
साल 1666। लंदन की गलियों में मौत का साया था। Great Plague of London हजारों लोगों की जान ले रहा था और बाकी अपने-अपने घरों से दूर सुरक्षित जगहों की तलाश में थे। इसी दौरान युवा गणितज्ञ और वैज्ञानिक आइजैक न्यूटन (Isaac Newton) भी कैम्ब्रिज छोड़कर अपनी मां के घर Woolsthorpe Manor पहुंच गए। यहीं से शुरुआत होती है उस मशहूर कहानी की, जिसे हम सबने बचपन में पढ़ा है, यानी Newton और सेब की।
क्या है कहानी की सच्चाई? (Newton Apple Story)
कहानी हम सब जानते हैं – Newton एक बगीचे में पेड़ के नीचे बैठे थे, तभी उनके सिर पर एक सेब आ गिरा और अचानक उन्हें Gravity यानी गुरुत्वाकर्षण का आइडिया आया।
लेकिन इतिहासकारों का मानना है कि यह वाकया उतना सीधा-सपाट नहीं था।
Newton के दोस्त और जीवनी लेखक विलियम स्ट्यूक्ली (William Stukeley) ने लिखा है कि न्यूटन अक्सर अपने बगीचे में टहलते हुए सेब के पेड़ को देखते और सोचते, ‘आखिर सेब हमेशा नीचे ही क्यों गिरता है? वह ऊपर या तिरछा क्यों नहीं जाता?’
यही सवाल बाद में दुनिया के सबसे बड़े वैज्ञानिक नियमों में से एक में बदल गया। Newton ने महसूस किया कि धरती किसी अदृश्य शक्ति से सेब को अपनी ओर खींच रही है। और यही शक्ति है गुरुत्वाकर्षण।
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न्यूटन और सेब का किस्सा (Newton’s Apple Anecdote)
Newton खुद भी बुढ़ापे में यह कहानी सुनाना पसंद करते थे। लेकिन ज्यादातर इतिहासकार मानते हैं कि असल में यह कई सालों के शोध, अध्ययन और सोच का नतीजा था। सेब वाली कहानी को उन्होंने बाद में आसान और दिलचस्प अंदाज में पेश किया ताकि लोग आसानी से समझ सकें।
गुरुत्वाकर्षण का विज्ञान में योगदान (Contribution of Newton’s Law of Gravity)
Newton’s Law of Universal Gravitation विज्ञान की दुनिया के लिए एक क्रांतिकारी खोज थी। इस नियम ने समझाया कि न सिर्फ सेब धरती पर गिरता है, बल्कि चांद भी धरती के गुरुत्वाकर्षण से उसकी कक्षा में बंधा है।
इस नियम के कारण ही वैज्ञानिक यह समझ पाए कि ग्रह सूर्य के चारों ओर क्यों घूमते हैं, समुद्र में ज्वार-भाटा क्यों होता है। इसी नियम की वजह से अंतरिक्ष (Space) और खगोल विज्ञान (Astronomy) की बुनियादी गणनाएं संभव हो सकीं।
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आज सैटेलाइट लॉन्चिंग से लेकर स्पेस ट्रेवल तक, हर जगह गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत हमारी मदद करता है।
इतनी महान खोज के बावजूद Newton हमेशा विनम्र बने रहे। अपनी जिंदगी के अंतिम दिनों में उन्होंने कहा था – मैं खुद को बस एक बच्चे की तरह मानता हूं, जो समुद्र किनारे खेल रहा है और कभी-कभी एक चमकदार कंकड़ या सुंदर सीप उठाता है, जबकि सच्चाई का विशाल महासागर मेरे सामने अब भी अनदेखा पड़ा है।



