
Thar Desert
रेत की रेखाओं में अब हरियाली की लकीरें उभर रही हैं। जी हां, भारत का थार मरुस्थल (Thar Desert) – जो कभी तपती धूप और सूखी हवाओं के लिए जाना जाता था – अब बीते 20 वर्षों में 38% हरियालापन (Greening) पा चुका है। और यह कोई ख्वाब नहीं, बल्कि Cell Reports Sustainability में छपी एक नई वैज्ञानिक रिपोर्ट की पुष्टि है।
तो क्या अब रेत में बिखरती जिंदगी को नई दिशा मिल रही है? चलिए, इस परिवर्तन की तह में चलते हैं।
रेत में हरियाली की दस्तक
थार मरुस्थल (Thar Desert), जिसे Great Indian Desert भी कहा जाता है, लगभग 2 लाख वर्ग किलोमीटर में फैला है। यह राजस्थान, गुजरात और पाकिस्तान के कुछ हिस्सों को समेटे हुए है। लेकिन यह केवल भूगोल की कहानी नहीं है, यह कहानी है उस जमीन की, जहां जीवन अब रुकता नहीं, बल्कि रफ्तार पकड़ चुका है।
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बीते दो दशकों में यहां की जमीन न सिर्फ़ इंसानी बस्तियों से घिरी, बल्कि खेती और शहरीकरण (Urbanisation in Desert) का केंद्र भी बन गई। और यही दो वजहें—यानी मानव गतिविधियाँ और जलवायु परिवर्तन (Climate Change)—थार की हरियाली में निर्णायक साबित हुईं।
मॉनसून ने बरसाई उम्मीदें
रिपोर्ट के अनुसार, 2001 से 2023 के बीच थार (Thar Desert) क्षेत्र में 64% अधिक वर्षा दर्ज की गई। यानी, गर्मियों में आने वाला दक्षिण-पश्चिमी मानसून अब अधिक पानी लाने लगा है। यह बढ़ी हुई वर्षा थार के लिए वरदान बन गई।
साथ ही, ग्राउंडवॉटर इरिगेशन यानी भूजल को सतह पर लाकर सिंचाई के तौर पर इस्तेमाल करने की तकनीकों ने खेती की नई राहें खोलीं।
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IIT गांधीनगर के सिविल इंजीनियर और इस शोध के सह-लेखक डॉ. विमल मिश्रा कहते हैं, ‘दुनिया के किसी भी अन्य मरुस्थल ने शहरीकरण, खेती और वर्षा तीनों में एकसाथ वृद्धि नहीं देखी है जैसा थार में हुआ है।’
हरियाली के पीछे इंसानी छाप
थार (Thar Desert) अब मात्र मरुस्थल नहीं, बल्कि 1.6 करोड़ लोगों का घर बन चुका है, दुनिया का सबसे घना आबाद मरुस्थल। इंसानों की इस मौजूदगी ने भूमि उपयोग को बदला। जहां पहले चरागाह या बंजर जमीन थी, अब वहां फसलें लहलहाने लगी हैं।
Satellite Data से मिले सबूतों के अनुसार, इन 20 वर्षों में थार (Thar Desert) का औसत हरियालापन लगभग 38% बढ़ा है। खेती में उत्पादन (Crop Yield) बढ़ा है और शहरी क्षेत्रों का विस्तार भी।
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पानी बचेगा तो सपना बचेगा
लेकिन हरियाली की इस उम्मीद के साथ चुनौतियां भी हैं। शोधकर्ता चेतावनी देते हैं कि अगर भूजल का अत्यधिक दोहन होता रहा, तो आने वाले वर्षों में जल संकट गहरा सकता है। ऐसा न हो, इसके लिए जरूरी है,
- सस्टेनेबल वॉटर मैनेजमेंट (Sustainable Water Management)
- सूखा-प्रतिरोधी फसलें (Drought-resistant Crops)
- ऊर्जा के नवीकरणीय स्रोतों का उपयोग (Renewable Energy Use)
- और बढ़ते तापमान के प्रति अनुकूलन (Climate Adaptation)
बाढ़ बनाम बरकत
भले ही वर्षा बढ़ रही है, लेकिन यह सामान्य बूंदाबांदी नहीं, बल्कि तीव्र और तीव्रतर रूप में हो रही है। यानी बाढ़ का खतरा भी बढ़ रहा है। अगर नालों और शहरी इन्फ्रास्ट्रक्चर को ठीक से डिजाइन किया जाए, तो यह पानी थार के लिए आफत नहीं, वरदान साबित हो सकता है।
भविष्य की तस्वीर में और हरियाली देखी जा रही है। लेकिन इसका दूसरा पहलू यह है कि मरुस्थल में पनपने वाली पारंपरिक वनस्पतियां, जानवर और घुमंतू कृषि पद्धतियां (Nomadic Farming) इस बदलाव में खो सकती हैं।
यहां सवाल उठता है – क्या विकास के इस रास्ते पर चलते हुए हम थार की आत्मा को भी साथ ले चल पाएंगे?
कुल मिलाकर, थार मरुस्थल अब सिर्फ तपती जमीन नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन के असर और मानव प्रयासों की संयुक्त प्रयोगशाला बन चुका है। जहां एक तरफ मौसम बदल रहा है, वहीं दूसरी तरफ इंसान उसे अवसर में बदलने का माद्दा भी दिखा रहा है।



