
Pakistan Betrayal
दुनिया में कुछ चीजें हैं जो बार-बार हो रही हैं, और पाकिस्तान के साथ धोखा देने (Pakistan Betrayal) का मामला इनमें सबसे बड़ा है। जब-जब पाकिस्तान के साथ बातचीत की गई, उस दौरान उसने हर बार दगाबाजी की है, और हर बार उसने शांति के मौकों को धोखे में बदलने की कोशिश की है। Pahalgam terror attack इसका ताजातरीन उदाहरण है, जो यह साबित करता है कि पाकिस्तान के दिल में कभी भी शांति की इच्छा नहीं रही।
धोखे में पाकिस्तान ने अमेरिका को भी नहीं छोड़ा (Pakistan Betrayal with US)
वह पाकिस्तान, जिसने War on Terror में अमेरिका के साथ मिलकर दुनिया को यह दिखाने का प्रयास किया कि वह आतंकवाद के खिलाफ खड़ा है, वही आतंकवादियों के लिए सुरक्षित ठिकाना बन गया। ओसामा बिन लादेन (Osama bin Laden), जो उस समय दुनिया का सबसे बड़ा आतंकवादी था, उसे पाकिस्तान (Pakistan) ने अपनी सीमा के भीतर पनाह दी।
जब अमेरिकन नेवी सील्स ने एबटाबाद में छापा मारा और ओसामा को मारा, तो पाकिस्तान का असली चेहरा सामने आ गया। यह घटना यह साबित करती है कि पाकिस्तान ने अमेरिका से अरबों डॉलर तो हासिल किए, लेकिन आतंकवाद के खिलाफ कोई सच्ची लड़ाई कभी नहीं लड़ी।
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सऊदी अरब को पाकिस्तान का धोखा (Pakistan Betrayal with Saudi Arab)
सऊदी अरब ने पाकिस्तान को कई दशकों तक वित्तीय मदद दी। तेल के साथ-साथ सैन्य मदद भी जारी रही, लेकिन जब सऊदी अरब ने पाकिस्तान (Pakistan) से यमन में सैन्य सहयोग मांगा, तो उसने उसे ठुकरा दिया। यही पाकिस्तान की नीति है – जब तक कुछ हासिल करना हो, तब तक दोस्ती निभाओ, लेकिन जब सच में मदद की जरूरत हो, तो मुंह मोड़ लो।
अफगानिस्तान और पाकिस्तान का धोखा (Pakistan Betrayal with Afghanistan)
अफगानिस्तान (Afghanistan) के साथ पाकिस्तान का धोखा भी उतना ही पुराना है। एक ओर पाकिस्तान आतंकवादियों को पनाह देता था, तो दूसरी ओर अफगानिस्तान से बातचीत के नाम पर शांति की बात करता था।
तालिबान (Taliban) को समर्थन देने के बाद, पाकिस्तान (Pakistan) ने फिर से अफगानिस्तान के भविष्य को खतरे में डाला। यह सब पाकिस्तान की अंदरूनी राजनीति और सैन्य संस्थाओं के हितों की वजह से हुआ, जिनके लिए आतंकवाद केवल एक साधन था।
भारत के साथ धोखे की लंबी कहानी (Pakistan Betrayal with India)
1965 में जब भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध हुआ, भारत ने हाजीपीर दर्रा जीत लिया था, जो रणनीतिक रूप से बेहद अहम था। लेकिन शिमला समझौते के दौरान इस जीत को वापस कर दिया गया। बदले में पाकिस्तान ने क्या किया? फिर से साजिशें रचीं।
करगिल युद्ध इसका बड़ा उदाहरण है, जब पाकिस्तान ने चुपके से घुसपैठ कर ली थी। इसके बाद भी हम नहीं सुधरे, बातचीत के लिए उस परवेज मुशर्रफ की आगवानी को तैयार हो गए, जिसने कारगिल की साजिश रची थी।
मुशर्रफ ने भारत आकर वार्ता के गुब्बारे की सारी हवा निकाल दी। और जहां तक धोखे की बात है, वह तो जारी ही रहा। मुंबई पर 26/11 जैसा भयानक हमला करवाया गया। उरी हुआ, पुलवामा हुआ, पहलगाम हुआ।
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असल में पाकिस्तान की फौज और वहां की हुकूमत दोनों जानते हैं कि अगर वे आतंक और धोखे की राजनीति छोड़ देंगे, तो उनका खुद का वजूद खतरे में पड़ जाएगा। चरमपंथ वहां की राष्ट्रीय पहचान बन चुका है, और जो थोड़ी-बहुत समझदारी की आवाजें हैं, वे या तो दबा दी जाती हैं या इतनी कमजोर कर दी जाती हैं कि उनका कोई असर नहीं रह जाता।
यही वजह है कि जब भी बात आतंकवाद खत्म करने की होती है, पाकिस्तान (Pakistan) से असली बदलाव की उम्मीद करना अपने आप को धोखा देने जैसा है। उनके लिए आतंकवाद एक नीति है, धोखा एक आदत है, और इसे बदलने की कोई मंशा न पहले थी, न अब है।
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इसलिए भारत को भी अब यह समझना होगा कि बातचीत और नरमी से कुछ नहीं बदलने वाला। पहलगाम आतंकी हमले (Pahalgam terror attack) पाकिस्तान को उसी भाषा में जवाब देना होगा जिसे वह समझता है – ठोस कार्रवाई और कड़े कदम। पीएम नरेंद्र मोदी ने मन की बात में जैसा कहा कि पूरा देश खून के आंसू रो रहा है। भरोसे का समय अब बीत चुका है। सिंधु जल समझौता निलंबित करना काफी नहीं।



