियों में ड्रम पीटते और आवाज करते हुए घूम रहे थे। वे हर दरवाजे पर रुकते, भरपूर शोर करते और फिर आगे बढ़ जाते।
तभी एक घर से एक दबी हुई आवाज सुनाई पड़ी। पुलिसवालों के कदम रुक गए। उन्होंने और तेजी से ड्रम पीटना शुरू कर दिया। अंदर मौजूद लोगों की सांसें थम गईं। घर की सबसे छोटी बच्ची भागते हुए बेसमेंट में गई और अपने प्यारे कुत्ते को कस के गले लगा लिया। लेकिन बाहर उठते शोर ने डॉगी को बेचैन कर दिया था। कुछ देर तक वह रुका रहा और आखिरकार जोर से भौंकने लगा।
बाहर पुलिसवालों ने जैसे ही कुत्ते की आवाज सुनी, वे घर का दरवाजा भड़भड़ाने लगे। थोड़ी ही देर में पूरा मोहल्ला जमा हो गया। घर के मालिक ने मिन्नतें कीं। कहा कि उसके डॉगी का वैक्सीनेशन हुआ है, पर सरकारी कर्मचारी नहीं माने।
कुत्ते को खींचकर एक वैन में डाल दिया गया। इस कुत्ते का वही अंजाम हुआ, जो इस प्रांत के बाकी 50 हजार से ज्यादा कुत्तों का हुआ था, दर्दनाक मौत (Mass slaughter of dogs)।
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यह वक्त था अगस्त 2006। युन्नान के एक इलाके में रैबीज (Rabies) के कुछ मामलों ने पूरे समुदाय को हिला दिया। छह महीने में तीन लोग, जिनमें एक चार साल की बच्ची भी थी, इस बीमारी से मर गए। लगभग 360 लोग कुत्तों के काटने का शिकार हुए और यहां तक कि गायों-सूअरों पर भी हमले हुए।
चीन के स्वास्थ्य विभाग ने चेतावनी जारी कर दी कि एड्स और हेपेटाइटिस से भी ज्यादा मौतें रैबीज के कारण हो रही हैं। देश के सिर्फ तीन प्रतिशत कुत्तों को ही टीका लगाया गया था।
समस्या नकली वैक्सीन की वजह से भी बढ़ी। दो बच्चों की मौत का केस आया, जिसमें पता चला कि माता-पिता ने बच्चों का टीकाकरण कराया था, फिर भी उनकी मौत हो गई। पुलिस ने जांच शुरू की तो नकली वैक्सीन की बड़ी खेप पकड़ी गई।
समस्या बड़ी थी, पर रास्ता क्रूर चुना गया
सरकार पर कुछ करने का दबाव था। जब अधिकारियों से उपाय पूछा गया तो उन्होंने कहा कि इतने बड़े पैमाने पर टीकाकरण करने में बहुत समय लगेगा। उसका परिणाम भी देर से आएगा। अब एक ही तरीका है – कुत्तों का सामूहिक वध (Mass slaughter of dogs)।
इसके बाद शुरू हुआ क्रूर कत्लेआम। सिर्फ एक हफ्ते में करीब 50 हजार कुत्तों को डंडों, बिजली के झटकों और फांसी से मार डाला गया (Mass slaughter of dogs)। पुलिस और स्वास्थ्य विभाग की टीमें घर-घर जातीं, पालतू कुत्तों को जब्त करतीं और उन्हें वहीं खत्म कर देतीं। जिन मालिकों ने अपने पालतू छुपा रखे थे, उनके घरों के बाहर आधी रात को शोर मचाकर कुत्तों को भौंकने पर मजबूर किया जाता, ताकि उन्हें ढूंढा जा सके।
इतना ही नहीं, कुत्तों को मारने वालों को 5 युआन का इनाम भी दिया गया। नतीजा यह हुआ कि कई पालतू जानवर, जिनके पास लाइसेंस और टीकाकरण प्रमाणपत्र था, वे भी इस कत्लेआम (Mass slaughter of dogs) से नहीं बच पाए।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस फैसले की आलोचना हुई। PETA जैसे संगठन ने इसे अत्यधिक क्रूर और लापरवाह बताया और चीन में बने सामान के बहिष्कार की अपील की। एक सरकारी अखबार ने भी स्वीकार किया कि अगर समय पर टीकाकरण और निगरानी की व्यवस्था की जाती, तो इस तरह की कार्रवाई की नौबत ही नहीं आती।
आज भी यह घटना China Rabies Dog Cull 2006 के नाम से दर्ज है (Mass slaughter of dogs)।
अब समय की सुई को पीछे घुमाते हैं – सितंबर 1939, ब्रिटेन
जर्मनी के खिलाफ ब्रिटेन ने युद्ध की घोषणा कर दी थी। लंदन की सड़कों पर ब्लैकआउट की तैयारी थी, लोग अपने घरों की खिड़कियां काले कपड़ों से ढक रहे थे। हर तरफ अनिश्चितता और चिंता का माहौल था। लोग राशन जमा करने लगे थे, क्योंकि अफवाहें थीं कि जल्द ही भोजन की भारी कमी होगी।
इसी बीच सरकार ने National Air Raid Precautions Animals Committee (NARPAC) का गठन किया और एक छोटी-सी पुस्तिका जारी की, जिसका नाम था – Advice to Animal Owners यानी जानवर मालिकों को सलाह।
इसमें लिखा था कि युद्ध के दौरान पालतू जानवरों की देखभाल कठिन हो सकती है। भोजन की कमी होगी, एयर रेड्स से अफरातफरी मचेगी और ऐसे हालात में पालतू कुत्तों-बिल्लियों को सुरक्षित रखना मुश्किल होगा।
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यह महज एक चेतावनी थी, लेकिन आम जनता ने इसे बिल्कुल अलग अंदाज में लिया। लोग सोचने लगे कि शायद सरकार चाहती है कि वे अपने जानवरों से छुटकारा पा लें। डर और जल्दबाजी में हजारों लोग अपने पालतू जानवरों को मारने लगे।
डॉक्टरों से मौत की अपील
पशु चिकित्सालयों और क्लीनिकों के बाहर लंबी कतारें लग गईं। मालिक अपने कुत्तों और बिल्लियों को गोद में लिए खड़े होते और डॉक्टर से कहते, इसे दर्दरहित मौत दे दीजिए। कई जगह जहर देकर जानवरों को सुलाया गया, कहीं इंजेक्शन से, तो कहीं गैस चैम्बर्स तक का इस्तेमाल हुआ।
इतिहासकार बताते हैं कि सिर्फ एक हफ्ते में करीब साढ़े सात लाख पालतू जानवर मारे गए। यह संख्या इतनी बड़ी थी कि कई शवगृह और दफनाने की जगहें तक भर गईं। कुछ लोग तो अपने पालतुओं को खुद ही दफनाने लगे।
इस कत्लेआम का एक और कारण था लोगों का यह विश्वास कि वे अपने पालतू को बेहतर मौत दे रहे हैं। उनका डर यह था कि अगर युद्ध लंबा चला, बमबारी बढ़ी या राशन खत्म हुआ, तो उनका प्यारा जानवर भूखा मर जाएगा या सड़कों पर भटकते हुए और भी बुरी हालत में पहुंच जाएगा।
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बाद में हुआ अपराधबोध
जैसे-जैसे युद्ध आगे बढ़ा, सच्चाई सामने आने लगी। राशन की व्यवस्था हुई, सरकार ने नियंत्रण बनाए रखा और धीरे-धीरे लोगों को एहसास हुआ कि उनका डर शायद जरूरत से ज्यादा था। जिन लोगों ने अपने पालतुओं को मार दिया था, वे गहरे अपराधबोध में जीने लगे।
ब्रिटेन में आज भी इसे ‘The Pet Massacre of 1939’ कहा जाता है। कई डायरी और पत्रों में लोगों ने उस समय की अपनी मानसिक हालत लिखी है – कैसे वे आंसुओं के साथ अपने प्यारे साथी को पशु चिकित्सक के पास ले गए, और कैसे बाद में उनकी याद उन्हें ताउम्र सालती रही।
कुछ परिवार ऐसे भी थे जिन्होंने अपने पालतुओं को बचाने का फैसला किया। उन्होंने कहा कि मुश्किल समय में इंसान को अपने सबसे वफादार साथी को छोड़ना नहीं चाहिए।
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