
Kejriwal refuses to appear before court : आम आदमी पार्टी (AAP) के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली आबकारी नीति से जुड़े मामले में अदालत में पेश होने से साफ इनकार कर दिया है। सोमवार को उन्होंने जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा को एक पत्र लिखकर कहा कि उन्हें इस अदालत से न्याय मिलने की उम्मीद नहीं रही, इसलिए वह अब महात्मा गांधी के सत्याग्रह के रास्ते पर चलेंगे।
यह फैसला न सिर्फ कानूनी बल्कि राजनीतिक रूप से भी बेहद अहम माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे (Kejriwal refuses to appear before court) अरविंद केजरीवाल को राजनीतिक रूप से फायदा हो सकता है। वह इस केस में अपने लिए समर्थन बढ़ा सकते हैं, लेकिन कानूनी रूप से उनकी मुश्किलें बढ़ सकती हैं।
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क्या है पूरा मामला?
दिल्ली एक्साइज पॉलिसी केस में CBI द्वारा की जा रही जांच के बीच यह विवाद खड़ा हुआ है।
केजरीवाल का कहना है कि उन्हें इस मामले में झूठा फंसाया गया, जेल भेजा गया और एक चुनी हुई सरकार को अस्थिर किया गया। उन्होंने दावा किया कि 27 फरवरी को एक निचली अदालत ने उन्हें पूरी तरह निर्दोष करार दिया और CBI की जांच पर भी सवाल उठाए (Kejriwal refuses to appear before court)।
हालांकि, इस फैसले को CBI ने दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी, जहां मामला जस्टिस स्वर्ण कांत शर्मा की बेंच के पास पहुंचा।
अपने बयान और वीडियो में केजरीवाल ने कहा कि उनके मन में एक गंभीर सवाल उठ रहा है, क्या उन्हें इस अदालत से निष्पक्ष न्याय मिलेगा?
अरविंद केजरीवाल ने सोशल मीडिया पर जारी एक वीडियो में कहा कि उन्हें एक झूठे मामले में फंसाकर जेल भेजा गया और एक चुनी हुई सरकार को अनुचित तरीके से गिरा दिया गया। उन्होंने कहा कि महीनों तक जेल में रहने के बाद अंततः सच की जीत हुई और अदालत ने उन्हें पूरी तरह निर्दोष घोषित किया। साथ ही कोर्ट ने सीबीआई की जांच पर सवाल उठाते हुए जांच अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई के निर्देश भी दिए।
केजरीवाल ने आगे कहा कि इस फैसले को सीबीआई ने तुरंत हाई कोर्ट में चुनौती दी, जहां मामला जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा के समक्ष आया। इसी दौरान उनके मन में यह सवाल उठा कि क्या उन्हें वहां निष्पक्ष न्याय मिल पाएगा (Kejriwal refuses to appear before court)।
उन्होंने आरोप लगाया कि जिस विचारधारा से जुड़ी सरकार ने उन पर केस दर्ज किया, उसी विचारधारा से संबंधित संगठनों के मंचों पर जज के जाने की बात सामने आई है। चूंकि वह और उनकी पार्टी उस विचारधारा के विरोधी हैं, इसलिए उन्हें आशंका है कि क्या इस परिस्थिति में उन्हें निष्पक्ष सुनवाई मिल सकेगी।
हालांकि, इन आरोपों को अदालत ने सिरे से खारिज कर दिया है।
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Delhi High Court ने केजरीवाल की उस याचिका को पहले ही खारिज कर दिया था, जिसमें उन्होंने जज से खुद को मामले से अलग करने की मांग की थी।
अदालत ने कहा कि सिर्फ धारणा या आशंका के आधार पर जज को हटाया नहीं जा सकता। ऐसे आरोप न्यायपालिका की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचा सकते हैं (Kejriwal refuses to appear before court)।
जस्टिस शर्मा ने यह भी कहा कि अगर इस तरह के आरोपों के आधार पर जज हटने लगें, तो सरकार से जुड़े किसी भी केस की सुनवाई संभव नहीं रह जाएगी।
इसके बाद ही केजरीवाल ने तय किया कि वह अदालत में पेश नहीं होंगे (Kejriwal refuses to appear before court)। केजरीवाल ने अपने पत्र में साफ कहा कि वह न तो खुद अदालत में पेश होंगे और न ही कोई वकील उनकी ओर से पेश होगा। हालांकि वह सुप्रीम कोर्ट जाने का अधिकार सुरक्षित रखेंगे।
यह मामला कई बड़े सवाल खड़े करता है। क्या किसी आरोपी का अदालत में पेश होने से इनकार करना उचित है (Kejriwal refuses to appear before court)? क्या यह न्यायिक प्रक्रिया को चुनौती देने जैसा है या फिर यह गांधीवादी विरोध का एक आधुनिक रूप है?
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