
Indus Waters Treaty
पाकिस्तान (Pakistan) को अब शायद समझ में आए कि जब भारत अपने जल-अधिकारों पर सवाल उठाता है, तो वह केवल गुस्से में नहीं होता, बल्कि ऐतिहासिक अन्याय का हिसाब मांग रहा होता है। पहलगाम में आतंकी हमले (Pahalgam terrorist attack) के बाद भारत ने अब सिंधु जल समझौता (Indus Waters Treaty) को सस्पेंड करने का ऐलान कर दिया है। यह कोई साधारण घोषणा नहीं, बल्कि 64 साल से झेली जा रही जल-सहिष्णुता के अंत की शुरुआत है।
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पानी का बदला पानी से
साल 2016 में जब उरी में भारतीय फौजियों पर हमला हुआ था, तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) ने गुस्से में कहा था, ‘रक्त और जल एक साथ नहीं बह सकते।’ उसी दौरान केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने इशारा कर दिया था कि अगर पाकिस्तान आतंक की राह पर चलता रहा, तो भारत पानी की राह बंद कर देगा।
अब हालात फिर से वहीं पहुंच गए हैं। पहलगाम (Pahalgam terrorist attack) में पर्यटकों पर हुए कायराना हमले ने भारत को झकझोर दिया है। सरकार ने साफ कह दिया है, जब तक पाकिस्तान (Pakistan) आतंकवाद को पालना-पोसना बंद नहीं करता, तब तक कोई समझौता नहीं होगा।
क्या भारत सच में पाकिस्तान का पानी रोक सकता है?
इस सवाल का जवाब ‘हां’ में है। सतलुज नदी पर फिरोजपुर हेडवर्क्स जैसी भारतीय परियोजनाएं प्रवाह की ऊपरी दिशा में हैं, जबकि पाकिस्तान की हुसैनीवाला जैसी परियोजनाएं निचली दिशा में। भारत चाहे तो जल प्रवाह को मोड़कर पाकिस्तान के हिस्से के कई प्रोजेक्ट्स को ठप कर सकता है।
समझौता या धोखा?
सिंधु जल समझौते (Indus Waters Treaty) की कहानी 1951 में शुरू हुई थी और 1960 में कराची में जाकर खत्म हुई। वर्ल्ड बैंक की मध्यस्थता में हुई यह संधि छह नदियों पर आधारित थी। पश्चिम की सिंधु, झेलम और चिनाब पाकिस्तान को मिलीं, और पूरब की सतलुज, ब्यास और रावी भारत के हिस्से में आईं।
लेकिन बंटवारा बेहद एकतरफा रहा, करीब 75% पानी पाकिस्तान को और महज़ 25% भारत को मिला। इतना ही नहीं, पाकिस्तान की जल परियोजनाओं के लिए भारत ने वर्ल्ड बैंक के जरिए करीब 6 करोड़ 20 लाख पाउंड की मदद भी दी। क्या इसे कोई न्याय कहेगा?
संसद की अनसुनी आवाजें
सिंधु जल समझौता (Indus Waters Treaty) 19 सितंबर 1960 को साइन हुआ, ठीक तब जब संसद सत्र खत्म हो चुका था। जब संसद फिर से बैठी, तो बवाल मच गया। जयप्रकाश नारायण, डॉ. लोहिया, अटल बिहारी वाजपेयी जैसे नेताओं ने इस संधि को भारत के हितों के खिलाफ बताया।
लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू (Jawaharlal Nehru) ने इसे ‘मानवीयता’ का मामला बताकर टाल दिया। आज समय आ गया है कि इस ऐतिहासिक चूक को सुधारा जाए।
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जब पाकिस्तान (Pakistan) को हर बात में आपत्ति थी
2005 में पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर (Jammu Kashmir) में भारत की किशनगंगा और रतले जल विद्युत परियोजनाओं पर सवाल उठाया। भारत का जवाब था कि सिंधु जल समझौते (Indus Waters Treaty) में चार स्तर हैं जिनसे विवाद सुलझाए जा सकते हैं – स्थायी सिंधु जल आयोग, तटस्थ विशेषज्ञ, वर्ल्ड बैंक और अंत में कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन।
भारत तटस्थ विशेषज्ञ की सलाह से समाधान चाहता था, लेकिन पाकिस्तान सीधे अंतरराष्ट्रीय कोर्ट पहुंच गया। वर्ल्ड बैंक ने शुरू में विरोध किया, लेकिन 2022 में पाकिस्तान (Pakistan) की बात मान ली और दोनों – तटस्थ विशेषज्ञ और कोर्ट की प्रक्रिया शुरू कर दी। भारत ने इसका विरोध किया और ‘हेग’ स्थित कोर्ट में अपने जज तक नहीं भेजे। यह साफ दिखाता है कि पाकिस्तान (Pakistan) का इरादा समाधान नहीं, विवाद बनाए रखना है।
अब तस्वीर बदल चुकी है
जब सिंधु जल समझौता (Indus Waters Treaty) हुआ था, तब भारत आज जितना ताकतवर नहीं था। कश्मीर पर पाकिस्तानी घुसपैठ (Pakistani infiltration in Kashmir) जारी थी, सेना का ढांचा भी कमजोर था और शीत युद्ध के दौर में अमेरिका समेत पश्चिमी देश पाकिस्तान (Pakistan) के साथ खड़े थे] लेकिन आज भारत वैश्विक ताकत है। दुनिया उसकी जरूरत समझ चुकी है। वहीं पाकिस्तान अब आतंक का प्रतीक बन चुका है।
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अब भारत को केवल समझौता निलंबित नहीं, बल्कि पूरी तरह से खत्म करने की दिशा में बढ़ना चाहिए। यह केवल जल-नीति का सवाल नहीं, बल्कि संप्रभुता और आत्मसम्मान का मामला है। जब पाकिस्तान खून बहाने से बाज नहीं आता, तो भारत क्यों जल बहाने पर मजबूर रहे?



