
AI : जरा सोचिए… आपका पर्सनल रोबोट गलती से आपका पसंदीदा कप तोड़ देता है। आप गुस्सा होने ही वाले हैं कि वह झुककर कहता है , ‘माफ कीजिए, मुझसे गलती हो गई। आगे से ऐसा नहीं होगा। मैं इन टुकड़ों को हटा देता हूं।’
हैरान रह गए न? अब तक बनी ज्यादातर साइंस फिक्शन फिल्मों में मशीनों को भावहीन दिखाया गया है। उसे जो ऑर्डर दे दिया है, वह कर देता है। लेकिन एक नई रिसर्च बताती है कि AI को भी पछतावा हो सकता है।
हालांकि सवाल है कि क्या यह सिर्फ प्रोग्राम किया गया जवाब है या मशीन सच में पछता रही है?
यही सवाल वैज्ञानिकों को परेशान कर रहा था। और अब, उनके पास इसका एक दिलचस्प जवाब है – हां, मशीनों को भी गिल्ट सिखाया जा सकता है।
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गिल्ट क्यों जरूरी है?
गिल्ट (Guilt) यानी दोषबोध यानी पछताना सिर्फ एक भावना नहीं, बल्कि समाज को चलाने का एक तरीका है। जब हम गलती करते हैं और पछताते हैं, तो हम दूसरों को यह संदेश देते हैं कि हम अगली बार सही करेंगे। इससे भरोसा बढ़ता है और रिश्ते लंबे चलते हैं।
अगर AI में यह भावना आती है, तो उसमें भी गलतियों से सीखने की क्षमता बढ़ेगी। यह विचार अभी दूर की कौड़ी लग सकता है, लेकिन इसमें वैज्ञानिकों को कुछ सफलता मिली है।
AI को खेल से सिखाया
स्कॉटलैंड के यूनिवर्सिटी ऑफ स्टर्लिंग के वैज्ञानिकों ने यह प्रयोग किया था। शोधकर्ताओं ने सैकड़ों वर्चुअल एजेंट्स यानी छोटे-छोटे सॉफ्टवेयर प्लेयर बनाकर उन्हें एक गेम खिलाया – Iterated Prisoner’s Dilemma। इस गेम में हर बार दो खिलाड़ी चुनते हैं कि वे सहयोग करेंगे या स्वार्थी बनेंगे।
अगर दोनों सहयोग करते हैं, तो दोनों को फायदा होता है। अगर एक धोखा देता है, तो उसे उस समय ज्यादा पॉइंट मिलते हैं, लेकिन अगले राउंड में सामने वाला भी धोखा देने लगता है।
यहां जिन एजेंट्स में गिल्ट प्रोग्राम किया गया था, वे धोखा देने के बाद अपने पॉइंट्स कम कर लेते थे। इसका मतलब कि जैसे वे खुद को सजा देते थे और इसके बाद अगले राउंड में फिर से सहयोग की ओर लौट आते थे।
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इससे निष्कर्ष निकला कि AI भी यह समझ रहा था कि धोखा देना गलत है, इसमें नुकसान होता है। तभी उसने खुद ही सुधार करते हुए सहयोग के विकल्प को अपना लिया।
एक खास रणनीति में एजेंट तभी गिल्ट महसूस करता था, जब उसे पता चलता था कि सामने वाला भी अपनी गलती के लिए कीमत चुका रहा है। इसे Social Guilt कहा गया।
इस प्रयोग का AI के भविष्य पर असर
अगर AI में इस तरह की भावनात्मक समझ जोड़ी जाए, तो मशीनें सिर्फ आदेश मानने वाली नहीं रहेंगी, बल्कि भरोसेमंद साथी भी बन सकती हैं। यह खासकर उन सिस्टम्स में काम आ सकता है, जहां लोगों और AI को लगातार साथ मिलकर फैसले लेने पड़ते हैं।
उदाहरण के लिए, हेल्थकेयर में AI अपनी गलती पहचानकर तुरंत सुधार कर सकता है। रोबोटिक असिस्टेंट की बात की जाए तो वहां AI मशीनें इंसानों के साथ बेहतर समन्वय में काम कर सकती हैं।
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लेकिन खतरा भी है
भावनाएं इंसानों को मजबूत बनाती हैं। यही AI मशीनों के साथ भी हो सकता है। मशीन सीख सकती है कि सॉरी कहने में फायदा है, तो वह पछतावे का नाटक कर सकती है।
AI के असली पछतावे और नकली अभिनय में फर्क करना मुश्किल होगा। यह रिसर्च अभी असली रोबोट्स पर नहीं, बल्कि कंप्यूटर सिमुलेशन पर है – तो इसमें अभी लंबा रास्ता तय करना है।



